औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
संस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता ८७
पुष्टिं, न नेतव्यो न परिपोषयितव्य इति भावः, तेन परिपोषाकरणेना-
विरोधिता विरोधाभावः स्याद्भवेदित्यर्थः, रसान्तरे रसान्तरस्य सम्बन्धे-
ऽप्यन्ते मुख्यस्येव रसस्य स्थापनं समुचितं नाऽङ्गभूतस्येति भावः । अत्र
गन्तव्यं यदि नामेति पद्ये, तदेवाङ्गभूतरसस्य परिपोषाभाव एव वैपरी-
त्येन प्रतिकूलतयोपलभ्यते प्राप्यते। अङ्गभूतस्यैव विरोधिनः शान्तरस-
स्यान्तपर्यन्तं परिपोषनिर्वाहेणौचित्यव्याघात इति भावः । अविरोधस्थितिं
स्फारयति--परिपोषविपरीते इति। परिपोषविपरीते परिपोषाभावमापन्ने,
स्वभावविरोधिन्यपि प्रकृतिप्रतिकूलेऽपि रसे समावेशित इति भावः,
प्रधानानुपरोध एव मुख्यरसाव्याघात एव भवतीति बोध्यम् ।
अपरिपुष्टविरोधिरससमावेशेऽपि मुख्यरसानुपरोध एवेति पूर्वोक्तमर्थं
लक्ष्ये दर्शयितुमुपक्रमते—यथा राजशेखरस्येति। माणमिति—
मानं मुञ्चत दत्त वल्लभजने दृष्टिं तरङ्गोत्तरां,
तारुण्यं दिवसानि पञ्च दश वा पीनस्तनस्तम्भनम् ।
इत्थं कोकिलमञ्जुशिञ्जितमिषाद्देवस्य पञ्चेषो-
र्दत्ता चैत्रमहोत्सवेन सहसाऽऽज्ञेव सर्वंकषा ।। इति च्छाया ।।
मानं मुञ्चतेति—हे मानिन्यः ! मानं कान्तं प्रति कृत्रिमक्रोधं, मुञ्चत
त्यजत, बल्लभजने प्रियतमे, तरङ्गोत्तरां चपलामिति यावत्, दृष्टिं नयन-
निक्षेपं, दत्त कुरुत, ( यस्य यौवनस्य तेऽभिमानमस्ति तत् ) पीनस्तनस्त-
म्भनमुत्तुङ्गकुचपतनप्रतिरोधकं तारुण्यं यौवनं पञ्च दश वा दिवसानि
( यावत् ) तिष्ठेदिति शेषः, यौवनं नितरामस्थायीति भावः । इत्थमेवं-
प्रकारिका, कोकिलानां कलकण्ठानां मञ्जूमि मनोहराणि यानि शिञ्जि-
तानि कलकलानि तन्मिषात्तद्व्याजात् चैत्रमहोत्सवेन वसन्तागममुपलक्ष्य
कृतेन महोत्सवेन, कर्त्रा, सहसा, हठात्, पञ्चेषोः पञ्चबाणस्य देवस्य,
सर्वङ्कषा सर्वध्वंसिनी सर्वप्रबलेति यावत्, आज्ञाऽऽदेशः प्रदत्तेव ।
‘‘गन्तव्यं यदि नाम’’ इस पद्य में ‘‘पश्यामि यावन्मुखम्’’ इत्यादि के द्वारा
प्रतीत होने वाली अत्युत्कंठा से समृद्धिशाली प्राकरणिक शृंगाररस का स्वभावतः
विरोधी शान्तरस को अंग बना देने पर वैराग्य के द्वारा रति ( शृंगार-रस के
स्थायी भाव ) को दबा देने वाले विस्तृत अनित्यता-प्रतिपादन से प्रधान रस
( शृंगार ) का सम्बन्ध सर्वथा अनुचित प्रतीत होने लगता है, क्योंकि संसार
की अनित्यता के श्रवण से जब कठिन हृदय वाले का भी उत्साह नष्ट हो जात।
८८ औचित्यविचारचर्चा
है, अंग शिथिल हो जाते हैं, तब प्रकृतिकोमल शृंगार-रस से स्निग्ध हृदय वालों
के विषय में कहना ही क्या है ? तात्पर्य यह कि—अन्त तक शान्त के परिपोष से
राग की विरसता ही व्यक्त होतो है । जैसा कि आचार्य आनन्दवर्धन ने कहा है ।
विरोधी वेति—विरोधी या अविरोधी कोई भी रस यदि रसान्तर में अंग हो
जाय तो अन्त तक उस ( अंगभूतरस ) का परिपोष नहीं होना चाहिए, इससे
विरोध भाव नहीं आने पता है । अर्थात् अंगभूतरस का यदि अन्त तक निर्वाह
नहीं होता हो तो विरोधभाव की स्थिति नहीं आने पाती है । लेकिन यहाँ तो
स्थिति ही विपरीत है, क्योंकि अन्त तक अंगभूत विरोधी रस शान्त का निर्वाह
किया गया है जिससे औचित्य का पर्णतः व्याघात हो गया है ।
यदि अन्त तक परिपोष नहीं होता हो तो स्वभावविरोधी रस का वर्णन
रहने पर भी प्रधानरस का रोध नहीं होता है—पूर्वोक्त इस अर्थ को लक्ष्य में
दिखाने के अभिप्राय से कहा गया है—यथा राजशेखरस्येति । मानं मुञ्चतेति ।
हे मानिनियो ! मान छोड़
संस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता ८९
तेन विपरीतवर्णनोत्पन्नेनानौचित्येन, स्थायी मुख्यो रसः, श्वभ्रपातितो
गर्तपातितो, हस्तीव, पुनरुत्थातुं नोत्सहते न समर्थो भवति, इत्यलं
निरर्थक, विस्तरेण विस्तृतवर्णनेन । अनया दिशाऽनेनैव प्रकारेण, रस-
सङ्करेऽन्यान्यरसम्मिश्रणे भेदप्रपञ्चौचित्यं भेदविस्तारौचित्यं, विपश्चि-
द्भिर्विद्वद्भिः, स्वयं विचार्य स्वयमेवोहनीयमिति भावः ॥ १८ ॥
“मानं मुञ्चध” इस पद्य में मुख्य रस श्रृंगार है जो कि आमूलचूलव्यापी
है । यहाँ “कतिपयदिवसस्थायि यौवनम्” इस कथन से शान्त-रस का समावेश
होने पर भी ( वह ) जल के समूह में एक बूंद के समान श्रृंगार के पेट में ही
विलीन हो जाता है, अतः मुख्य रस में विरसता को उत्पन्न करने में समर्थ नहीं
हो पाता है, क्योंकि अंगभूत-रस शान्त का अंत तक परिपोष नहीं होता है ।
जहाँ पर इसके विरुद्ध वर्णन हो जाता है वहाँ पर औचित्य नष्ट हो जाता है,
जिससे मुख्य रस, खाई में गिराये गये हाथी के समान पुनः सम्हल नहीं पाता
है । इस तरह रससंकर के और-और भेदों की विवेचना विद्वानों को स्वयं ( अपने
मुख से ) करनी चाहिए । यहाँ इससे अधिक विचार करना व्यर्थ है ॥ १८ ॥
