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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४१
अभाव से मेरी स्थिति उर्द की छोमी के समान हो गयी है, भूख से बुरी हालत
हो रही है, कंठ सूख गया है, बुझी हुई आग को प्रज्वलित करने के लिए बार-
बार फूँक लगाने से ओठ फट गये हैं, अनादृत प्रेयसी के समान नींद भी मुझसे
भागी-भागी फिर रही है और रात पहाड़ के समान मालूम पड़ रही है, बीतने
का नाम ही नहीं लेती । जैसे सत्पात्र को दान की गयी पृथ्वी के समान वह भी
अक्षय होने पर तुली हो ।
अत्रानौचित्यस्पर्शपरिहारेण केवलं हृदयसंवादसौन्दर्यमेव स्वादुता-
मादधाति ॥ १५ ॥
अत्र पद्ये, अनौचित्यस्पर्शपरिहारेणोपमालङ्कारस्य पूर्णौचित्येन, केवल
निष्प्रतिद्वन्दि, हृदयसंवादसौन्दर्यमेवार्थेन सह यो हृदयसंवादः समता,
तत्प्रयुक्तं सौन्दर्यमेव, स्वादुतामाह्लादकतामादधाति उत्पादयति ।
उक्त पद्य में “सत्पात्रप्रतिपादितेव वसुधा” “विमानितेव दयिता” इत्यादि
पदों के द्वारा प्रतिपादित उपमालंकार अनौचित्य के लेश से भी रहित है अर्थात्
सर्वथा समुचित है, अतः यहाँ का वर्णनीय अर्थ ( व्यक्तिविशेष की दीनता )
सहृदय-हृदयसमर्थित होकर आस्वाद्यता को उत्पन्न करता है ॥ १५ ॥
रसौचित्यं दर्शयितुमाह—
कुर्वन्सर्वाशये व्याप्तिमौचित्यरुचिरो रसः ।
मधुमास इवाशोकं करोत्यङ्कुरितं मनः ॥ १६ ॥
अलङ्कारगतौचित्यस्योदाहरण-प्रत्युदाहरणानि प्रदर्श्य सम्प्रति क्रमानु-
सारं षष्ठं रसौचित्यं विवेचयितुमाह- कुर्वन्निति । सर्वाशये सर्वेषां तत्त्व-
ज्ञानामाशये, वासनायां लक्षणया हृदये इति यावत्, व्याप्तिं व्यापकतां
सम्बन्धमिति यावत् कुर्वन्विदधानः, औचित्यरुचिर औचित्यचमत्कृतो
रसः शृङ्गारादिः, मधुमासो वसन्तर्तुः, अशोकं वञ्जुलमिव, मनश्चित्त-
मङ्कुरितं प्रफुल्लं करोति सम्पादयति ।
अलंकारगत औचित्यानौचित्य का प्रतिपादन करके अभी छठे रसगत
औचित्य की विवेचना करने के लिए कहा गया है—कुर्वन्निति । समस्त सहृदयों
के हृदय में व्यापक रूप से अपनी स्थिति बनाता हुआ औचित्य से युक्त रस
सज्जनों के चित्त को उसी तरह अंकुरित कर देता है जिस तरह अशोकतरु
को मधुमास ।

४२ औचित्यविचारचर्चा
औचित्येन भ्राजिष्णुः शृङ्गारादिलक्षणो रसः सकलजनहृदयव्यापी
वसन्त इवाशोकमङ्कुरितं मनः करोति ।
औचित्येनानुरूप्येण भ्राजिष्णुः रोचिष्णुः, शृङ्गारादिलक्षणो रसः
शृङ्गारवीरकरुणादिनामधेयो रसः, सकलजनहृदयव्यापी निःशेषमान-
वान्तःसञ्चारी, वसन्तः सुरभिरशोकं वञ्जुलमिवाङ्कुरितं प्रफुल्लं, मन-
श्चित्तं, करोति विदधाति ।
अनुरूप कथन से सुशोभित, सम्पूर्ण जनमानसव्यापी शृङ्गार, वीर आदि रस
सहृदयों के चित्त में उसी तरह नवनवोन्मेष उत्पन्न कर देता है जैसे वसन्त ऋतु
अशोक की टहनियों में नये नये अंकुर प्रस्फुटित करता है ।
यथा श्रीहर्षस्य—
उद्दामोत्कलिकां विपाण्डुरुचं प्रारब्धजृम्भां क्षणा-
