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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 256 में से

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पृष्ठ 166

१०६ | औचित्यविचारचर्चा

कहना लोकहितकारी महर्षि भार्गव के लिए उचित नहीं हुआ, क्योंकि जो रावण
उस समय तीनों लोकों के लिए कंटक-सा हो रहा था, उसको पूरा का पूरा एक
लोक ही जीतकर दे देना अन्याय को बढ़ावा देना ही तो कहा जा सकता है,
इसलिए यहाँ सम्प्रदानकारक का अनौचित्य अत्यन्त स्पष्ट है।
अपादानौचित्यं यथा मालवरुद्रस्य—
एतस्माज्जलधेर्मिताम्बुकणिकाः काश्चिद् गृहीत्वा ततः,
पाथोदाः परिपूरयन्ति जगतीं रुद्धाम्बरा वारिभिः।
भ्राम्यन्मन्दरकूटकोटिघटनाभीतिभ्रमत्तारकां,
प्राप्यैकां जलमानुषीं त्रिभुवने श्रीमानभूदच्युतः ॥
सम्प्रदानौचित्य-प्रदर्शनानन्तरमपादानौचित्यमुदाहर्तुमाह-यथा माल-
वेति। एतस्मादिति। एतस्मात्पुरोवर्त्तमानाज्जलधेः समुद्रात्काश्चित्कि-
यत्यो मिताम्बुकणिकाः परिमिता एव जलकणिकाः, गृहीत्वाऽऽदाय,
पाथोदा मेघास्ततस्तत्पश्चाद्रुद्धमम्बरं यैरेवंभूताः सन्तो वारिभिर्जलैर्ज-
गतीं भुवनतलं परिपूरयन्ति प्लावितां विदधते, ( तथा ) तत एव भ्राम्यत
इतस्ततो गच्छतो मन्दरस्य तन्नामकपर्वतविशेषस्य, कूटस्य शृङ्गस्य, कोटे-
रग्रभागस्य, घटनया योगेन, या भीतिर्भयं, तया भ्राम्यन्तौ चञ्चले
तारके कनीनिके यस्या एवम्भूतामेकां, जलमानुषीं जलजां लक्ष्मीमिति
भावः, प्राप्य लब्ध्वाऽच्युतो भगवान्विष्णुस्त्रिभुवने लोकत्रये, श्रीमान्
लक्ष्मीपतिर्भूत्।
सम्प्रदानौचित्य का उदाहरण दिखाकर अभी अपादानौचित्य का उदाहरण
दिखाने के लिए कहा जा रहा है—यथा मालवेति। एतस्मादिति—इसी समुद्र
से जल के कुछ ही कणों को लेकर मेघ समग्र पृथ्वी को जलाप्लावित कर देते
हैं तथा घूमते हुए मन्दराचल के शृंगों के छोर से छू जाने के कारण उत्पन्न-
भय से चञ्चल नेत्रकनीनिका वाली एक जलपरी को प्राप्त कर भगवान् विष्णु
तीनों लोकों में श्रीमान् ( लक्ष्मीपति अथ च धनी ) हो गये हैं।
अत्र यदुक्तमेतस्मान्महोदधेः परिमिताम्बुकणिकाः प्राप्य जलदा
जगत्पूरयन्ति, तथा भ्रमन्मन्दरकूटकोटिसंघट्टत्रासतरलतारकामेकां जल-
मानुषीं श्रियं प्राप्य श्रीमानच्युतोऽभूदिति तेन सागरगतनिरतिशयोत्कर्ष-
विशेषः प्रदर्शितः। तत्र एतस्माज्जलधेरित्येतत्पदमौचित्यस्य मूलभूमिः।
अस्मिन्पद्ये, पुरोवर्त्तमानादस्मात्समुद्रात्परिमिताम्बुकणानासाद्य मेघाः