रसौचित्यविचारानन्तरमुद्देशानुसारक्रमेण क्रमोपगतं क्रियापदौचित्यं
दर्शयितुमाह—
सगुणत्वं सुवृत्तत्वं साधुता च विराजते ।
काव्यस्य सुजनस्येव यद्यौचित्यवती क्रिया ॥१९॥
रसौचित्यविवेचनात्परं “पदे वाक्ये प्रबन्धार्थे” इत्याद्युद्देशक्रमप्राप्तं
सप्तमं क्रियापदौचित्यं प्रदर्शयितुमुपक्रमते—सगुणत्वमिति । सुजनस्येव
काव्यस्य सगुणत्वं माधुर्यादिगुणवत्त्वं, सुवृत्तत्वं सुष्ठुवृत्तं छन्दो मन्दा-
क्रान्तादिकं यत्र तस्य भावस्तत्त्वं, साधुता सर्वविधव्याकरणादिलक्षण-
सम्पन्नतारूपा च, तदैव विराजत सुशोभते, यदि क्रिया-पचति-भवतीति
रूपं क्रियापदमौचित्यवत्यौचित्ययुक्ता भवतीति शेषः, यथा सज्जनानां
दयादाक्षिण्यादिगुणवत्त्वं, सदाचरणं सज्जनता च तदैव स्पृहणीयताम-
र्हति यदा क्रिया ( व्यापारः ) औचित्यानुप्राणिता तिष्ठति, तथैव काव्य-
स्यापि क्रियापदौचित्येनेव गुणादीनां स्पृहणीयत्वमिति भावः ।
रसौचित्य की विवेचना कर चुकने के बाद क्रमानुसार सातवें क्रियापदौ-
चित्य की परिभाषा स्पष्ट करने के अभिप्राय से कहा गया है—सगुणत्वमिति ।
अर्थात् जैसे सज्जनों का दया-दाक्षिण्यादि गुण, व्यवहार, कुशलता और साधुता
९० औचित्यविचारचर्चा
( अच्छाई ) तभी स्पृहणीय होती है जब उनके कर्तव्य सर्वदा औचित्य से अनु-
प्राणित होते रहें, उसी तरह काव्य के भी माधुर्यादि गुण, अच्छे-अच्छे छन्द
और व्याकरणानुसार शाब्दिक शुद्धि आदि तभी सुशोभित होते हैं यदि क्रियापद
औचित्य से युक्त हों ।
काव्यस्य माधुर्यादिगुणवत्ता वसन्ततिलकादिसुवृत्तता परिपूर्णलक्षण-
साधुता च विराजते, यद्यौचित्ययुक्तं क्रियापदं भवति सुजनस्येवेति
तत्तुल्यत्वं स्पष्टार्थमेव ।
कारिकार्थमेवोपपादयति—काव्यस्येति । काव्यस्य कविकृतेर्माधुर्यादि-
गुणवत्ता माधुर्यौजःप्रसादादिलक्षणगुणयुक्तत्वं, वसन्ततिलकादिसुवृत्तता
वसन्ततिलकेन्द्रवज्रादिसुन्दरवृत्तत्वम् परिपूर्णलक्षणसाधुता च परिपूर्णं
प्रवृत्तं लक्षणं पाणिन्यादिसूत्रं येषु शब्देषु तेषां तत्प्रयुक्तेति यावत्, या काव्य-
गता साधुता शुद्धित्वमथवा सर्वथा काव्यलक्षणानुसारितेति समुदायार्थः,
तदेव, राजते शोभते, यदि क्रियापदं भवति गच्छतीत्यादिरूपमौचित्य-
युक्तमौचित्यान्वितं भवति सुजनस्येवेत्यस्य तत्तुल्यत्वरूपोऽर्थः स्पष्ट एव ।
कारिका के अर्थ को स्पष्ट कह रहे हैं—काव्यस्येति । काव्य की माधुर्यादि-
गुणवत्ता, वसंततिलकादिसुवृत्तता और सर्वलक्षणसंपन्नता तभी स्पृहणीय होती है
यदि क्रियापद औचित्ययुक्त हो । “सत्पुरुषस्येव” इस कथन से ज्ञात होनेवाली
काव्य की सत्पुरुष के साथ समानता स्पष्ट ही है ।
क्रियापदौचित्यं यथा मम नीतिलतायाम्—
यः प्रख्यातजवः सदास्थितिविधौ सप्ताब्धिसन्ध्यार्चने,
दोर्दर्पेण निनाय दुन्दुभिवपुर्यः कालकङ्कालताम् ।
यः पातालमसृङ्मयं प्रविदधे निष्पिष्य मायाविनं,
सुग्रीवाद्यविभूतिलुण्ठनपटुर्वालो स किं स्मर्यते ॥
क्रियापदौचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा मम नीतिलतायामिति । यः
प्रख्यातेति । शुकसारणयोः रावणं प्रत्युक्तिरियम् । सप्तसु अब्धिषु समुद्रेषु
सन्ध्याया अर्चने वन्दने, स्थितिविधौ वर्तमानत्वे, यः ( बाली ) सदा
सर्वदा, प्रख्यातः प्रसिद्धो जवो वेगो यस्य सः, सप्तस्वपि समुद्रेषु
सन्ध्यावन्दनं करिष्यामीति प्रतिज्ञापूर्त्यर्थं सन्ध्यात्मकस्वल्पकालेनैव
सप्तसमुद्रगमने निजवेगं प्रादर्शयदित्यभिप्रायः । ( यथा ) यो दोर्दर्पेण
बाहुबलाभिमानेन, दुन्दुभिवपुर्महिषरूपधारिणो दुन्दुभिनामकस्य राक्षस-
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ९१
स्य शरीरं, कालेन मृत्युना मृत्युद्वारेति भावः, 'कालो मृत्यौ महाकाले'
इत्यमरकोशबलात्कालस्य महाकालस्य यमस्य वेत्यर्थः । कङ्कालत्तामस्थिपञ्ज-
रावशेषित्वं, निनाय प्रापयत् । ( एवमेव ) यो मायाविनं तन्नामकं
पातालवासिनं राक्षसं, निष्पेष्य विनाशय, पातालं रसातलं, असृङ्मयं
शोणितमयं, प्रविदधेऽकरोत् । सुग्रीवस्य स्वानुजस्य अग्र्यविभूतेः प्रधान-
सम्पत्तेर्धनदारादेः, विलुण्ठनेऽपहरणे, पटुर्दक्षः स वाली किं स्मर्यते ?
क्रियापदौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है--यथा ममेति ।
यःप्रख्यातेति । शुक-सारणों के द्वारा रावण को संबोधित कर कहा जा रहा है कि
हे राजन् ? जो ( बाली ) संध्या-वन्दनादि कृत्य करने के लिए सातों समुद्र की
यात्रा बड़ी शीघ्रता से कर लिया करता था, तथा जिसने अपने बाहुबल से
महिषरूपधारी दुन्दुभि नामक राक्षस के शरीर को मृत्यु के द्वारा अस्थिपंजर का
ढाँचामात्र बनाकर छोड़ा एवं मायावी नामक पातालतलवासी राक्षस को पीस
कर ( मार कर ) उसके खून से समूचे पाताल लोक को रक्तरंजित कर दिया
था, राज्यनिष्कासन, धनदारादिहरण प्रभृति दण्डों के द्वारा अपने अनुज के
भविष्य का लुटेरा क्या उस बाली का स्मरण कर रहे हैं ?
