औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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शृङ्गार रस में रेफ के साथ संयुक्त सकार और शकार तथा ढकार का
अत्यधिक प्रयोग प्रकृत रस के विरोधी होने के कारण नहीं करना चाहिए क्योंकि
ये वर्ण रस की हानि करने वाले होते हैं । परन्तु ये ही वर्ण बीभत्स आदि रस में
आवश्यक दीप्ति के प्रकट करने के कारण यदि रखे जाँय तो वे रस के उत्पादक
होते हैं ।
प्रथम स्थिति में यदि वर्ण 'रसच्युतः' ( रस को च्युत करने वाले ) होते
हैं—तो द्वितीय स्थिति में ये ही वर्ण 'रसश्च्युतः' ( रस के टपकाने वाले )
होते हैं । १
पदों की विशिष्ट योजना का नाम संघटना है । संघटना प्रायः तीन प्रकार
की होती है । १—असमासा, २—मध्यम-समासा और ३—दीर्घ-समासा । २
गुणों का संघटना के साथ घनिष्ठ संबन्ध है । आनन्दवर्धन ने संघटना को गुणों
के आधार पर रहने वाली तथा रसों को अभिव्यक्त करने वाली कहा है । ३
संघटना के प्रसङ्ग में चार वस्तुओं के औचित्य का विचार करना आनन्द-
वर्धन ने आवश्यक बतलाया है । मुख्य तो रस का औचित्य ही है परन्तु उसके
साथ वक्ता वाक्य और विषय इन तीन गौण पदार्थों के औचित्य पर भी दृष्टि
रखनी चाहिए ।
वक्ता का अभिप्राय है काव्य अथवा नाटक के पात्र । वाच्य का अर्थ है
प्रतिपाद्य वस्तु तथा विषय का तात्पर्य है नाटक, महाकाव्य, गद्य, पद्य और
चम्पू आदि काव्य-प्रकार । संघटना के चुनाव में इन चारों विषयों के औचित्य
का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए ।
१. शषौ सरेफसंयोगौ ढकारश्चापि भूयसा ।
विरोधिनः स्युः शृङ्गारे तेन वर्णा रसच्युतः ॥
त एव तु निवेश्यन्ते बीभत्सादी रसे यदा ।
तदा तं दीपयन्त्येव तेन वर्णा रसश्च्युतः ॥ ( ध्वन्यालोक ३।३४ )
२. असमासा समासेन मध्यमेन च भूषिता ।
तथा दीर्घसमासेति त्रिधा संघटनोदिता ॥ ( ध्वन्यालोक ३।५ )
३. गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा ।
रसास्तन्नियमे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः ॥
( ध्वन्यालोक ३।६ )