औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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है, अंग शिथिल हो जाते हैं, तब प्रकृतिकोमल शृंगार-रस से स्निग्ध हृदय वालों
के विषय में कहना ही क्या है ? तात्पर्य यह कि—अन्त तक शान्त के परिपोष से
राग की विरसता ही व्यक्त होतो है । जैसा कि आचार्य आनन्दवर्धन ने कहा है ।
विरोधी वेति—विरोधी या अविरोधी कोई भी रस यदि रसान्तर में अंग हो
जाय तो अन्त तक उस ( अंगभूतरस ) का परिपोष नहीं होना चाहिए, इससे
विरोध भाव नहीं आने पता है । अर्थात् अंगभूतरस का यदि अन्त तक निर्वाह
नहीं होता हो तो विरोधभाव की स्थिति नहीं आने पाती है । लेकिन यहाँ तो
स्थिति ही विपरीत है, क्योंकि अन्त तक अंगभूत विरोधी रस शान्त का निर्वाह
किया गया है जिससे औचित्य का पर्णतः व्याघात हो गया है ।
यदि अन्त तक परिपोष नहीं होता हो तो स्वभावविरोधी रस का वर्णन
रहने पर भी प्रधानरस का रोध नहीं होता है—पूर्वोक्त इस अर्थ को लक्ष्य में
दिखाने के अभिप्राय से कहा गया है—यथा राजशेखरस्येति । मानं मुञ्चतेति ।
हे मानिनियो ! मान छोड़