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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ९७
( "स्तनयुगमश्रुस्नातम्" ) के स्तनयुगकर्तृक तप से एक अनिर्वचनीय आनन्द
की अनुभूति होती है उस तरह यहाँ कोई चमत्कारी अर्थ व्यक्त नहीं होता है,
इसलिये यहाँ पर कर्तृपद का अनौचित्य स्पष्ट ही परिलक्षित हो रहा है।
कर्मपदौचित्यं यथा मम लावण्यवत्याम्—
सदा सक्तं शैत्यं विमलजलधारापरिचितं,
घनोल्लासः क्ष्माभृत्पृथुकटकपातो वहति यः।
विधत्ते शौर्यश्रीश्रवणनवनीलोत्पलरुचिः,
स चित्रं शत्रूणां ज्वलदनलतापं भवदसिः॥
कर्तृपदोचित्यप्रदर्शनानन्तरं कर्मपदौचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा मम
लावण्येति। सदासक्तमिति। यः ( भवदसिः ) क्ष्माभृतां राज्ञां पृथौ
विस्तीर्णे कटके सेनायां, पाती पतनशीलः, जलाशयपक्षे क्ष्माभृतः पर्वतस्य,
पृथौविस्तीर्णात्कटकात्सान