दायासं श्वसनोद्गमैरविरलैरातन्वतीमात्मनः ।
अद्योद्यानलतामिमां समदनां नारीमिवान्यां ध्रुवं
पश्यन्कोपविपाटलद्युति मुखं देव्याः करिष्याम्यहम् ॥
रसौचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा श्रीहर्षस्येति । उद्दामेति । उद्दामोत्क-
लिकां प्रादुर्भूतासंख्यकुड्मलां, पक्षान्तरे उत्कटोत्कण्ठाशालिनीम्, विपाण्डु-
रुचं विशेषतो धवलकान्ति, पक्षद्वयेऽपि समानमेतदेकत्र धवलपुष्पावृतत्वा-
दपरत्र प्रियवियोगेन वर्णव्यत्यासात्, प्रारब्धजृम्भां प्रारब्धा जृम्भावि-
कासो यस्यास्तां, पक्षान्तरे प्रारब्धा जृम्भा ( जम्हाई इति भाषा ) यया
ताम्, अविरलैः सततवृत्तैः, श्वसनोपगमैः पवनोदयैः, अन्यपक्षे निःश्वास-
निःसरणैः, आयासमान्दोलनं, पक्षान्तरे कामव्यथामातन्वतीं विस्तारयन्तीं,
समदनां मदनाख्यवृक्षालिङ्गितां, पक्षान्तरे कामशरजर्जरितामन्यां परां,
नारीं सुन्दरीमिव, इमां पुरोवर्तिनीम्, उद्यानलतां लीलोद्यानलतिकां,
पश्यन्नवलोकयन्नहमद्य, देव्या वासवदत्तायाः, मुखमाननं, कोपेन, क्रोधेन
विपाटला रक्तवर्णा, द्युतिः कान्तिर्यस्य तादृशं नायकस्य परकीयासम्पर्क-
सम्भावनापि नायिकां क्रोधान्वितां करोतीति नायिकास्वभावः, ध्रुवं निश्चयं,
करिष्यामि विधास्यामि । प्रेयस्--- क्रोधः प्रेयांसं नितरामानन्दयतीति
परिहासपटवो नायकाः कृत्रिमोपकरणेन कामिनीं कोपयन्तीति कामशास्-
विदां सम्मतिरिति भावः ।

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४३
रसगतौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है-यथा श्रीहर्षस्येति ।
उद्दामेति—वाटिका की यह लता वस्तुतः दूसरी विरहिणी कामिनी सी है । चूंकि
कामिनी यदि उद्दाम ( उत्कट ) उत्कलिका ( उत्कंठा ) से युक्त रहती है तो यह
उद्दाम ( अजस्र ) उत्कलिका ( कलियों ) से युक्त है । कामिनी यदि विरह से
विपाण्डुर ( विशेषतः धवल ) रुचि ( कान्ति ) वाली हो जाती है तो यह भी
उजले उजले फूलों से ढंकी होने के कारण वैसी ही है। कामिनी यदि विरहावस्था
में प्रारब्धजृम्भा ( बारबार जमुहाई ) लेती है तो यह भी जृम्भा ( विकास ) का
आरंभ कर चुकी है । कामिनी यदि अविरल ( सतत होनेवाले ) श्वसनोद्गमों
( श्वासनिःसरणों ) से अपने आयास ( कामपीड़ा ) को विस्तृत करती रहती है
तो यह भी अविरल ( अत्यधिक ) श्वसनोद्गमों ( पवन के झँकोरों ) से अपना
आयास ( आन्दोलन ) व्यक्त कर रही है । कामिनी यदि समदना ( सकामा )
होती है तो यह भी समदना ( मदनात्मक तरु से युक्त = आलिंगित ) है । अतः
इस लता को देखता हुआ मैं आज निश्चितरूप से देवी वासवदत्ता के मुख को
क्रोध के कारण आरक्त बना दूँगा । अर्थात् देवी वासवदत्ता जब किसी कामिनी
की ओर देखते हुए मुझको देखकर क्रुद्ध हो उठती है तब इस लता को
देखकर भी वह अवश्य ही क्रुद्ध होगी । कारण यह लता भी किसी कामिनी
से कम नहीं है ।
अत्रेष्र्याविप्रलम्भरूपस्य शृङ्गाररसस्य वासवदत्तायामवेक्ष्यमाणस्य
