सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 159

वह्निद्युतिरग्नितुल्यकान्तिः, वह्निरपि पवनेन प्रज्वाल्यते, काष्ठस्य ( इन्ध-
नस्य ) आश्रयणमवाप्य निरतिशयं विवर्धते, भवत्प्रतापोऽपि तथैवाच-
रतीत्युभयोस्तुल्यतेति भावः । भवत्प्रतापः निहतारिविलासिनीनां मारित-
शत्रुस्त्रीणां, तापं सन्तापं, तनोति विस्तारयति ।
कर्मपदानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है--न तु यथा
ममैवेति । भग्नेति । हे राजन् ! आपका प्रतापमर्दितशत्रुओं के निःश्वासवायु से
प्रज्वलित काष्ठ ( इन्धन ) के संयोग से अतिशय विवृद्ध, अग्नि के समान, मारे
गये शत्रुओं की स्त्रियों के सन्ताप की वृद्धि कर रहा है ।
अत्र विद्रुतारिनिःश्वसितानिलप्रबोध्यमानः काष्ठाश्रयेण दिक्‌चक्र-
पूरणेन प्रौढतां प्राप्तः पावकतुल्यस्त्वत्प्रतापः शत्रुकान्तानां तापमात्रं तनो-
तीति तत्समुचितमाश्चर्यं न किंचित् ।
अत्रोक्तपद्ये विद्रुतारिनिःश्वसितेत्यारभ्य शत्रुकान्तानां तापमात्रं
तनोतीति यदुक्तं तत् समुचितमुचितमेव, नाश्चर्यं न विस्मयजनकं किंचित्
किमपि । अर्थात् वह्नेर्दाहकत्वं स्वाभाविकमेव, तदकरणमेवानुचितम्, अत
एवात्र प्रतापस्य सर्वथाग्नितुल्यतया तत्कर्तृकसन्तापरूपकर्मणो प्यानुषङ्गि-
कत्वमेवेति तद्वर्णनेन न किमपि वैशिष्ट्यमुद्भासितमिति सिद्धं कर्मपदानौ-
चित्यमिति बोध्यम् ।
इस पद्य में राजा के प्रताप की महिमा को बढ़ाने के लिए ऐसे-ऐसे विशे-
षणों का प्रयोग किया गया है जिससे आग के साथ उसकी पूरी समता सिद्ध हो
जाती है फिर उस प्रतापाग्नि के द्वारा मारित राजाओं की पत्नियों को सन्ताप
प्रदान कर समता की शेष कमी की भी पूर्ति की गयी है, इस तरह पद्य बहुत
ही सुन्दर प्रतीत होता है, परन्तु औचित्यवाद की कसौटी पर कसने से ज्ञात
होता है कि इसमें का कर्मपद उचित हुआ, क्योंकि ताप देना अग्नि का स्वाभाविक
गुण है, न देना ही अनुचित होता । अतएव यहाँ पर राजा का प्रताप जब अग्नि-
तुल्य सिद्ध हो गया है तब उसका भी संतापमात्र प्रदान करना एक साधारण
बात हुई, कुछ विशेष नहीं । ऐसी स्थिति में इस वर्णन से सहृदयों के हृदय में
आनन्द-विशेष का संचार न होकर एक उपेक्षणीयता का ही भाव जग जाता है,
जो कि सत्काव्य के लिए एक भारी कलंक है । इसलिए यह कर्मपदानौचित्य का
उदाहरण हुआ है ।