औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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ध्वनिकार का यह कथन सर्वथा सत्य है कि संघटना के इस चतुरस्र औचित्य
का विचार सर्वप्रथम उन्होंने ही किया ।¹
गद्य, पद्य, नाटक तथा महाकाव्य इन काव्य-प्रकारों की अपनी अपनी
विशिष्टता होती है, जिस पर ध्यान देने से संघटना का निवेश श्लाघनीय होता
है । नाटक का मुख्य उद्देश्य दर्शकों के हृदय में रस की अभिव्यक्ति ही है । अतः
उसमें दीर्घ-समास वाली संघटना तथा शब्दाडम्बर वाले अलंकारों के प्रति कवि
को कथमपि आसक्ति नहीं रखनी चाहिए । कारण, इन बाह्य अङ्गों की बहुलता
रस की शीघ्र प्रतीति में बाधा डालती है ।²
आनन्दवर्धन ने प्रबन्धध्वनि के विवेचन के अवसर पर काव्य तथा नाटक के
इतिवृत्त के स्वरूप के सम्बन्ध में विस्तृत समीक्षा की है । इतिहास साधारणतः
दो प्रकार का होता है—एक वृत्त ( पुराण तथा इतिहास आदि में प्रसिद्ध )
और द्वितीय उत्प्रेक्ष्य (कविकल्पना-प्रसूत) । दोनों प्रकार के इतिवृत्तों में औचित्य
का रहना अत्यन्त आवश्यक है ।³
कथानक के संविधानक में वर्णनीय वस्तु को प्रस्तुत रस के अनुकूल बनाने
के लिए कवि को सदा सचेष्ट रहना चाहिए । सर्वथा औचित्यपूर्ण तथा यथा-
शक्ति रसाविर्भावक घटनाओं को ही काव्य में स्थान देना चाहिये । रसाभि-
व्यञ्जक होने के कारण ही किसी कथा की कमनीयता सिद्ध होती है। परम्परा-
गत किसी कथा के काव्य में निबन्धन करते समय कवि के द्वारा प्रस्तुत रस के
प्रतिकूल अंशों का परिवर्तन न्याय्य है ।⁴
१. इति काव्यार्थविवेको योऽयं चेतश्चमत्कृतिविधायी ।
सूरिभिरनुसृतसारैरस्मदुपज्ञो न विस्मार्यः ॥
( ध्वन्यालोक )
२. एवं च दीर्घसमासा संघटना समासानामनेकप्रकारसंभावनया कदाचित्
रसप्रतीतिं व्यवदधातीति तस्यां नात्यन्तमभिनिवेशः शोभते । विशेषतोऽभिनेयार्थे
काव्ये । ( ध्वन्यालोक )
३. विभावभावानुभावसंचार्यौचित्यचारुणः ।
विधिः कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेक्षितस्य च ॥ ( ध्वन्यालोक )
४. इतिवृत्तवशायातां त्यक्त्वाऽननुगुणां स्थितिम् ।
उत्प्रेक्ष्योऽप्यन्तराभीष्ट रसोचितकथोन्नयः ॥ ( ध्वन्यालोक )