नवमालिकालताया ललितवनितासुल्यतया विरहावस्थारोपेण नितरा-
मौचित्यरुचिरचमत्कारकारिणी दीप्तिरुपपादिता ॥
अत्र पद्ये वासवदत्तायां तन्नामकनायिकायां स्वपत्न्याम्, अवेक्ष्यमाणस्य
दृश्यमानस्य प्रतीयमानस्येति यावत्, ईर्ष्याविप्रलम्भरूपस्येर्ष्याजन्यवियो-
गात्मकस्य शृङ्गाररसस्य शृङ्गाराख्यरसविशेषस्य, नवमालिकालताया
अभिनवपुष्पसम्भारक्षमतामासादयन्त्या मालिकालतिकाया ललितवनि-
तातुल्यतया कमनीयकामिनीसमतया, विरहावस्थारोपेण विरहदशाध्या-
हारेण, नितरामत्यन्तमौचित्यरुचिरचमत्कारकारिणी औचित्यरुचिरस्य
चमत्कारस्य विधायिनी, दीप्तिः कान्तिरूपपादिता प्रतिपादिता ।
उक्त पद्य में वासवदत्तानिष्ठ ईर्ष्याविप्रलंभात्मक शृङ्गाररस, सुन्दर कामिनी
के समान होने के कारण नवीन मालिका नामक लता में विरहिणी की दशा का

४४ औचित्यविचारचर्चा

आरोप कर देने से अत्यधिक औचित्य के चलते सुन्दरतम चमत्कार को करने
वाला हो गया है ।
यथा वा कालिदासस्य—
बालेन्दुवक्राण्यविकासभावाद्वभुः पलाशान्यतिलोहितानि ।
सद्यो वसन्तेन समागतानां नखक्षतानीव वनस्थलीनाम् ॥
रसगतौचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयति--यथा वा कालिदास-
स्येति । बालेति । अविकासभावाद्विकसितत्वाद्धेतोः, बालेन्दुवद् द्वितीया-
चन्द्रवद्, वक्राणि कुटिलान्यतिलोहितान्यत्यन्तरक्तानि, पलाशानि किशु-
कानि, वसन्तेन सुरभिणा ( नायकेन कर्त्रा ), सद्यस्तत्कालमेव, समा-
गतानां सम्पादितसंगमानां, वनस्थलीनामकृत्रिमवनभूमीनां ( नायिका-
नाम् ), नखक्षतानि कामक्रीडाविहितनखचिह्नानीव बभुः शुशुभिरे ।
रसगत औचित्य का दूसरा उदाहरण उपस्थित किया जा रहा है—यथा
वेति । बालेति । अविकसित होने के कारण द्वितीया के चन्द्र के समान टेढ़े टेढ़े
और लाल लाल पलाश के फूल ठीक उसी तरह शोभित हुए जैसे वसंतरूप
नायक के साथ अभी अभी समागम करके आयी हुयी वनस्थलीरूप नायिका के
कपोलगत नखक्षत हों ।
अत्र पार्वत्यां परमेश्वरस्याभिलाषशृङ्गारे वक्ष्यमाणे प्रथममुद्दीपन-
विभावभूतस्य वसन्तस्य वर्णनायां कामुकाध्यारोपेण वनस्थलीललनानां
कुटिललोहितपलाशकलिकाभिर्नवसंगमयोग्यनखतान्युत्प्रेक्षितानि पर-
मामौचित्यचारुतां प्रतिपादयन्ति ।
अत्रोक्तपद्ये, पार्वत्यामुमायां, परमेश्वरस्य शंकरस्याभिलाषशृङ्गारे-
ऽभिलाषात्मके शृङ्गारे, वक्ष्यमाणेऽग्रे कथयिष्यमाणे, प्रथमं पूर्वमुद्दी-
पनविभावभूतस्योद्दीपनकारणरूपस्य, वसन्तस्य सुरभेर्वर्णनायां, कामु-
काध्यारोपेण कामुकाभेदारोपेण, वनस्थलीललनानामकृत्रिमवनभूमिरू-
पाणां नायिकानां, कुटिललोहितपलाशकलिकाभिर्वक्ररक्तकिंशुकाङ्कुरैर्हेतु-
भूतैरित्यर्थः, उत्प्रेक्षितानि, सम्भावितानि नवसंगमयोग्यनखक्षतानि नूतन-
प्रसङ्गोचितनखचिह्नानि, परमौचित्यचारुतामत्यन्तौचित्यप्रयुक्तसौन्दर्यं,
प्रतिपादयन्ति विबोधयन्ति ।

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४५