अत्र सप्ताब्धिसन्ध्यार्चनप्रख्यातजवो महिषरूपदुन्दुभिदानवोन्माथी
मायाविदानवनिष्पेषोद्भूतशोणितपूरितपातालतलः स किं वाली स्मर्यत
इति क्रियापदेन शुकसारणाभ्यां रावणस्य दुर्नयाभिनिवेशिनस्तद्विरामाय
हितोपदेशेन भवान्वसनकोणनियमिततनुः कक्षायां निःक्षिप्त इत्युचितयुक्ति-
युक्तमुक्तं भवति ॥
अत्रोक्तपद्ये, "सप्ताब्धीत्यारभ्य स किं वाली स्मर्यते" इति पर्यन्त-
वाक्योत्थेन "स्मर्यते" इत्याकारकेण क्रियापदेन, शुकसारणाभ्यां तन्नाम-
करावणानुचराभ्यां, दुर्नयाभिनिवेशिनो दुर्नीतिप्रवृत्तस्य रावणस्य,
विरामायासतपथात्प्रत्यावर्तनाय, हितोपदेशेन हितकारकोपदेशदानद्वारा,
"भवान् वसनकोणनियमिततनुः वस्त्रकोणबद्धशरीरः, कक्षायां निःक्षिप्तः,
अर्थात्स वाली भवन्तं वस्त्रझोलिकायां संस्थाप्य कक्षायां लम्बयित्वा
स्थापितवानासीदित्याकारकमूचितयुक्तियुक्तं समुचिततर्कसंवलितमुक्तं
प्रतिपादितं भवति । इदमत्राकूतं यत् प्रस्तुतपद्ये वालिनो वर्णने नैवं
किमप्युपलभ्यते येन वालिस्मरणमसङ्गतं स्यादथापि निषिध्यमानया
स्मरणक्रिययेदमध्यवसितं भवति यदत्र निषेधेऽस्ति किंचिद्रहस्यं यच्च
९२ औचित्यविचारचर्चा
रावणशातनतो नापरं किंचिदिति सुतरामवगम्यते एतच्च क्रियापदस्यैव
माहात्म्यमिति तदौचित्यं स्पष्टमेवेति दिक्।
इस पद्य में संध्यावंदन करने के लिए सातों समुद्रों की यात्रा करने में
अप्रतिहतगतिवाले महिषरूपधारी दुन्दुभि नामक राक्षस का विनाशक, मायावी
दानव के निष्पेषण (मारण) से समूचे पातालतल को रक्तरंजित कर देनेवाले
उस बाली का स्मरण क्या कर रहे हैं? इस वाक्य के निषेधात्मक क्रियापद से,
शुक-सारणों के द्वारा दुर्वृत्ती रावण को दुष्पथ से लौटाने के लिए जो उपदेश
किया गया है, उससे व्यक्त होता है कि कपड़े की झोली में डाल कर आपको
उस बाली ने कक्षा (बगल) में लटका लिया था। कहने का तात्पर्य यह है कि
यहाँ बाली के वर्णन से ऐसा आभास नहीं मिलता है कि बाली नगण्य था या
स्मरण करने योग्य नहीं था। फिर निषिध्यमान स्मरणक्रियावाचक पद के द्वारा
यह सिद्ध होता है कि इसमें कुछ रहस्य है, और वह रहस्य रावण को झोली में
डाल कर बगल में लटका लेने के सिवा और कुछ नहीं है, इस अभिव्यक्ति का
कारण क्रियापद ही है। इसलिए क्रियापदौचित्य का यह स्पष्ट उदाहरण कहा जा
सकता है।
न तु यथा श्रीप्रवरसेनस्य—
सग्गं अपारिजाअं कोत्थुहलच्छिरहिअँ महुमहस्सउरं।
सुमिरारम महणपुरओ समुद्धअन्दं हरजडापब्भारं॥
क्रियापदानौचित्यस्योदाहरणमुपस्थापयितुमाह-न तु यथेति।
'सग्गं इति ।
स्वर्गमपारिजातं कौस्तुभलक्ष्मीभ्यां विरहितं मधुमथनस्योरः।
स्मराम्यमृतमथनपुरतोप्यबालचन्द्रं हरजटाप्राग्भारम् ॥ इति छाया।
स्वर्गमिति। अमृतमथनपुरतोऽपि समुद्रमन्थनात्पूर्वमपि, अस्य सर्वत्र
सम्बन्धः, अपारिजातं पारिजातकुसुमकाननरहितं, स्वर्गं सुरलोकम्,
कौस्तुभलक्ष्मीभ्यां कौस्तुभमणिरमाभ्यां, विरहितं शून्यं, मधुमथनस्य
मधुसूदनस्य विष्णोरित्यर्थः, उरो हृदयस्थलम्, अबालचन्द्रं शिशुशशाङ्क-
रहितं, हरजटाप्राग्भारं शिवजटाजूटग्रन्त्यग्रभागं, स्मरामि ध्यायामि।
समुद्रमन्थनात्प्राक्तनो मम जीवनकाल इति भावः।
क्रियापदानौचित्य को प्रदर्शित करने के लिए कहा गया है--न तु यथा प्रव-
रेति। स्वर्गमिति। मैं (जाम्बवान्) समुद्रमंथन से पूर्वकालिक पारिजातपुष्प से
रहित स्वर्ग, लक्ष्मी और कौस्तुभ मणि से शून्य भगवान् विष्णु के हृदय ओर
बालचन्द्र से हीन शंकर की जटाजूट ग्रंथि का स्मरण कर रहा हूँ। अर्थात् समुद्र-
मंथन आदि मेरे जीवनकाल की घटना है—मैं उससे भी पुराना हूँ ।
अत्र जाम्बवताऽभिधीयमाने “स्वर्गमपारिजातं कौस्तुभलक्ष्मीभ्यां
विरहितं मधुमथनस्योरः, स्मराम्यमृतमथनपुरतोऽप्यबालचन्द्रं हरजटा-
प्राग्भारम्” इति प्रगुणगुणाख्यानप्रसङ्गे क्रियापदेन जराजर्जरशरीरत्व-
मात्रमेव प्रतिपादितम्, न तु पौरुषोत्कर्षविशेषातिशयः कश्चिदुचितः
संसूचितः ॥ १९ ॥
अत्र जाम्बवताऽभिधीयमाने प्रतिपाद्यमाने “सग्गं....” इति पद्ये
पारिजातादिरहित-समुद्रमन्थनप्राक्कालिक-स्वर्गादिकर्मक-स्मरण-क्रियावर्ण-
नेन वक्तुर्जाम्बवतः केवलं जराजर्जरशरीरत्वमेव कथितं भवति, न तु
कश्चन पुरुषार्थोत्कर्षातिशयः सूचितो भवति । प्रसङ्गश्चात्र प्रगुण-
गुणाख्यानस्य ( प्रकृष्टगुणकथनस्य ) । अतोऽत्रानुचितमेतादृशार्थबोधकं
स्मरामीति क्रियापदमिति भावः ॥ १९ ॥
इस पद्य में जाम्बवान् ने “स्वर्गमपारिजातम्” इत्यादि के द्वारा अपने गुण-
कीर्तन के प्रसंग में “स्मरामि” इस क्रियापद का जो प्रयोग किया है, उससे मैं
इतना पुराना हूँ मेरा यह जराजर्जर शरीर इतने दिनों का है, केवल यही अर्थ
व्यक्त होता है, कोई विशिष्ट पुरुषार्थ सूचित नहीं होता । प्रसंग तो यहाँ अपने
प्रकृष्ट गुणों के कीर्तन का है, अतः यहाँ यह क्रियापद समुचित नहीं है ॥ १९ ॥
कारकोचित्यं दर्शयितुमाह—
सान्वयं शोभते वाक्यमुचितैरेव कारकैः ।
कुलाभरणमैश्वर्यमौदार्यचरितैरिव ॥२०॥
क्रियापदौचित्यानौचित्यप्रदर्शनानन्तरं क्रमागतमष्टमं कारकोचित्यं
विवेचयितुमाह—कारकोचित्यमिति । सान्वयमिति । कुलं सद्वंश
आभरणं भूषणं यस्यैवंभूतमैश्वर्यम् सम्पत्तिः औदार्यचरितैरोदार्यादिसच्छ-
रित्रैर्यथा शोभते तथैव सान्वयमन्वयेन युक्तं वाक्यं पदसमूहः, उचितैः
समुचितैरेव कारकैः कर्तृकर्मादिरूपैः शोभते ।
क्रियापद के औचित्य और अनौचित्य को दिखलाकर संप्रति क्रमप्राप्त आठवें
कारकोचित्य की विवेचना करने के लिए कहा गया है—कारकोचित्यमिति ।
सान्वयमिति । जैसे सद्वंश से विभूषित भी ऐश्वर्य-औदार्य आदि साधुचरित्र से ही
२४ औचित्यविचारचर्चा
शोभित होता है, उसी तरह अन्वय आदि से अच्छी तरह युक्त वाक्य (काव्यरूप)
भी उचित कारक के प्रयोग से ही सुशोभित होता है ।
उचितैरेव कारकैः सदन्वयवद्वाक्यं विराजते सद्वंशभूषितमैश्वर्यं
सच्चरितैरिव ।
कारिकार्थं विवृणुते—उचितैरेवेति । सदन्वयवद्वाक्यं समुचितान्वय-
परिलसितः पदसमूहः सच्चरितैः साध्वाचारैः सद्वंशभूषितमुत्तमकुलालङ्कृ-
तमैश्वर्यमिव उचितैरनुरूपैः कारकैरेव विराजते सुशोभते ।
कारिकार्थ की व्याख्या करने के लिए कहा गया है—उचितैरेवेति । अनुरूप
अन्वय से परिलसित वाक्य, सदाचार से सत्कुलालंकृत संपत्ति की तरह अनुरूप
कारक से ही सुशोभित होता है ।
कर्तृपदौचित्यं यथा भट्टबाणस्य—
स्तनयुगमश्रुस्नातं समीपतरवर्ति हृदयशोकाग्नेः ।
चरति विमुक्ताहारं व्रतमिव भवतो रिपुस्त्रीणाम् ॥
कारकपदौचित्यप्रदर्शनप्रसङ्गे प्रथमं कर्तृपदौचित्यमुपस्थापयितुमाह--
यथा भट्टबाणस्येति । स्तनयुगेति । राज्ञः शूद्रकस्याशीर्वचनरूपेण शुकद्वारा
पठितोऽयं श्लोकः । हे राजन् ! भवतस्तव, रिपुस्त्रीणां शत्रुकामिनीनां,
स्तनयुगमुत्तुङ्गकुचद्वन्द्वम्, अश्रुस्नातं नयनजलकृतस्नानं, हृदयशोकाग्नेर्हृदये
चित्ते स्वपतिवियोगजनितः शोक एवाग्निर्वह्निस्तस्य समीपतरवर्ति
