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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 256 में से

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पृष्ठ 158

९८ औचित्यविचारचर्चा
काम करने वाली वह ( तुम्हारी तलवार ) शत्रुओं के हृदय में प्रज्वलित अग्नि
के ताप के समान संताप उत्पन्न कर देती है—यह आश्चर्य है, क्योंकि जलधारा
की समता रखनेवालों के लिये शैत्यप्रदान स्वाभाविक गुण होना चाहिए । यहां
तो उसके विरुद्ध यह संताप प्रदान कर रही है । फिर क्यों न आश्चर्य हो ?
अत्र निश्चलममलजलधारागतं शैत्यं तैक्ष्ण्यं शीतलत्वं च घनोल्लासो
निबिडोत्साहः पर्जन्यतुल्योदयश्च क्ष्माभृतां सानुसैन्यनिपाती वहति सः
शौर्यश्रीश्रवणनवनीलोत्पलतुल्यस्त्वत्खड्गश्चित्रं शत्रूणां संतापं करोतीति
यदुक्तं तत्कर्मभूतस्य तापस्य शिशिरतरसामग्रीजन्मनः परं वैचित्र्यं
रुचिरमौचित्यमासूत्रितम् ।
अत्रोक्तपद्ये, शैत्य-विमलजलधारापरिचित-घनोल्लासक्ष्माभृत्कट-
कपातीतिपदानि द्व्यर्थकानि तेषामेकमेकमर्थमादायापाततोऽसेः शीतलता-
धारित्वं प्रतीयते, एवं शौर्यश्रीत्यादिविशेषणेनापि कमलतुल्यत्वबोधनद्वारा
तस्य शिशिरत्वमेव पोष्यते, एवञ्च तादृशशिशिरतरसामग्रीसंभूतासिनिष्ठ-
कृतसाध्यत्वं तापस्य विरुद्धमप्युच्यमानं चमत्कारविशेषविधायकमिति
कर्मकारकोचित्यस्योदाहरणतामासादयति पद्यमेतदिति भावः ।
उक्त पद्य में तलवार की समता निर्मल और शीतल जलवाली नदी से
दिखायी गयी है फिर उसके द्वारा ताप की सृष्टि की गयी है । इस तरह शीतल
उपादान से अग्नि के समान ताप की उत्पत्ति का प्रतिपादन यहाँ एक अपूर्व
औचित्य का द्योतक हो गया है जिससे सहृदयों के हृदय में एक विलक्षण
चमत्कार का उदय हो जाता है । यह सारी विचित्रता कर्मपद के वैशिष्ट्य से
ही सम्भव हुई है, इसलिए यह कर्मपदौचित्य का स्पष्ट संकेत कर रहा है ।
न तु यथा ममैवावसरसारे—
भग्नाहितश्वसितवातविबोध्यमानः
काष्ठाश्रयेण सहसैव विवृद्धिमाप्तः ।
तापं तनोति निहतारिविलासिनीनां
वह्निद्युतिर्भुवननाथ ! भवत्प्रतापः ॥
कर्मपदानौचित्यं दर्शयितुमाह—न तु यथा ममैवेति । भग्नेति ।
भुवननाथ ! हे राजन् ! भग्ना विद्रुता येऽहिताः शत्रवस्तेषां श्वसितवातेन
निःश्वासपवनेन विबोध्यमानः प्रज्वाल्यमानः, काष्ठाश्रयेण दिग्दिगन्तश्र-
यणेन, दारुसम्बन्धेन च, विवृद्धिमतिशयप्रौढतामाप्तः, प्राप्तः, अत एव