पार्वती में शिव के अभिलाषात्मक श्रृंगाररस का वर्णन आगे करना है
इसलिए पहले उद्दीपन विभाव ( कारण ) रूप वसन्त वर्णन के प्रसंग में यह
पद्य लिखा गया है, इसमें वसन्त का नायक रूप में और वनस्थली की नायिका
के रूप में वर्णन है अर्थात् वसन्त में नायक का अभेद और वनस्थलियों में
नायिकाओं के अभेद आरोपित हुए हैं, एवम् नूतन अथच रक्तपलाश मुकुलों की
नायककृत नूतन नखक्षत की संभावना की गयी है। ये आरोप और यह संभावना
अग्रिम वर्णनीय अभिलाष श्रृंगार के पोषक होने के नाते अत्यन्त उचित हैं। अतः
इस औचित्यपूर्ण वर्णन से काव्य का सौन्दर्य निखर उठा है।
नतु यथास्यैव—
वर्णप्रकर्षे सति कर्णिकारं दुनोति निर्गन्धतया स्म चेतः।
प्रायेण सामग्र्यविधौ गुणानां पराङ्मुखी विश्वसृजः प्रवृत्तिः॥
रसगतानौचित्यप्रदर्शनार्थमाह—नतु यथास्यैवेति। वर्णेति। वर्णप्रकर्षे
सति रूपोत्कृष्टतायां सत्यामपि, कर्णिकारं तन्नामकपुष्पविशेषो, निर्गन्ध-
तया गन्धराहित्येन हेतुना, चेतश्चित्तं दुनोति खेदयति स्म। प्रायेण सम्भ-
वतो, गुणानां वैशिष्ट्यानां सामग्र्यविधौ साङ्गोपाङ्गतायां, विश्वसृजो
विधातुः, प्रवृत्तिराचरणं, पराङ्मुखी विमुखीभवति।
रसगत अनौचित्य को प्रदर्शित करने के लिये कहा गया है—नतु यथेति।
वर्णप्रकर्षे इति। रूप संपन्न अर्थात् देखने में सुन्दर होने पर भी कर्णिकार के
फूल सुगन्धरहित होने के कारण हृदय को एक मार्मिक पीड़ा प्रदान करते हैं।
गुणों की परिपूर्णता में विधाता की प्रवृत्ति प्रायः प्रतिकूल ही हुआ करती है।
अत्र केवलकर्णिकारकुसुमवर्णनमात्रेण विधातृवाच्यतागर्भेणैव प्रस्तुत-
शृङ्गारानुपयोगिना तदुद्दीपनविभावोचितं न किञ्चिदभिहितम्।
अत्र पद्ये प्रस्तुतशृङ्गारानुपयोगिना प्रकृतशृङ्गाररसापोषकेण, विधातु-
र्ब्रह्मणो, वाच्यता निन्दा, गर्भे मध्ये यस्य तेन, क्रोडीकृतविधिनिन्दने-

४६ औचित्यविचारचर्चा
स्त्यर्थः, केवलकर्णिकारकुसुमवर्णनेन निर्गन्धकर्णिकारपुष्पवर्णनमात्रेण,
तदुद्दीपनविभावोचितं शृङ्गारोद्दीपनविभावानुरूपं, न किञ्चित्,
अभिहितमुक्तम् ।
इस पद्य में कर्णिकारपुष्प का वर्णन ऐसा किया गया है । जिससे प्रकृत
शृङ्गाररस का कुछ भी उद्दीपन नहीं हो रहा है केवल विधाता की निन्दा ही
व्यक्त होती है । अतः शृंगाररस के उद्दीपन विभावों के प्रसंग में ऐसा वर्णन कुछ
भी औचित्य नहीं रखता, इसलिए यह पद्य रसानौचित्य का उदाहरण कहा जा
सकता है ।
हास्यरसे यथा मम लावण्यवतीनाम्नि काव्ये—
सीधुस्पर्शभयान्न चुम्बसि मुखं किं नासिकां गूहसे,
रे रे श्रोत्रियतां तनोषि विषमां मन्दोऽसि वेश्यां विना ।
इत्युक्त्वा मदघूर्णमाननयना वासन्तिका मालती-
लीनस्यात्रिवसोः करोति वकुलस्येवासवासेचनम् ॥
शृङ्गाररसौचित्ययोरुदाहरणे प्रतिपाद्य सम्प्रति हास्यरसौचित्यं
प्रदर्शयितुमाह—हास्यरसे यथा ममेति । सीधुस्पर्शेति । रे रे अत्रिवसो ?