निरतिशयसमीपस्थायि, विमुक्ताहारं विगतः पत्युर्विनाशेन दूरमपसृतो
मुक्ताहारो मौक्तिकमाला यस्मात् तत् (पक्षान्तरे विमुक्तस्त्यक्त आहारो
भोजनं येन तत्), तथाभूतं सत् व्रतमिव चरति व्रतोपासनमिव करोति ।
यथा कश्चित्सद्व्रती त्रिकालं स्नात्वा भोजनादिकं परित्यज्याग्निं निषेव-
माणो व्रतमाचरति तथैव भवद्द्वारा शत्रुसंहारेण तत्कामिन्यो रोदनैः
स्तनयुगं स्नपयति, हृदये शोकज्वालामधिकाधिकं बिभर्ति, हारादिकमा-
भूषणं च परित्यजति, एतदाचरणेन विभाति यत्तत्कुचद्वन्द्वं स्नातर्मग्नि
सेवमानं विमुक्ताहारं च सत् व्रतमाचरतीवेति भावः ।
कारकोचित्य के प्रदर्शनक्रम में प्रथमतः कर्तृपदौचित्य का उदाहरण दिखाने
के लिए कहा गया है--यथा भट्टबाणस्येति । राजा शूद्रक की आशीर्वाद देने के
रूप में शुक के द्वारा यह श्लोक पढ़ा गया है--स्तनयुगेति । हे राजन् ! आपके
शत्रुओं की स्त्रियों के कुचद्वय नेत्रजल से स्नान कर हृदयस्थित शोकाग्नि के पास
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ९५
रह कर तथा मौक्तिकमाला ( पक्षान्तर में भोजन ) का त्याग कर मानो सद्व्रती
के समान व्रताचरण कर रहा हो ।
अत्र शत्रुस्त्रियो व्रतं चरन्तीति वक्तव्ये स्तनयुगं बाष्पसलिलस्नातं
शोकाग्निसमीपवर्ति विमुक्तभोजनं विगतमुक्ताहारं च सद्व्रतं चरतीत्युक्ते
कर्तृपदमौचित्यमुपचितं जनयति ।
अत्रोक्तपद्ये, "शत्रुस्त्रियो व्रतं चरन्ति" इति वक्तव्येऽभिधातव्ये,
"स्तनयुगं बाष्पसलिलस्नातं, शोकाग्निसमीपवर्ति, विमुक्तभोजनं विगत-
मुक्ताहारं च सत् सद्व्रतं चरति" इत्युक्ते इति कथने कर्तृपदं स्तनयुग-
मिति पदम्, उपचितं समृद्धम्, औचित्यं जनयति ।
इस पद्य में "शत्रु की स्त्रियाँ व्रत का आचरण कर रही हैं" ऐसा कहने के
अभिप्राय से "उसके कुचद्वय बाष्पजल से स्नात, हृदयस्थ शोकाग्नि के समीपवर्ती,
भोजन और मौक्तिकहारादि का त्याग कर सद्व्रत का आचरण कर रहा है"
ऐसा कहने पर "स्तनयुगम्" इस कर्तृपद के औचित्य से एक अपूर्व स्पृहणीयता
का समावेश हो जाता है ।
न तु यथा परिमलस्य—
आहारं न करोति नाम्बु पिबति स्त्रैणं न संसेवते,
शेते यत्सिकतासु मुक्तविषयश्चण्डातपं सेवते ।
त्वत्पादाब्जरजः प्रसादकणिकालोभोन्मुखस्तन्मरौ,
मन्ये मालवसिंह ! गुर्जरपतिस्तीव्रं तपस्तप्यते ॥
कर्तृपदानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह - न तु यथा परिमलस्येति । गुर्जर-
देशविजयानन्तरं मालवपतेः प्रशंसायां प्रयुक्तोऽयं श्लोकः—आहारमिति ।
हे मालवसिंह मालवाधीश्वर ! ( पराजितो गुर्जरपतिर्मरुगहनं प्रविश्य )
आहारं भोजनं, न करोति दुःखतोऽनुपलब्धेर्वा हेतोरिति भावः । अम्बु
जलं न पिबति. स्त्रीणां समूहः स्त्रैणस्तं न संसेवते नोपास्ते, सिकतासु
बालुकासु भूमिष्विति भावः, शेते, मुक्तविषयस्त्यक्तस्रक्चन्दनादिः,
चण्डातपं दुःसहसूर्यरश्मिं, यद् यस्मात्सेवते तत्तस्मात् तव पादावेवाब्जे-
कमले, तयोः रजांसि धूलयस्तान्येव प्रसादस्तस्य कणिकायाः कणमात्रस्य
लोभेनोन्मुखस्तत्परः सन्, मरौ मरुभूमौ, तीव्रं कठिनं, तपस्तपस्यां तप्यते
इति मन्ये ।
कर्तृपदानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है--न तु यथा
९६ औचित्यविचारचर्चा
परिमलस्येति । गुर्जर देश की विजय कर लेने के बाद मालवाधीश की प्रशंसा में
यह श्लोक कहा गया है--आहारमिति । हे मालवाधीश ! ( पराजित होकर
गुर्जराधिपति मरुकानन में प्रवेश कर ) न भोजन करता है, न जल ही पीता है,
स्त्रियों को तो पास भी नहीं फटकने देता, भूमि पर ही शयन करता है, विषय
( स्रक्-चन्दनादि ) का त्याग कर सूर्य की दुःसह किरणों में देह सुखा रहा है।
मालूम होता है जैसे तुम्हारी कृपा प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या कर रहा हो।
अत्र गुर्जरपतिर्विद्रुतो मरुगहनं प्रविष्टः परित्यक्ताहारादिसमस्त-
विषयश्चण्डातोपसेवी तपश्चरतोति यदुक्तं तत्कर्तृपदस्य विशेषाभि-
प्रायोचितं न किञ्चिदुपलक्ष्यते शत्रुत्रासतरलतया मरुकान्तारान्तरा वसन्नः
सकलविषयसुखभोगपरिभ्रष्टः किमन्यत्कुरुताम् । स्तनयुगवत्कर्तृपदस्य
चमत्कारोचितं न किंचिदभिहितम् ।
अत्र पद्ये, विद्रुतः पलायितो गुर्जरपतिर्मरुगहनं मरुकाननं प्रविष्टः,
परित्यक्ताहारादिसमस्तविषयः परिहृतभोजनादिसंपूर्णासांसारिकबन्धनः,
चण्डातोपसेवी दुःसहरौद्रसेवनशीलस्तपस्यां चरति—इत्येवंरूपेण
यदुक्तं यदुपन्यस्तं तत् कर्तृपदस्य गुर्जरपतिरूपस्य, विशेषाभिप्रायोचितं
तात्पर्यविशेषानुरूपं न किञ्चित् उपलक्ष्यते विज्ञायते, (यतो हि) शत्रु-
त्रासतरलतया शत्रुभयचञ्चलतया, मरुकान्तारान्तरावसन्नो मरुकानना-
भ्यन्तरनिवासावसादशीलः, सकलविषयसुखभोगपरिभ्रष्टः सम्पूर्णसांसा-
रिकविषयभोगवञ्चितः अन्यदपरं किं कुरुताम् । स्तनयुगवत् स्तनयुगमश्रु-
स्नातमिति पद्यस्थस्तनयुगानुरूपमत्र कर्तृपदस्य चमत्कारोचितं विच्छित्ति-
विशेषजनकं न किमपि कथितम् । मरुकानने प्रोक्तसकलसामग्रीसमुप-
लब्धेर्नितरामसम्भवतया तदसेवनातिरिक्तस्य पथोऽभावेन तत्त्यागस्यैव
नान्तरीकतयौचित्यमिति नैतत्कथनेन किमप्यपूर्वमभिहितं भवतीति
सिद्धमस्य कर्तृपदस्यानौचित्यमिति बोध्यम् ।
इस पद्य में--“पराजित होकर गुर्जरराज मरुकानन में प्रवेश कर गये हैं,
आहारादि समस्त विषय-वासनादिक से वञ्चित होकर तीव्र सूर्यरश्मि को सहते
हुए कठिन तपस्या कर रहे हैं।” इस कथन से कुछ ऐसा विशेष अभिप्राय
परिलक्षित नहीं हो रहा है जिससे कि कर्तृपद का औचित्य सिद्ध हो सके, क्योंकि
शत्रु के डर से मरुभूमि-निवासजन्य अवसाद से युक्त सभी वैषयिक सुखभोग
से रहित होकर वे बेचारे और कर ही क्या सकते हैं ? जैसे पूर्वोक्त श्लोक—
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ९७
( "स्तनयुगमश्रुस्नातम्" ) के स्तनयुगकर्तृक तप से एक अनिर्वचनीय आनन्द
की अनुभूति होती है उस तरह यहाँ कोई चमत्कारी अर्थ व्यक्त नहीं होता है,
इसलिये यहाँ पर कर्तृपद का अनौचित्य स्पष्ट ही परिलक्षित हो रहा है।
कर्मपदौचित्यं यथा मम लावण्यवत्याम्—
सदा सक्तं शैत्यं विमलजलधारापरिचितं,
घनोल्लासः क्ष्माभृत्पृथुकटकपातो वहति यः।
विधत्ते शौर्यश्रीश्रवणनवनीलोत्पलरुचिः,
स चित्रं शत्रूणां ज्वलदनलतापं भवदसिः॥
कर्तृपदोचित्यप्रदर्शनानन्तरं कर्मपदौचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा मम
लावण्येति। सदासक्तमिति। यः ( भवदसिः ) क्ष्माभृतां राज्ञां पृथौ
विस्तीर्णे कटके सेनायां, पाती पतनशीलः, जलाशयपक्षे क्ष्माभृतः पर्वतस्य,
पृथौविस्तीर्णात्कटकात्सान
९८ औचित्यविचारचर्चा
काम करने वाली वह ( तुम्हारी तलवार ) शत्रुओं के हृदय में प्रज्वलित अग्नि
के ताप के समान संताप उत्पन्न कर देती है—यह आश्चर्य है, क्योंकि जलधारा
की समता रखनेवालों के लिये शैत्यप्रदान स्वाभाविक गुण होना चाहिए । यहां
तो उसके विरुद्ध यह संताप प्रदान कर रही है । फिर क्यों न आश्चर्य हो ?
