औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १०१
आयासिताः, दृशैवार्णधिस्तीर्णोऽट्टहासतरङ्गैर्लङ्केशस्य चतुर्दिक्षु प्रसरितः
प्रतापाग्निः शमित इत्येवंप्रकारेण उत्साहाधिवासितैरुत्साहव्यञ्जकैर्विस्मय-
शिखरारोहणसोपानैरिवाऽऽश्चर्यशृङ्गारोहणसोपानस्वरूपैरिव बहुभिरनेकैः
करणपदैः करणकारकबोधकपदैः तत्तत्कर्मणां सयुक्तिकत्वबोधनायप्रयुक्ता-
नैककरणपदैरिति भावः, रघुपतेः रामचन्द्रस्य, प्रभावस्य प्रतापस्यारम्भे
प्रारम्भे, विजयध्वजायमानस्य विजयपताकावदाचरतः, पवनसूनोर्महा-
वीरस्य हनुमतः, औचित्यातिशयो निरतिशयोचित्यं प्रकाशितो व्यक्तीकृतः ।
इस पद्य में समुद्र-तरण करते समय पुच्छ से सूर्य को, मस्तक की ज्योति से
चन्द्रमा को कन्धे के बालों से मेघ को, दन्तच्छवि से तारों को अप्रतिभ बनाते
हुये समुद्र को मानो दृष्टि से ही पार कर लिया हो तथा अपने अट्टहास के
तरंगों से सर्वत्र व्याप्त रावण के प्रतापानल को शान्त कर दिया--इत्यादि
उत्साहवर्धक तथा विस्मयजनक अनेक करणकारणबोधक पदों के प्रयोग से
रामचन्द्र के प्रभावारम्भ में विजयध्वज के समान आचरण करने वाले पवनसुत
हनुमान् का अत्यन्त औचित्य सिद्ध हो जाता है ।
जयत्युपेन्द्रः स चकार दूरतो बिभित्सया यः क्षणलब्धलक्षया ।
दृशैव कोपारुणया रिपोरुरः स्वयं भयाद्भिन्नमिवास्रपाटलम् ॥
करणपदानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह- जयत्युपेन्द्र इति । स प्रसिद्धः,
उपेन्द्रो भगवान्विष्णुर्नृसिंह इति यावत्, जयति सर्वोत्कर्षेण वर्तते । यो
नृसिंहो बिभित्सया विदारयितुमिच्छया, दूरतो दूरादेव, क्षणं निमेषमात्रं
नत्वधिककालं यावदिति भावः, लक्षं प्राप्तं, लक्ष्यं शत्रुवक्षःस्थलं
यया तया, तदुरःस्थले निपतन्त्येत्यर्थः, अत एव कोपेन क्रोधेनारुणया
रक्तवर्णया, दृशैव दृष्टयैव, न तु नखद्वारा भेदनेनेत्यर्थं, रिपोः शत्रोर्हिरण्य-
कशिपोरुरो वक्षःस्थलं, भयान्नृसिंहत्रासात्स्वयमात्मनैव, भिन्नं विदीर्ण-
मिवास्रपाटलं स्वीयारुणलोचनरश्मिनिपातेन शोणितवद्रक्तश्वेतं चकार
कृतवान् ।
करणपदानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है--जयत्युपेन्द्र
इति । जिस ( भगवान् नृसिंह ) ने हिरण्यकशिपु के हृदय को विदीर्ण करने की
इच्छा दूर से ही क्षण भर देख कर क्रोध से आरक्त अपनी आँखों के द्वारा मानो
भय से स्वयमेव विदीर्ण शत्रु ( हिरण्यकशिपु ) के वक्षःस्थल को श्वेतरक्त बना
दिया, वह जगद्-प्रसिद्ध ( नृसिंहरूपधारी ) भगवान् विष्णु जयी हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं ।