औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंरहित स्वर्ग, लक्ष्मी और कौस्तुभ मणि से शून्य भगवान् विष्णु के हृदय ओर
बालचन्द्र से हीन शंकर की जटाजूट ग्रंथि का स्मरण कर रहा हूँ। अर्थात् समुद्र-
मंथन आदि मेरे जीवनकाल की घटना है—मैं उससे भी पुराना हूँ ।
अत्र जाम्बवताऽभिधीयमाने “स्वर्गमपारिजातं कौस्तुभलक्ष्मीभ्यां
विरहितं मधुमथनस्योरः, स्मराम्यमृतमथनपुरतोऽप्यबालचन्द्रं हरजटा-
प्राग्भारम्” इति प्रगुणगुणाख्यानप्रसङ्गे क्रियापदेन जराजर्जरशरीरत्व-
मात्रमेव प्रतिपादितम्, न तु पौरुषोत्कर्षविशेषातिशयः कश्चिदुचितः
संसूचितः ॥ १९ ॥
अत्र जाम्बवताऽभिधीयमाने प्रतिपाद्यमाने “सग्गं....” इति पद्ये
पारिजातादिरहित-समुद्रमन्थनप्राक्कालिक-स्वर्गादिकर्मक-स्मरण-क्रियावर्ण-
नेन वक्तुर्जाम्बवतः केवलं जराजर्जरशरीरत्वमेव कथितं भवति, न तु
कश्चन पुरुषार्थोत्कर्षातिशयः सूचितो भवति । प्रसङ्गश्चात्र प्रगुण-
गुणाख्यानस्य ( प्रकृष्टगुणकथनस्य ) । अतोऽत्रानुचितमेतादृशार्थबोधकं
स्मरामीति क्रियापदमिति भावः ॥ १९ ॥
इस पद्य में जाम्बवान् ने “स्वर्गमपारिजातम्” इत्यादि के द्वारा अपने गुण-
कीर्तन के प्रसंग में “स्मरामि” इस क्रियापद का जो प्रयोग किया है, उससे मैं
इतना पुराना हूँ मेरा यह जराजर्जर शरीर इतने दिनों का है, केवल यही अर्थ
व्यक्त होता है, कोई विशिष्ट पुरुषार्थ सूचित नहीं होता । प्रसंग तो यहाँ अपने
प्रकृष्ट गुणों के कीर्तन का है, अतः यहाँ यह क्रियापद समुचित नहीं है ॥ १९ ॥
कारकोचित्यं दर्शयितुमाह—
सान्वयं शोभते वाक्यमुचितैरेव कारकैः ।
कुलाभरणमैश्वर्यमौदार्यचरितैरिव ॥२०॥
क्रियापदौचित्यानौचित्यप्रदर्शनानन्तरं क्रमागतमष्टमं कारकोचित्यं
विवेचयितुमाह—कारकोचित्यमिति । सान्वयमिति । कुलं सद्वंश
आभरणं भूषणं यस्यैवंभूतमैश्वर्यम् सम्पत्तिः औदार्यचरितैरोदार्यादिसच्छ-
रित्रैर्यथा शोभते तथैव सान्वयमन्वयेन युक्तं वाक्यं पदसमूहः, उचितैः
समुचितैरेव कारकैः कर्तृकर्मादिरूपैः शोभते ।
क्रियापद के औचित्य और अनौचित्य को दिखलाकर संप्रति क्रमप्राप्त आठवें
कारकोचित्य की विवेचना करने के लिए कहा गया है—कारकोचित्यमिति ।
सान्वयमिति । जैसे सद्वंश से विभूषित भी ऐश्वर्य-औदार्य आदि साधुचरित्र से ही