अत्र निश्चलममलजलधारागतं शैत्यं तैक्ष्ण्यं शीतलत्वं च घनोल्लासो
निबिडोत्साहः पर्जन्यतुल्योदयश्च क्ष्माभृतां सानुसैन्यनिपाती वहति सः
शौर्यश्रीश्रवणनवनीलोत्पलतुल्यस्त्वत्खड्गश्चित्रं शत्रूणां संतापं करोतीति
यदुक्तं तत्कर्मभूतस्य तापस्य शिशिरतरसामग्रीजन्मनः परं वैचित्र्यं
रुचिरमौचित्यमासूत्रितम् ।
अत्रोक्तपद्ये, शैत्य-विमलजलधारापरिचित-घनोल्लासक्ष्माभृत्कट-
कपातीतिपदानि द्व्यर्थकानि तेषामेकमेकमर्थमादायापाततोऽसेः शीतलता-
धारित्वं प्रतीयते, एवं शौर्यश्रीत्यादिविशेषणेनापि कमलतुल्यत्वबोधनद्वारा
तस्य शिशिरत्वमेव पोष्यते, एवञ्च तादृशशिशिरतरसामग्रीसंभूतासिनिष्ठ-
कृतसाध्यत्वं तापस्य विरुद्धमप्युच्यमानं चमत्कारविशेषविधायकमिति
कर्मकारकोचित्यस्योदाहरणतामासादयति पद्यमेतदिति भावः ।
उक्त पद्य में तलवार की समता निर्मल और शीतल जलवाली नदी से
दिखायी गयी है फिर उसके द्वारा ताप की सृष्टि की गयी है । इस तरह शीतल
उपादान से अग्नि के समान ताप की उत्पत्ति का प्रतिपादन यहाँ एक अपूर्व
औचित्य का द्योतक हो गया है जिससे सहृदयों के हृदय में एक विलक्षण
चमत्कार का उदय हो जाता है । यह सारी विचित्रता कर्मपद के वैशिष्ट्य से
ही सम्भव हुई है, इसलिए यह कर्मपदौचित्य का स्पष्ट संकेत कर रहा है ।
न तु यथा ममैवावसरसारे—
भग्नाहितश्वसितवातविबोध्यमानः
काष्ठाश्रयेण सहसैव विवृद्धिमाप्तः ।
तापं तनोति निहतारिविलासिनीनां
वह्निद्युतिर्भुवननाथ ! भवत्प्रतापः ॥
कर्मपदानौचित्यं दर्शयितुमाह—न तु यथा ममैवेति । भग्नेति ।
भुवननाथ ! हे राजन् ! भग्ना विद्रुता येऽहिताः शत्रवस्तेषां श्वसितवातेन
निःश्वासपवनेन विबोध्यमानः प्रज्वाल्यमानः, काष्ठाश्रयेण दिग्दिगन्तश्र-
यणेन, दारुसम्बन्धेन च, विवृद्धिमतिशयप्रौढतामाप्तः, प्राप्तः, अत एव
वह्निद्युतिरग्नितुल्यकान्तिः, वह्निरपि पवनेन प्रज्वाल्यते, काष्ठस्य ( इन्ध-
नस्य ) आश्रयणमवाप्य निरतिशयं विवर्धते, भवत्प्रतापोऽपि तथैवाच-
रतीत्युभयोस्तुल्यतेति भावः । भवत्प्रतापः निहतारिविलासिनीनां मारित-
शत्रुस्त्रीणां, तापं सन्तापं, तनोति विस्तारयति ।
कर्मपदानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है--न तु यथा
ममैवेति । भग्नेति । हे राजन् ! आपका प्रतापमर्दितशत्रुओं के निःश्वासवायु से
प्रज्वलित काष्ठ ( इन्धन ) के संयोग से अतिशय विवृद्ध, अग्नि के समान, मारे
गये शत्रुओं की स्त्रियों के सन्ताप की वृद्धि कर रहा है ।
अत्र विद्रुतारिनिःश्वसितानिलप्रबोध्यमानः काष्ठाश्रयेण दिक्चक्र-
पूरणेन प्रौढतां प्राप्तः पावकतुल्यस्त्वत्प्रतापः शत्रुकान्तानां तापमात्रं तनो-
तीति तत्समुचितमाश्चर्यं न किंचित् ।
अत्रोक्तपद्ये विद्रुतारिनिःश्वसितेत्यारभ्य शत्रुकान्तानां तापमात्रं
तनोतीति यदुक्तं तत् समुचितमुचितमेव, नाश्चर्यं न विस्मयजनकं किंचित्
किमपि । अर्थात् वह्नेर्दाहकत्वं स्वाभाविकमेव, तदकरणमेवानुचितम्, अत
एवात्र प्रतापस्य सर्वथाग्नितुल्यतया तत्कर्तृकसन्तापरूपकर्मणो प्यानुषङ्गि-
कत्वमेवेति तद्वर्णनेन न किमपि वैशिष्ट्यमुद्भासितमिति सिद्धं कर्मपदानौ-
चित्यमिति बोध्यम् ।
इस पद्य में राजा के प्रताप की महिमा को बढ़ाने के लिए ऐसे-ऐसे विशे-
षणों का प्रयोग किया गया है जिससे आग के साथ उसकी पूरी समता सिद्ध हो
जाती है फिर उस प्रतापाग्नि के द्वारा मारित राजाओं की पत्नियों को सन्ताप
प्रदान कर समता की शेष कमी की भी पूर्ति की गयी है, इस तरह पद्य बहुत
ही सुन्दर प्रतीत होता है, परन्तु औचित्यवाद की कसौटी पर कसने से ज्ञात
होता है कि इसमें का कर्मपद उचित हुआ, क्योंकि ताप देना अग्नि का स्वाभाविक
गुण है, न देना ही अनुचित होता । अतएव यहाँ पर राजा का प्रताप जब अग्नि-
तुल्य सिद्ध हो गया है तब उसका भी संतापमात्र प्रदान करना एक साधारण
बात हुई, कुछ विशेष नहीं । ऐसी स्थिति में इस वर्णन से सहृदयों के हृदय में
आनन्द-विशेष का संचार न होकर एक उपेक्षणीयता का ही भाव जग जाता है,
जो कि सत्काव्य के लिए एक भारी कलंक है । इसलिए यह कर्मपदानौचित्य का
उदाहरण हुआ है ।
१०० औचित्यविचारचर्चा
करणौचित्यं यथा गौडकुम्भकारस्य—
लाङ्गूलेन गभस्तिमान्वलयितः प्रोतः शशी मौलिना,
व्याधूता जलदाः सटाभिरुडवो दंष्ट्राभिरुत्तम्भिताः ।
प्रोत्तीर्णो जलधिर्दृशैव हरिणा स्वैराट्टहासोर्मिभि-
र्लङ्केशस्य च लङ्घितो दिशि दिशि प्राज्यः प्रतापानलः ॥
कर्मपदौचित्यानौचित्ये प्रदर्श्य सम्प्रति करणपदौचित्यमुदाहर्तुमाह—
यथा गौडेति । लाङ्गूलेनेति । रामकार्यार्थं प्रस्थितस्य हनुमतो वर्णन-
मिदम् । हरिणा हनुमता, लाङ्गूलेन पुच्छेन, गभस्तिमान्सूर्यो वलयितो
वेष्टितः, मौलिना मस्तकप्रान्तेन शशी चन्द्रः प्रोतो व्याप्तः, सटाभिः
स्कन्धस्थरोमसङ्घैर्जलदा मेघा व्याधूता इतस्ततो विक्षिप्ताः निर्जिता इति
भावः, दंष्ट्राभिः दन्तैरुडवस्तारा उत्तम्भिता आयासिताः, दृशैव दृष्ट्यैव,