सीधुस्पर्शभयान्मद्यसंसर्गभीतेः, मुखमाननं, मदीयमिति भावः, न
चुम्बसि, नासिकां नासापुटं, किं किमर्थं, गूहसे मुद्रयसि, मद्यगन्धा-
घ्राणवारणाय रुद्धश्वासां विदधासीति स्पष्टोऽर्थः, एवंविधाचरणेन, विष-
मामनुचितां, श्रोत्रियतां वेदविहितकर्मानुष्ठायितां, तनोषि विस्तारयसि,
परमेतत्सर्वं व्यर्थम् यतो वेश्यां वारनारीं, तदासक्तिमितिलक्षणयार्थ
इति पूर्वोपस्थितामुक्त्वा, मदेन घूर्णमाने नयने यस्यास्तादृशी, वासन्तिका
तन्नामिका कापि वेश्या, मालतीलीनस्य मालतीनामिकायां स्वपत्न्यां,
लीनस्य परमासक्तस्यात एव वेश्यानुरागमुपेक्षमाणस्येति भावः, अत्रिव-
सोस्तन्नाम्नः कस्यचिद्ब्राह्मणस्य, बकुलस्य—बकुलनामख्यातपुष्पतरु
विशेषस्येव, आसवासेचनं मद्यकरणकं सेकं करोतीत्यर्थः । “विकसित
बकुलं योषितामाद्यमद्यै—” रितिकविप्रसिद्धिरीत्या यथा कामिनी शुष्कप्रायं
बकुलतरुं सरसं विधातुं मद्यगण्डूषेण सिञ्चति तथैव नीरसमत्रिवसुं सरसं

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४७

कर्तुं मुखमद्येन सिञ्चतीति भावः। धार्मिकं निजपत्नी-प्रीति-परितुष्टं
कथञ्चित्त्वेश्यासम्पर्कमवाप्तवन्तमत्रिवसुनामानं ब्राह्मणं प्रति वासन्तिका-
नामिकाया वेश्याया आचरणं कविरत्र वर्णयतीति बोध्यम्।
शृंगाररस के औचित्य तथा अनौचित्य के उदाहरण दिखलाने के बाद
अब हास्य रसौचित्य का उदाहरण दिखलाने के लिये कहते हैं हास्यरसे यथा
ममेति। सीधु-स्पर्शेति-यह पद्य क्षेमेन्द्र रचित हास्यरसप्रधान लावण्यवती
नामक काव्य का है। कवि ने इस पद्य में एक धार्मिक (जो अपनी पत्नी के प्रेम
में लीन है पर किसी तरह वेश्या के संपर्क में आ गया है) के प्रति वेश्या के
द्वारा किये गये आचरण का वर्णन किया है। कवि का कथन है कि मद से घूमते
हुए आँखों वाली वासन्तिका नाम की कोई वेश्या-"अपवित्र मद्य के स्पर्श हो
जाने के भय से मेरे मुख को नहीं चूम रहे हो, नाम मूंद रहे हो, अनुचित
श्रोत्रियता (वैदिक ब्राह्मणता) को विस्तृत कर रहे हो, क्यों ? अरे मूढ़ ब्राह्मण !
