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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 256 में से

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पृष्ठ 165

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयापेता १०५
ब्राह्मणेभ्य आदरसूचकं बहुवचनं कश्यपायेति भावः, दत्ता वितीर्णा,
( अत एव ) रसातलात्रिदिवयोः पातालतलस्वर्लोकयोः, किं कतरत्,
निर्जित्य जित्वा, तुभ्यं रावणाय, दीयतामिति ब्रूहि कथय । रावणः परशुं
याचते परन्तु स च देय एव नास्ति, पृथ्वी कश्यपायैव दत्तैवञ्च पाताल-
स्वर्गावेव देयमध्येऽवशिष्येते, तयोः किं तुभ्यं दीयतामिति तात्पर्यम् ।
एतेन स्वर्गाद्यपेक्षयापि परशोर्महत्त्वमधिकमिति ध्वनितम् ।
सम्प्रदानगत अनौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है—न तु
यथा राजेति । फरसा माँगने के लिए रावण के द्वारा भेजे हुए दूत के प्रति
परशुराम की यह उक्ति है—पौलस्त्य इति । ऋषि पुलस्ति के पवित्र वंश में
उत्पन्न होनेवाला प्रतापी रावण प्रेम से ( न कि बलात्कार से ) फरसा माँग रहा
है—यह सुन कर मन प्रसन्न हो रहा है, परन्तु महादेव के प्रसाद रूप में प्राप्त यह
फरसा दिया नहीं जा सकता, इससे मन क्लान्त हो रहा है । इसलिए हे दूत ! तुम
मेरी वाणी में रावण से कहना कि पृथ्वी तो मैंने ब्राह्मणों को दान कर दी है अब
स्वर्ग और पाताल में से क्या जीत कर तुम्हारी माँग पूर्ण करूँ, यह बोलो ।
अत्र रावणदूतेन परशुं याचितो भार्गवो ब्रूते—नैष हरप्रसादलब्धः
परशुर्दानयोग्यः । तत्तस्माद्मद्वचसा स दशग्रीवो वाच्यः—पृथिवी मया
कश्यपाय प्रतिपादिता, तुभ्यं पातालत्रिदिवयोर्मध्यात्किं निर्जित्य दीय-
ताम् इत्यनुचितं मुनेर्लोकहितप्रवृत्तस्य त्रैलोक्यकण्टकभूताय राक्षसाय
भुवनप्रतिपादनम् ।
अत्रोक्तश्लोके रावणदूतेन परशुं याचितः परशुरामः कथयति—शिव-
प्रसादरूपेण प्राप्त एष परशुर्दानयोग्यो नास्ति । तस्माद्धेतोर्मदुक्त्या स
रावणः कथयितव्यः—मया समग्रापि भूः कश्यपाय दत्ता, पातालस्वर्ग-
योर्मध्याज्जित्वा तुभ्यं साम्प्रतं किं दीयताम् इत्येवंरूपेण—लोकहितप्रवृ-
त्तस्य जगतकल्याणनिरतस्य मुनेर्भार्गवस्य, त्रैलोक्यकण्टकभूताय जगत्त्रय-
घातकाय, राक्षसाय रावणाय, भुवनप्रतिपादनं स्वर्गपातालयोरन्यतरप्रदा-
नोक्तिरनुचितमयुक्तमिति ।
उक्त पद्य में रावण के दूत के द्वारा फरसा माँगने पर भगवान् परशुराम
कह रहे हैं कि "शिवप्रसादलब्ध यह फरसा देने योग्य नहीं है । इसलिए मेरी
ओर से उस दशकंठ से कहना कि पृथ्वी तो मैंने पहले ही महामुनि कश्यप को
दे दी है, अब स्वर्ग और पाताल में से जीतकर क्या तुम्हें दूँ, यह बोलो" ऐसा