जलधिः समुद्रः प्रोत्तीर्णो लङ्घितस्तथा स्वैरस्य स्वेच्छया कृतस्याप्रतिह-
तस्येति भावः, अट्टहासस्याट्टाट्टहासस्योर्मिभिस्तरङ्गैः दिशि दिशि दिक्षु,
प्राज्यः प्रचुरो लङ्केशस्य रावणस्य, प्रतापानलः प्रभाववह्निर्लङ्घितः शमितः ।
कर्म पद का औचित्यानौचित्य दिखाकर अभी करणपदौचित्य का उदाहरण
दिखाने के लिये कहा गया है—यथा गौडेति । लाङ्गूलेनेति । हनुमान् के वर्णन-
प्रसंग में यह श्लोक कहा गया है । भगवान् राम के कार्य से महावीर हनुमान्
आकाशमार्ग से समुद्र-लंघन कर रहे हैं, इनके पूँछ की चमक से सूर्य, मस्तक की
कान्ति से चन्द्रमा, सटा ( पीठ पर के बाल ) की भयंकरता से मेघ, दाँतों की
द्युति से तारे अप्रतिभ हो रहे हैं, मालूम होता है जैसे दृष्टि से ही समुद्र फाँद
गये हों । इतना ही नहीं अपने अप्रतिहत अट्टाट्टहास के तरंग से दिशाओं में व्याप्त
रावण के प्रतापानल को क्षणमात्र में शान्त कर दिया हो ।
अत्र हरिणा हनुमता जलनिधितरणे तरणिलाङ्गूलेन वलयितः,
किरीटप्रान्तेन शशी प्रोतः, सटाभिर्मेघा व्याधूतास्तारा दंष्ट्राभिरायासि-
तास्तीर्णोऽब्धिर्दृष्ट्यैवाट्टहासतरङ्गैर्लङ्केशस्य विस्तीर्णः प्रतापाग्निः शमित
इति बहुभिः करणपदैरुत्साहाधिवासितैर्विस्मयशिखरारोहणसोपा-
नैरिव रघुपतिप्रभावारम्भविजयध्वजायमानस्य पवनसूनोरौचित्यातिशयः
प्रकाशितः ।
अत्र पूर्वपद्ये हनुमता जलनिधितरणे लाङ्गूलेन सूर्यो वेष्टितः, किरीट-
प्रान्तेन चन्द्रः प्रोतः, स्कन्धस्थरोमराजिभिर्मेघा व्याधूताः, दंष्ट्राभिस्तारा
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १०१
आयासिताः, दृशैवार्णधिस्तीर्णोऽट्टहासतरङ्गैर्लङ्केशस्य चतुर्दिक्षु प्रसरितः
प्रतापाग्निः शमित इत्येवंप्रकारेण उत्साहाधिवासितैरुत्साहव्यञ्जकैर्विस्मय-
शिखरारोहणसोपानैरिवाऽऽश्चर्यशृङ्गारोहणसोपानस्वरूपैरिव बहुभिरनेकैः
करणपदैः करणकारकबोधकपदैः तत्तत्कर्मणां सयुक्तिकत्वबोधनायप्रयुक्ता-
नैककरणपदैरिति भावः, रघुपतेः रामचन्द्रस्य, प्रभावस्य प्रतापस्यारम्भे
प्रारम्भे, विजयध्वजायमानस्य विजयपताकावदाचरतः, पवनसूनोर्महा-
वीरस्य हनुमतः, औचित्यातिशयो निरतिशयोचित्यं प्रकाशितो व्यक्तीकृतः ।
इस पद्य में समुद्र-तरण करते समय पुच्छ से सूर्य को, मस्तक की ज्योति से
चन्द्रमा को कन्धे के बालों से मेघ को, दन्तच्छवि से तारों को अप्रतिभ बनाते
हुये समुद्र को मानो दृष्टि से ही पार कर लिया हो तथा अपने अट्टहास के
तरंगों से सर्वत्र व्याप्त रावण के प्रतापानल को शान्त कर दिया--इत्यादि
उत्साहवर्धक तथा विस्मयजनक अनेक करणकारणबोधक पदों के प्रयोग से
रामचन्द्र के प्रभावारम्भ में विजयध्वज के समान आचरण करने वाले पवनसुत
हनुमान् का अत्यन्त औचित्य सिद्ध हो जाता है ।
जयत्युपेन्द्रः स चकार दूरतो बिभित्सया यः क्षणलब्धलक्षया ।
दृशैव कोपारुणया रिपोरुरः स्वयं भयाद्भिन्नमिवास्रपाटलम् ॥
करणपदानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह- जयत्युपेन्द्र इति । स प्रसिद्धः,
उपेन्द्रो भगवान्विष्णुर्नृसिंह इति यावत्, जयति सर्वोत्कर्षेण वर्तते । यो
नृसिंहो बिभित्सया विदारयितुमिच्छया, दूरतो दूरादेव, क्षणं निमेषमात्रं
नत्वधिककालं यावदिति भावः, लक्षं प्राप्तं, लक्ष्यं शत्रुवक्षःस्थलं
यया तया, तदुरःस्थले निपतन्त्येत्यर्थः, अत एव कोपेन क्रोधेनारुणया
रक्तवर्णया, दृशैव दृष्टयैव, न तु नखद्वारा भेदनेनेत्यर्थं, रिपोः शत्रोर्हिरण्य-
कशिपोरुरो वक्षःस्थलं, भयान्नृसिंहत्रासात्स्वयमात्मनैव, भिन्नं विदीर्ण-
मिवास्रपाटलं स्वीयारुणलोचनरश्मिनिपातेन शोणितवद्रक्तश्वेतं चकार
कृतवान् ।
करणपदानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है--जयत्युपेन्द्र
इति । जिस ( भगवान् नृसिंह ) ने हिरण्यकशिपु के हृदय को विदीर्ण करने की
इच्छा दूर से ही क्षण भर देख कर क्रोध से आरक्त अपनी आँखों के द्वारा मानो
भय से स्वयमेव विदीर्ण शत्रु ( हिरण्यकशिपु ) के वक्षःस्थल को श्वेतरक्त बना
दिया, वह जगद्-प्रसिद्ध ( नृसिंहरूपधारी ) भगवान् विष्णु जयी हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं ।
१०२ औचित्यविचारचर्चा
अत्र भगवतो नृसिंहस्य कोपरक्तया दृष्ट्यैव क्षणलब्धलक्षया हिरण्यक-
शिपोर्वक्षः स्वयं भयाद्भिन्नमिवेति यदुक्तं तन्महोत्साहपराक्रमस्य प्रति-
नायकस्य रिपोः प्रधाननायकप्रतापोद्दीपनोपकरणीभूताधिकधैर्यस्य स्वयं
विह्वलतया हृदयस्फुटनमित्युपचितमनौचित्यं “दृशैव” इति करणपदस्य
शिरसि विश्रान्तम् ।
अत्र पद्ये भगवतो नृसिंहस्य कोपारुणया क्षणमात्रलब्धलक्षया च
दृष्ट्यैव हिरण्यकशिपोर्हृदयं स्वयमेव भयाद्भिन्नमिवेति यत्प्रतिपादितं
तन्महोत्साहपराक्रमस्यात्युत्साहपराक्रमशीलस्य, प्रधाननायकस्य भगवतो
नृसिंहस्य, प्रतापस्योद्दीपने उद्बोधे उपकरणीभूतं कारणीभूतं, यदधिकधैर्यं
योऽधिको धैर्यातिशयस्तद्युक्तस्य, प्रतिनायकस्य प्रतिपक्षिणो रिपोः शत्रो-
र्हिरण्यकशिपोः स्वयं भयविह्वलतया स्वयमेव भयातुरत्वेन हृदयस्फुटन-