वेश्या के बिना ही तो तुम में यह शिथिलता आ गयी है, वेश्या के संपर्क में बरा-
बर आते रहते तो यह शिथिलता कभी नहीं होती", ऐसा कहकर मालती नामक
निज पत्नी के प्रेम में लीन अत्रिवसु नामक किसी ब्राह्मण को अपने मुखमद्य
(मद्य की कुल्ली) से उसी तरह सिक्त कर रही है जैसे बकुल वृक्ष को कोई
नारी मद्य की कुल्ली से सींचती है।
अत्र श्रोत्रियस्यात्रिवसोरपवित्रसीधुस्पर्शशङ्कासङ्कोचनीलिनस्य
शुष्कबकुलवृक्षस्येव सरसतापादनाय वेश्याविलासिन्या यदासवासेचनं
तदङ्गभूतशृङ्गाररसाभासस्पर्शेन हास्यरसस्य वरासवस्येव सहकाररस-
वेधेन सचमत्कारमौचित्यमाचिनोति।
उपपादयत्यत्रेति। अत्र सीधुस्पर्शेतिपद्ये, श्रोत्रियस्य वेदाविहिताचार-
निष्ठास्यात्रिवसोस्तन्नामकब्राह्मणस्यापवित्रस्य सीधोर्मद्यस्य स्पर्शे तद्विषय
इति यावत्, या शङ्का, तया यः सङ्कोचः शैथिल्यं तत्र निलीनस्य,
शुष्कबकुलवृक्षस्य नीरसबकुलाख्यपुष्पतरोः, सरसतापादनाय रसमयता-
सम्पादनाय, वेशविलासिन्या वेश्यया, यदासवासेचनं मद्यसेकः, तथा-
सवासेचनमाचिनोति पदबोध्यक्रियाकर्तृ, अङ्गभूतशृङ्गाररसाभासस्पर्शेन,

४८ औचित्यविचारचर्चा
हास्यरसाङ्गभूतो यः शृङ्गाररसाभासो, वेश्यागतत्वेन शृङ्गारस्याभासत्वं
बोध्यम् तस्य सम्बन्धेन, हास्यरसस्य प्रकृतपद्यव्यङ्गनीयस्याङ्गित्वस्येति
भावः, अस्यौचित्यमित्यग्रिमेणान्वयः, वरासवस्य श्रेष्ठमद्यस्य, सहकाररस-
वेधेन सुगन्धिरसालरसमिश्रणेन, सचमत्कारं विच्छित्तिविशेषसहित-
मौचित्यमाचिनोत्याविष्करोति । अयं भावः—प्रधानतया हास्यरसाभिव्यञ्ज-
केऽस्मिन्पद्ये वेश्याकर्तृक-मद्यस्पर्शभयसङ्कुचितश्रोत्रियात्रिवसुकर्मकमुख-
मद्यकरणकसेकवर्णनेन यः शृङ्गाररसाभासोऽङ्गतया व्यञ्जितस्तेन प्रधान-
तयाऽभिव्यज्यमानस्य हास्यरसस्य पुष्टिर्भवतीति रसौचित्योदाहरणतां
प्रतिपद्यते पद्यमेतदिति ।
इस पद्य से हास्य रस अभिव्यक्त होता है, और साथ ही शुष्क बकुल तरु
के समान अपवित्र मद्य स्पर्श की शंका से संकुचित अत्रिवसु को, सरसता उत्पन्न
करने के लिए वेश्या द्वारा मद्य से सिक्त होने की बात वर्णित रहने से, शृङ्गार
रसाभास भी प्रतीत होता है किन्तु इन दोनों रसों में कोई विरोध (परस्परोपम-
र्द्योपमर्दकभाव) नहीं होता, अपितु अंगभूत शृंगाररसाभास के मिश्रण से हास्य
रस का चमत्कार उसी तरह बढ़ जाता है जिस तरह आम्ररसमिश्रण से उत्कृष्ट
मद्य की उपादेयता बढ़ जाती है। फलतः मानना पड़ेगा कि हास्यरसप्रसंग में
शृंगाररसाभासव्यञ्जक वेश्या द्वारा मुख मद्य से सींचने की बात का वर्णन यहाँ
उचित है।
यथा वा मम लावण्यवत्यामेव—
मार्गे केतकसूचिभिन्नचरणा सीत्कारिणी केरली,
रम्यं रम्यमहो पुनः कुरु विटेनेत्यर्थिता सस्मिता ।
कान्ता दन्तचतुष्कबिम्बितशशिज्योत्स्नापटेन क्षणं
धूर्तालोकनलज्जितेव तनुते मन्ये मुखाच्छादनम् ॥
हास्यरसस्यैव औचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयति—यथा वा
ममेति । मार्ग इति । मार्गेऽभिसारपथे, केतकस्य “केवड़ेति” ख्यातस्य,
सूचिभिः कण्टकैर्भिन्नं, छिन्नं, चरणं पादो यस्याः सैवंभूता सती, सीत्का-
