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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 156

९६ औचित्यविचारचर्चा

परिमलस्येति । गुर्जर देश की विजय कर लेने के बाद मालवाधीश की प्रशंसा में
यह श्लोक कहा गया है--आहारमिति । हे मालवाधीश ! ( पराजित होकर
गुर्जराधिपति मरुकानन में प्रवेश कर ) न भोजन करता है, न जल ही पीता है,
स्त्रियों को तो पास भी नहीं फटकने देता, भूमि पर ही शयन करता है, विषय
( स्रक्-चन्दनादि ) का त्याग कर सूर्य की दुःसह किरणों में देह सुखा रहा है।
मालूम होता है जैसे तुम्हारी कृपा प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या कर रहा हो।
अत्र गुर्जरपतिर्विद्रुतो मरुगहनं प्रविष्टः परित्यक्ताहारादिसमस्त-
विषयश्चण्डातोपसेवी तपश्चरतोति यदुक्तं तत्कर्तृपदस्य विशेषाभि-
प्रायोचितं न किञ्चिदुपलक्ष्यते शत्रुत्रासतरलतया मरुकान्तारान्तरा वसन्नः
सकलविषयसुखभोगपरिभ्रष्टः किमन्यत्कुरुताम् । स्तनयुगवत्कर्तृपदस्य
चमत्कारोचितं न किंचिदभिहितम् ।
अत्र पद्ये, विद्रुतः पलायितो गुर्जरपतिर्मरुगहनं मरुकाननं प्रविष्टः,
परित्यक्ताहारादिसमस्तविषयः परिहृतभोजनादिसंपूर्णासांसारिकबन्धनः,
चण्डातोपसेवी दुःसहरौद्रसेवनशीलस्तपस्यां चरति—इत्येवंरूपेण
यदुक्तं यदुपन्यस्तं तत् कर्तृपदस्य गुर्जरपतिरूपस्य, विशेषाभिप्रायोचितं
तात्पर्यविशेषानुरूपं न किञ्चित् उपलक्ष्यते विज्ञायते, (यतो हि) शत्रु-
त्रासतरलतया शत्रुभयचञ्चलतया, मरुकान्तारान्तरावसन्नो मरुकानना-
भ्यन्तरनिवासावसादशीलः, सकलविषयसुखभोगपरिभ्रष्टः सम्पूर्णसांसा-
रिकविषयभोगवञ्चितः अन्यदपरं किं कुरुताम् । स्तनयुगवत् स्तनयुगमश्रु-
स्नातमिति पद्यस्थस्तनयुगानुरूपमत्र कर्तृपदस्य चमत्कारोचितं विच्छित्ति-
विशेषजनकं न किमपि कथितम् । मरुकानने प्रोक्तसकलसामग्रीसमुप-
लब्धेर्नितरामसम्भवतया तदसेवनातिरिक्तस्य पथोऽभावेन तत्त्यागस्यैव
नान्तरीकतयौचित्यमिति नैतत्कथनेन किमप्यपूर्वमभिहितं भवतीति
सिद्धमस्य कर्तृपदस्यानौचित्यमिति बोध्यम् ।
इस पद्य में--“पराजित होकर गुर्जरराज मरुकानन में प्रवेश कर गये हैं,
आहारादि समस्त विषय-वासनादिक से वञ्चित होकर तीव्र सूर्यरश्मि को सहते
हुए कठिन तपस्या कर रहे हैं।” इस कथन से कुछ ऐसा विशेष अभिप्राय
परिलक्षित नहीं हो रहा है जिससे कि कर्तृपद का औचित्य सिद्ध हो सके, क्योंकि
शत्रु के डर से मरुभूमि-निवासजन्य अवसाद से युक्त सभी वैषयिक सुखभोग
से रहित होकर वे बेचारे और कर ही क्या सकते हैं ? जैसे पूर्वोक्त श्लोक—