मिति यद्वर्णितं तेनोपचितं विवृद्धमनौचित्यमसमीचीनत्वं “दृशैव” इति
करणपदस्य शिरस्युपरि विश्रान्तम् । अयमत्राभिप्रायः—प्रतिपक्षिनिष्ठ-
चण्डत्वमेव प्रधाननायकस्य प्रतापोद्दीपने कारणं भवति, प्रकृते तु दृशैवेति
करणपदप्रयोगे तद्व्याघातः समुत्पद्यते तेन प्रधाननायकस्य महिमापचितो
भवति, यच्च न कवेर्न च पाठकानामेवाभिमतमित्यनुचिततमम्, सर्वमे-
तद्धि दृशैवेति करणपदजन्यमेव । तेन करणपदानौचित्यं स्पष्टमेवेति ।
उक्त पद्य में “निमेषमात्र देखने का अवसर प्राप्त करनेवाली क्रोध से
आरक्त, भगवान् नृसिंह की आँखों के द्वारा भय से खुद ही विदीर्ण हिरण्यकशिपु
के वक्ष को” ऐसा जो कहा गया है वह अत्यन्त अनुचित है, क्योंकि पराक्रमशील
प्रतिनायक हिरण्यकशिपु का अधिक धैर्य ही प्रधान नायक नृसिंह के प्रताप का
उद्दीपक हो सकता है न कि उसके हृदय का खुद-ब-खुद फट जाना । ऐसी स्थिति
में कवि का ऐसा कथन कैसे उचित कहा जा सकता है ? यह अनौचित्य “दृशैव”
इसी करण पद के द्वारा ही उपस्थित हुआ है, इसलिए इसका उत्तरदायित्व
उसी करणपद पर है ।
संप्रदानौचित्यं यथा भट्ट प्रभाकरस्य--
डिङ्मातङ्गघटाविभक्तचतुराघाटा मही साध्यते,
सिद्धा सापि वदन्त एव हि वयं रोमाञ्चिताः पश्यत ।
विप्राय प्रतिपाद्यते किमपरं रामाय तस्मै नमो,
यस्मादाविरभूत्कथाऽद्भुतमिदं यत्रैव चास्तं गतम् ॥
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १०३
सम्प्रदानौचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा भट्टेति । दिङ्मातङ्गेति । दिङ्मा-
तङ्गानां दिग्गजानां या घटा संघस्तया विभक्ता विभज्य स्थापिताश्चत्वार
आघाटा अवधिप्रदेशा यस्याः सा, दिग्गजचतुरस्रेति भावः, मही पृथ्वी,
साध्यते स्वायत्तीक्रियते, सिद्धापि स्वायत्ती कृतापि सा विप्राय कस्मै अनुप-
कारिणे ब्राह्मणाय कश्यपायेति भावः, प्रतिपाद्यते प्रदीयते--इत्यनेन पूर्व-
वाक्यार्थः परामृश्यते । वदन्त एव कथयन्त एव, कथनसमकालमेव न तु
कथनोत्तरमिति भावः, वयं सांसारिका लोका रोमाञ्चिताः सञ्जातरोमाञ्चाः
स्म इति शेषः, पश्यतावलोकयत, रोमोद्गममिति भाव । एतेन रोमाञ्चस्य
दर्शनविषयत्वप्रतिपादनेन सत्यता सूच्यते, परशुरामकर्तृकानुपकारि-
ब्राह्मणोद्देश्यककष्टलब्धसमग्रमहीदानरूपपरमौदार्यकृतविस्मयमयचमत्काररु-
चिरौचित्यास्वादप्रयुक्तरोमाञ्चोद्गमशालिनो वयं भवाम इति भावः । अपरं
किम् ? अतः परं तन्महत्त्वं किं वर्णनीयमिति तात्पर्यम् । तस्मै विलक्षण-
त्यागजुषे, रामाय भार्गवाय ( परशुरामाय ) नमो नमस्कृतिरस्त्विति
भावः । यस्मात् भार्गवाद्विदं कथाद्भुतमेतद्विलक्षणदानरूपं कथाश्चर्यमा-
विर्भूदुत्पन्नं, यत्रैव यस्मिन्नेव चास्तं गतं विलयमुपगतम् ।
सम्प्रदानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है--यथा भट्टेति ।
दिङ्मातङ्गेति--मनुष्यों के लिए सप्तद्वीपा वसुमती की प्राप्ति बहुत बड़ी अभि-
लाषा का विषय है, परन्तु भगवान् भार्गव ने उसे भी सिद्ध कर लिया । इतना ही
नहीं उस (ससागरा पृथ्वी) को तुच्छ वस्तु के समान केवल एक विप्र (अनुपकारी
ब्राह्मण) को दान भी कर दिया, देखो यह बोलते हुए भी हम ( साधारण
मनुष्य ) रोमाञ्चित हो रहे हैं, इससे अधिक आश्चर्यजनक महिमा किसी की क्या
हो सकती है ? उस अपूर्वत्यागी भगवान् भार्गव को नमस्कार है। ऐसी लोकोत्तर-
दानशीलता की कथा जिससे उत्पन्न होकर फिर जिसमें ही विलीन हो गयी ।
अत्र दिग्गजचतुरस्रा भूः साध्यते, सा च सिद्धा हेलयैवान्नमुष्टिरिवै-
कस्मै विप्रमात्राय प्रतिपाद्यते इति निरतिशयोदाश्चर्यचमत्काररुचिरौ-
चित्यचर्वणया वयं रोमाञ्चिताः पश्यत रोमाञ्चस्य प्रत्यक्षपरिदृश्य-
मानत्वात्, किमपरमपूर्वत्यागिने भार्गवाय तस्मै नम इति विप्रायेति
सम्प्रदानपदगत एवोत्कर्षविशेषः प्रकाशते ।
अत्र पद्ये, “दिग्गजचतुरस्रा सप्तद्वीपा [ससागरा च मही साध्यते,
सिद्धा च सा समग्रा मही लीलयैव मुष्टिपरिमितमन्नमिवैकस्मै न तु बहुभ्यो
१०४ औचित्यविचारचर्चा
विप्रायानुपकारिणे न तु स्वार्थसाधकाय प्रतिपाद्यते" इति कथनक्षणेऽत्य-
न्तोदारतोपपन्नाश्चर्यमिश्रितचमत्कारसुन्दरोचित्याऽऽस्वादनेन वयं ( साध-
रणा लोकाः ) सञ्जातरोमाञ्चाः स्म इति पश्यत, रोमाञ्चस्य प्रत्यक्षपरि-
दृश्यमानत्वेन न मिथ्याशङ्केति भावः । किमपरगतः परं महत्त्वं किं भवे-
दिति तात्पर्यम् । अपूर्वत्यागिने विलक्षणत्यागशीलाय भार्गवाय तस्मै
नम इत्यत्र "विप्रायेति" सम्प्रदानपदगत एवोत्कर्षविशेषो वैशिष्ट्यं प्रका-
शते बुद्धिगोचरीभवति ।
उक्त पद्य में 'ससागरा पृथिवी की प्राप्ति हो असम्भव है लेकिन वह भी
सम्भव हुई, परन्तु मुट्ठीभर अन्न की तरह एकमात्र ब्राह्मण ( कश्यप ) को
उसका दान कर देना तो और भी आश्चर्यजनक है, इस बात की चर्चा करने पर
भी उस दानकर्ता की उदारता के औचित्य की चर्वणा से हम साधारण मनुष्य
रोमाञ्चित हो रहे हैं। देख लो, और इससे अधिक कोई क्या कर सकता है ?
