औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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समीचीन है। ग्राम्य-दोष का स्वरूप ही रुद्रट के मत से देश, कुल, जाति, विद्या
आदि के विषय में व्यवहार, आकार, वेष और वचन का अनौचित्य है।१
रुद्रट के मत की उक्त समीक्षा से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि काव्य
में सब से अधिक व्यापक तत्त्व औचित्य ही है। इसके अपकर्षक होने पर ही
दोषों का दोषत्व सम्पन्न होता है और अवस्था-विशेष में रस की अनुकूलता होने
पर वे ही हेय दोष उपादेय गुण के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। अनुकरण
दोषों के दोषत्व को दूर करने वाला पदार्थ है और वह औचित्य के ऊपर ही
निर्भर है।
आनन्दवर्धन
रुद्रट के बाद औचित्य-सिद्धान्त के विकास में प्रमुख स्थान है आचार्य
आनन्दवर्धन का। आनन्दवर्धन ने अपने ध्वन्यालोक में औचित्यतत्त्व का व्यापक
समीक्षण किया है। ध्वन्यालोक में कहीं औचित्य शब्द के प्रयोग द्वारा व्यापक
रूप में और कही संकेत रूप में इस तत्त्व की विशद अभिव्यक्ति हुई है। आनन्द-
वर्धन से प्राचीन आलंकारिकों ने अलंकार-शास्त्र के कतिपय प्रकीर्ण अङ्गों के
विषय में ही औचित्यतत्त्व का विवेचन किया था पर आनन्दवर्धन ने अलंकार-
शास्त्रीय सभी अङ्गों के साथ घनिष्ठ संबन्ध दिखला कर औचित्य को काव्य के
व्यापक अथ च महनीय तत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।
क्षेमेन्द्र ने आनन्दवर्धन के ही विचारों से स्फूर्ति ग्रहण कर अपने विख्यात
ग्रन्थ औचित्यविचारचर्चा में इस तत्त्व का पल्लवन किया है। औचित्यविचार-
चर्चा के मूल स्रोत को जानने के लिए ध्वन्यालोक का अध्ययन नितान्त
अपेक्षित है।
आनन्दवर्धन रस को ही काव्य का सारभूत पदार्थ मानते हैं। उनकी
सम्मति में यह रस कथमपि वाच्य नहीं हो सकता। ध्वनि के द्वारा ही इसकी
अभिव्यक्ति हो सकती है। इस रस में सबसे आवश्यक वस्तु है औचित्य। वस्तु
अलंकार आदि रस के बाह्य परिधान मात्र हैं।
आनन्दवर्धन ने अपने युगान्तरकारी ग्रन्थ ध्वन्यालोक में अलंकारौचित्य,
गुणौचित्य, संघटनौचित्य, प्रबन्धौचित्य और रसौचित्य का विशद निरूपण
किया है।
१. ग्राम्यत्वमनौचित्यं, व्यवहाराकारवेषवचनानाम् ।
देश-कुल-जाति-विद्या-वित्त-वयःस्थान-पात्रेषु ॥ (का. अ. ११।९)