सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 26

( २२ )
अलंकार्य के बिना अलंकार का स्वतः कोई मूल्य नहीं होता—और काव्य में
रस आदि अलंकार्य वस्तु है । अतः रस आदि को पुष्ट करने के लिए अलं-
कारों का प्रयोग किया जाता है तो अलंकार का अलंकारत्व सिद्ध होता है ।¹
इन अलंकारों के औचित्य-सम्पादन के लिए आनन्दवर्धन ने सुन्दर नियमों
का उल्लेख किया है ।² शब्दालंकारों की रसानुरूपता प्रदर्शित करते समय
उन्होंने विप्रलम्भ आदि कोमल रसों के लिए यमकालंकार को सर्वथा त्याज्य
माना है । इस सिद्धान्त का मौलिक रहस्य यह है कि कवि के द्वारा काव्य में
निबद्ध वस्तु को रस का उद्बोधक अवश्य होना चाहिए ।
काव्य में किसी भी वस्तु की उपादेयता तथा अनुपादेयता, संबद्धता और
असंबद्धता, सुरूपता और कुरूपता, रस के पोषण तथा शोषण पर ही निर्भर है ।
रस-पोषक वस्तु ग्राह्य है, परन्तु रस शोषक सर्वथा वर्ज्य है । अलंकारौचित्य के
संबन्ध में उनका कथन अत्यन्त स्पष्ट और हृदयग्राही है । वे कहते हैं कि अलं
कारों को इतना स्वाभाविक होना चाहिए कि रसाकृष्ट कवि के किसी विशिष्ट
आयास के बिना ही वे स्वतः आविर्भूत हों । वे बाह्य न होकर आभ्यन्तर हों,
उनकी रचना के लिए न तो कवि को किसी प्रकार का यत्न करना पड़े और न
उनका इतना चाकचिक्य हो कि पाठक प्रकृत रस के सौन्दर्य से हट कर उन्हीं के
प्रभाव से आकृष्ट हो जाय ।³
आनन्दवर्धन गुणों का साक्षात् संबन्ध रस-भावादि से मानते हैं । गुण
धर्म है और रस आदि धर्मी ! श्रृङ्गार, विप्रलम्भ और करुणरस के साथ माधुर्य
गुण का प्रधान संबन्ध है । रौद्र, वीर और भयानक रस के साथ ओजगुण का
घनिष्ठ संपर्क है । ऐसी दशा में शब्द-योजना ऐसी होनी चाहिए कि प्रकृत गुण
और रस के साथ उसका सर्वथा सामञ्जस्य हो जाय । वर्णों का अपना एक
विशिष्ट प्रभाव होता है । कुछ वर्ण स्वभावतः कोमलता के द्योतक होते हैं तो
अन्य वर्ण स्वतः कठोरता को प्रकट करते हैं । वर्णों की इस प्रकृति को ध्यान में
रख कर काव्य में उनका प्रयोग सर्वथा श्लाघनीय होता है ।
१. रसभावादितात्पर्यमाश्रित्य विनिवेशनम् ।
अलंकृतीनां सर्वासामलंकारत्वसाधनम् ॥ ( ध्वन्यालोक ३।६ )
२. ध्वन्यालोक २।१५-२० ।
३. रसाक्षिप्ततया यस्य बन्धः शक्यक्रियो भवेत् ।
अपृथग् यत्ननिर्वर्त्यः सोऽलंकारो ध्वनौ मतः ॥ ( ध्वन्यालोक २।१७ )