ऐसे अपूर्वदानी महामुनि भार्गव को नमस्कार है" इस तरह के कथन में जो
विलक्षणता दृष्टिगोचर हो रही है वह केवल "विप्राय" इस सम्प्रदानकारक
बोधक पद की ही महिमा है। इसलिए सम्प्रदानगतौचित्य का यह पद्य ज्वलन्त
निदर्शन है।
न तु यथा राजशेखरस्य—
पौलस्त्यः प्रणयेन याचत इति श्रुत्वा मनो मोदते,
देयो नैष हरप्रसादपरशुस्तेनाधिकं ताम्यति ।
तद्वाच्यः स दशाननो मम गिरा दत्ता द्विजेभ्यो मही,
तुभ्यं ब्रूहि रसातनलत्रिदिवयोर्निर्जित्य किंदीयताम् ॥
सम्प्रदानगतानौचित्यं दर्शयितुमाह—न तु यथा राजेति । पौलस्त्य
इति । परशुयाचनाय रावणद्वारा प्रेषितं दूतं प्रति भार्गवस्योक्तिरियम् ।
( यद्यपि ) पौलस्त्यः ऋषिपुलस्तिवंशोद्भवो रावणः, प्रणयेन प्रेम्णा, न तु
बलात्कारेण, ( परशुं ) याचत इति ( वचः ) श्रुत्वाऽऽकर्ण्य, मनश्चित्तं,
मोदत आनन्दमनुभवति, ( परन्तु ) एषोऽयं हरप्रसादपरशुः शिवप्रसादी-
कृतः ( प्रसादरूपेण शिवद्वारा प्रदत्तः ) देयो दातुं योग्यो न, अस्तीति
शेषः, तेन हेतुनाऽधिकं बहु, ताम्यति क्लाम्यति, मन इति पूर्वोक्तं कर्तृ-
पदमध्याहार्यम्, तत्तस्माद्धेतोः स दशाननो मम गिरा मद्वचसा, वाच्यः
कथनीयः, ( यत् ) मही समग्रापि ससागरा वसुमती, ( मया ) द्विजेभ्यो
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयापेता १०५
ब्राह्मणेभ्य आदरसूचकं बहुवचनं कश्यपायेति भावः, दत्ता वितीर्णा,
( अत एव ) रसातलात्रिदिवयोः पातालतलस्वर्लोकयोः, किं कतरत्,
निर्जित्य जित्वा, तुभ्यं रावणाय, दीयतामिति ब्रूहि कथय । रावणः परशुं
याचते परन्तु स च देय एव नास्ति, पृथ्वी कश्यपायैव दत्तैवञ्च पाताल-
स्वर्गावेव देयमध्येऽवशिष्येते, तयोः किं तुभ्यं दीयतामिति तात्पर्यम् ।
एतेन स्वर्गाद्यपेक्षयापि परशोर्महत्त्वमधिकमिति ध्वनितम् ।
सम्प्रदानगत अनौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है—न तु
यथा राजेति । फरसा माँगने के लिए रावण के द्वारा भेजे हुए दूत के प्रति
परशुराम की यह उक्ति है—पौलस्त्य इति । ऋषि पुलस्ति के पवित्र वंश में
उत्पन्न होनेवाला प्रतापी रावण प्रेम से ( न कि बलात्कार से ) फरसा माँग रहा
है—यह सुन कर मन प्रसन्न हो रहा है, परन्तु महादेव के प्रसाद रूप में प्राप्त यह
फरसा दिया नहीं जा सकता, इससे मन क्लान्त हो रहा है । इसलिए हे दूत ! तुम
मेरी वाणी में रावण से कहना कि पृथ्वी तो मैंने ब्राह्मणों को दान कर दी है अब
स्वर्ग और पाताल में से क्या जीत कर तुम्हारी माँग पूर्ण करूँ, यह बोलो ।
अत्र रावणदूतेन परशुं याचितो भार्गवो ब्रूते—नैष हरप्रसादलब्धः
परशुर्दानयोग्यः । तत्तस्माद्मद्वचसा स दशग्रीवो वाच्यः—पृथिवी मया
कश्यपाय प्रतिपादिता, तुभ्यं पातालत्रिदिवयोर्मध्यात्किं निर्जित्य दीय-
ताम् इत्यनुचितं मुनेर्लोकहितप्रवृत्तस्य त्रैलोक्यकण्टकभूताय राक्षसाय
भुवनप्रतिपादनम् ।
अत्रोक्तश्लोके रावणदूतेन परशुं याचितः परशुरामः कथयति—शिव-
प्रसादरूपेण प्राप्त एष परशुर्दानयोग्यो नास्ति । तस्माद्धेतोर्मदुक्त्या स
रावणः कथयितव्यः—मया समग्रापि भूः कश्यपाय दत्ता, पातालस्वर्ग-
योर्मध्याज्जित्वा तुभ्यं साम्प्रतं किं दीयताम् इत्येवंरूपेण—लोकहितप्रवृ-
त्तस्य जगतकल्याणनिरतस्य मुनेर्भार्गवस्य, त्रैलोक्यकण्टकभूताय जगत्त्रय-
घातकाय, राक्षसाय रावणाय, भुवनप्रतिपादनं स्वर्गपातालयोरन्यतरप्रदा-
नोक्तिरनुचितमयुक्तमिति ।
उक्त पद्य में रावण के दूत के द्वारा फरसा माँगने पर भगवान् परशुराम
कह रहे हैं कि "शिवप्रसादलब्ध यह फरसा देने योग्य नहीं है । इसलिए मेरी
ओर से उस दशकंठ से कहना कि पृथ्वी तो मैंने पहले ही महामुनि कश्यप को
दे दी है, अब स्वर्ग और पाताल में से जीतकर क्या तुम्हें दूँ, यह बोलो" ऐसा
१०६ | औचित्यविचारचर्चा
कहना लोकहितकारी महर्षि भार्गव के लिए उचित नहीं हुआ, क्योंकि जो रावण
उस समय तीनों लोकों के लिए कंटक-सा हो रहा था, उसको पूरा का पूरा एक
लोक ही जीतकर दे देना अन्याय को बढ़ावा देना ही तो कहा जा सकता है,
इसलिए यहाँ सम्प्रदानकारक का अनौचित्य अत्यन्त स्पष्ट है।
अपादानौचित्यं यथा मालवरुद्रस्य—
एतस्माज्जलधेर्मिताम्बुकणिकाः काश्चिद् गृहीत्वा ततः,
पाथोदाः परिपूरयन्ति जगतीं रुद्धाम्बरा वारिभिः।
भ्राम्यन्मन्दरकूटकोटिघटनाभीतिभ्रमत्तारकां,
प्राप्यैकां जलमानुषीं त्रिभुवने श्रीमानभूदच्युतः ॥
सम्प्रदानौचित्य-प्रदर्शनानन्तरमपादानौचित्यमुदाहर्तुमाह-यथा माल-
वेति। एतस्मादिति। एतस्मात्पुरोवर्त्तमानाज्जलधेः समुद्रात्काश्चित्कि-
यत्यो मिताम्बुकणिकाः परिमिता एव जलकणिकाः, गृहीत्वाऽऽदाय,
पाथोदा मेघास्ततस्तत्पश्चाद्रुद्धमम्बरं यैरेवंभूताः सन्तो वारिभिर्जलैर्ज-
गतीं भुवनतलं परिपूरयन्ति प्लावितां विदधते, ( तथा ) तत एव भ्राम्यत
इतस्ततो गच्छतो मन्दरस्य तन्नामकपर्वतविशेषस्य, कूटस्य शृङ्गस्य, कोटे-
रग्रभागस्य, घटनया योगेन, या भीतिर्भयं, तया भ्राम्यन्तौ चञ्चले
तारके कनीनिके यस्या एवम्भूतामेकां, जलमानुषीं जलजां लक्ष्मीमिति
भावः, प्राप्य लब्ध्वाऽच्युतो भगवान्विष्णुस्त्रिभुवने लोकत्रये, श्रीमान्
लक्ष्मीपतिर्भूत्।
सम्प्रदानौचित्य का उदाहरण दिखाकर अभी अपादानौचित्य का उदाहरण
दिखाने के लिए कहा जा रहा है—यथा मालवेति। एतस्मादिति—इसी समुद्र
से जल के कुछ ही कणों को लेकर मेघ समग्र पृथ्वी को जलाप्लावित कर देते
हैं तथा घूमते हुए मन्दराचल के शृंगों के छोर से छू जाने के कारण उत्पन्न-
भय से चञ्चल नेत्रकनीनिका वाली एक जलपरी को प्राप्त कर भगवान् विष्णु
तीनों लोकों में श्रीमान् ( लक्ष्मीपति अथ च धनी ) हो गये हैं।
अत्र यदुक्तमेतस्मान्महोदधेः परिमिताम्बुकणिकाः प्राप्य जलदा
जगत्पूरयन्ति, तथा भ्रमन्मन्दरकूटकोटिसंघट्टत्रासतरलतारकामेकां जल-
मानुषीं श्रियं प्राप्य श्रीमानच्युतोऽभूदिति तेन सागरगतनिरतिशयोत्कर्ष-
विशेषः प्रदर्शितः। तत्र एतस्माज्जलधेरित्येतत्पदमौचित्यस्य मूलभूमिः।
अस्मिन्पद्ये, पुरोवर्त्तमानादस्मात्समुद्रात्परिमिताम्बुकणानासाद्य मेघाः