औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता ८९
तेन विपरीतवर्णनोत्पन्नेनानौचित्येन, स्थायी मुख्यो रसः, श्वभ्रपातितो
गर्तपातितो, हस्तीव, पुनरुत्थातुं नोत्सहते न समर्थो भवति, इत्यलं
निरर्थक, विस्तरेण विस्तृतवर्णनेन । अनया दिशाऽनेनैव प्रकारेण, रस-
सङ्करेऽन्यान्यरसम्मिश्रणे भेदप्रपञ्चौचित्यं भेदविस्तारौचित्यं, विपश्चि-
द्भिर्विद्वद्भिः, स्वयं विचार्य स्वयमेवोहनीयमिति भावः ॥ १८ ॥
“मानं मुञ्चध” इस पद्य में मुख्य रस श्रृंगार है जो कि आमूलचूलव्यापी
है । यहाँ “कतिपयदिवसस्थायि यौवनम्” इस कथन से शान्त-रस का समावेश
होने पर भी ( वह ) जल के समूह में एक बूंद के समान श्रृंगार के पेट में ही
विलीन हो जाता है, अतः मुख्य रस में विरसता को उत्पन्न करने में समर्थ नहीं
हो पाता है, क्योंकि अंगभूत-रस शान्त का अंत तक परिपोष नहीं होता है ।
जहाँ पर इसके विरुद्ध वर्णन हो जाता है वहाँ पर औचित्य नष्ट हो जाता है,
जिससे मुख्य रस, खाई में गिराये गये हाथी के समान पुनः सम्हल नहीं पाता
है । इस तरह रससंकर के और-और भेदों की विवेचना विद्वानों को स्वयं ( अपने
मुख से ) करनी चाहिए । यहाँ इससे अधिक विचार करना व्यर्थ है ॥ १८ ॥
रसौचित्यविचारानन्तरमुद्देशानुसारक्रमेण क्रमोपगतं क्रियापदौचित्यं
दर्शयितुमाह—
सगुणत्वं सुवृत्तत्वं साधुता च विराजते ।
काव्यस्य सुजनस्येव यद्यौचित्यवती क्रिया ॥१९॥
रसौचित्यविवेचनात्परं “पदे वाक्ये प्रबन्धार्थे” इत्याद्युद्देशक्रमप्राप्तं
सप्तमं क्रियापदौचित्यं प्रदर्शयितुमुपक्रमते—सगुणत्वमिति । सुजनस्येव
काव्यस्य सगुणत्वं माधुर्यादिगुणवत्त्वं, सुवृत्तत्वं सुष्ठुवृत्तं छन्दो मन्दा-
क्रान्तादिकं यत्र तस्य भावस्तत्त्वं, साधुता सर्वविधव्याकरणादिलक्षण-
सम्पन्नतारूपा च, तदैव विराजत सुशोभते, यदि क्रिया-पचति-भवतीति
रूपं क्रियापदमौचित्यवत्यौचित्ययुक्ता भवतीति शेषः, यथा सज्जनानां
दयादाक्षिण्यादिगुणवत्त्वं, सदाचरणं सज्जनता च तदैव स्पृहणीयताम-
र्हति यदा क्रिया ( व्यापारः ) औचित्यानुप्राणिता तिष्ठति, तथैव काव्य-
स्यापि क्रियापदौचित्येनेव गुणादीनां स्पृहणीयत्वमिति भावः ।
रसौचित्य की विवेचना कर चुकने के बाद क्रमानुसार सातवें क्रियापदौ-
चित्य की परिभाषा स्पष्ट करने के अभिप्राय से कहा गया है—सगुणत्वमिति ।
अर्थात् जैसे सज्जनों का दया-दाक्षिण्यादि गुण, व्यवहार, कुशलता और साधुता