औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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रावणशातनतो नापरं किंचिदिति सुतरामवगम्यते एतच्च क्रियापदस्यैव
माहात्म्यमिति तदौचित्यं स्पष्टमेवेति दिक्।
इस पद्य में संध्यावंदन करने के लिए सातों समुद्रों की यात्रा करने में
अप्रतिहतगतिवाले महिषरूपधारी दुन्दुभि नामक राक्षस का विनाशक, मायावी
दानव के निष्पेषण (मारण) से समूचे पातालतल को रक्तरंजित कर देनेवाले
उस बाली का स्मरण क्या कर रहे हैं? इस वाक्य के निषेधात्मक क्रियापद से,
शुक-सारणों के द्वारा दुर्वृत्ती रावण को दुष्पथ से लौटाने के लिए जो उपदेश
किया गया है, उससे व्यक्त होता है कि कपड़े की झोली में डाल कर आपको
उस बाली ने कक्षा (बगल) में लटका लिया था। कहने का तात्पर्य यह है कि
यहाँ बाली के वर्णन से ऐसा आभास नहीं मिलता है कि बाली नगण्य था या
स्मरण करने योग्य नहीं था। फिर निषिध्यमान स्मरणक्रियावाचक पद के द्वारा
यह सिद्ध होता है कि इसमें कुछ रहस्य है, और वह रहस्य रावण को झोली में
डाल कर बगल में लटका लेने के सिवा और कुछ नहीं है, इस अभिव्यक्ति का
कारण क्रियापद ही है। इसलिए क्रियापदौचित्य का यह स्पष्ट उदाहरण कहा जा
सकता है।
न तु यथा श्रीप्रवरसेनस्य—
सग्गं अपारिजाअं कोत्थुहलच्छिरहिअँ महुमहस्सउरं।
सुमिरारम महणपुरओ समुद्धअन्दं हरजडापब्भारं॥
क्रियापदानौचित्यस्योदाहरणमुपस्थापयितुमाह-न तु यथेति।
'सग्गं इति ।
स्वर्गमपारिजातं कौस्तुभलक्ष्मीभ्यां विरहितं मधुमथनस्योरः।
स्मराम्यमृतमथनपुरतोप्यबालचन्द्रं हरजटाप्राग्भारम् ॥ इति छाया।
स्वर्गमिति। अमृतमथनपुरतोऽपि समुद्रमन्थनात्पूर्वमपि, अस्य सर्वत्र
सम्बन्धः, अपारिजातं पारिजातकुसुमकाननरहितं, स्वर्गं सुरलोकम्,
कौस्तुभलक्ष्मीभ्यां कौस्तुभमणिरमाभ्यां, विरहितं शून्यं, मधुमथनस्य
मधुसूदनस्य विष्णोरित्यर्थः, उरो हृदयस्थलम्, अबालचन्द्रं शिशुशशाङ्क-
रहितं, हरजटाप्राग्भारं शिवजटाजूटग्रन्त्यग्रभागं, स्मरामि ध्यायामि।
समुद्रमन्थनात्प्राक्तनो मम जीवनकाल इति भावः।
क्रियापदानौचित्य को प्रदर्शित करने के लिए कहा गया है--न तु यथा प्रव-
रेति। स्वर्गमिति। मैं (जाम्बवान्) समुद्रमंथन से पूर्वकालिक पारिजातपुष्प से