रिणी कण्टकभेदनव्यथया सीदित्याकारकं ध्वनिविशेषं कुर्वती, विटेन

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४९
धूर्तेन, "अहोरम्यं रम्य"मरे सुन्दरं सुन्दरं, पुनर्भूयः, कुरु सीत्काररवं
विधेहीत्येवमर्थिता प्रार्थिता, केरली केरलदेशीया, कान्ता सुन्दरी
सस्मिता स्मेराननाऽतएव दन्तानां रदानां चतुष्केन, बिम्बिता चित्रिता या
शशिनश्चन्द्रमसो, ज्योत्स्ना द्युतिस्तद्रूपेण पटेन वस्त्रेण, धूर्तस्य विटस्या-
लोकनेन संदर्शनेन, लज्जिता प्राप्तलज्जेव, क्षणं क्षणमात्रं, मुखाच्छादन-
माननपिधानं, तनुते करोतीति मन्ये सम्भावयामि ।
हास्यरसौचित्य के द्वितीय उदाहरण में यह पद्य उपस्थित किया जा रहा
है—मार्गे इति । विट के साथ अभिसार के लिये जाती हुई केरली नायिका के
पैर में केवड़े का कांटा गड़ गया, जिससे वह सीत्कार कर उठी, यह सुनकर
विट ने—बहुत अच्छा, बहुत अच्छा जरा फिर ऐसा ही करना—यह कह कर
पुनः वैसा ही करने का आग्रह किया, जिससे वह हँसने लगी, अतः उसका मुख
खुल गया ओठों पर दन्तमुक्ता की चमक चन्द्रमा की चान्दनी की तरह झलकने
लग गयी । मुखपर प्रकाश का एक आवरण सा छा गया । इस स्थिति में वह
ऐसी प्रतीत हुई मानो धूर्त के देख लेने से लज्जित सी होकर आगे के चार दाँतों
के द्वारा प्रतिबिम्बित चन्द्रज्योत्स्नारूप वस्त्र से मुख को ढँक रही हो ।
अत्रापि हास्यरसस्य कुटिलविटनर्मोक्तिवचनौचित्येन शृङ्गाररसा-
भासाधिवासितस्य सचमत्कारः परः परिपोषः समुन्मिषति ।
अत्राप्युपर्युक्तपद्येऽपि, कुटिलविटनर्मोक्तिवचनौचित्येन वक्रविटपरि-
हासवचनौचित्येन, शृंगाररसाभासेन पराङ्गनाविषयकतायाऽऽभास-
रूपेण शृंगारेण, अधिवासितस्यानुप्राणितस्य, हास्यरसस्य, सचमत्कारो
विच्छित्तिविशेषमयः, पर उत्कृष्टः परिपोषः, पुष्टिः समुन्मिषति उल्लसति ।
इस पद्य में भी धूर्तशिरोमणि विट के द्वारा कहे गये वचनों के औचित्य से
शृङ्गाररसाभास के द्वारा अनुप्राणित हास्यरस का बहुत हो अच्छा परिपोष प्रस्तुत
हो जाता है ।
नतु यथा श्यामलकस्य—
चुम्बनसक्तः सोऽस्या दशनं च्युतमात्मनो वदनात् ।
जिह्वामूलप्राप्तं खादिति कृत्वा निरष्ठीवत् ॥
४ औ०

५० औचित्यविचारचर्चा
हास्यरसानौचित्यस्योदाहरणमुपस्थापयितुमाह- नतु यथा श्यामेति ।
चुम्बनेति । चुम्बने सक्तः संलग्नः कश्चिदधमो नायको, ऽस्याश्चुम्ब्यमानाया
वृद्धाया नायिकाया, श्च्युतं मूलमादिर्यस्यैवंभूतं त्रुटितमिति यावत् ।
जिह्वामूले कण्ठे, प्राप्तमुपस्थितं, दशनं दन्तं, खाडिति कृत्वा, निष्ठीवन-
कालिकमुद्रोच्चरितखाडितिशब्दविशेषं विधायात्मनः स्वस्य, वदनान्मुखात्,
निरष्ठीवत्ष्ठीवनमकार्षीत् ।
हास्यरसानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा जा रहा है—नतु
यथेति । चुम्बनेति । कोई अधम नायक किसी बूढ़ी को चूम रहा था, बूढ़ी का
एक दाँत टूट कर उस नायक के कण्ठ में चला गया जिसको खखार कर उसने
थूक दिया ।
अत्र हास्यरसस्य बीभत्सरसाधिवासितस्य लसुनलिप्तस्येव कुसुम-
शेखरस्यातिजुगुप्सितत्वादनीप्सितस्य परमानौचित्येन चमत्कारस्ति-
रोहितः । वृद्धापरिचुम्बने जिह्वामूलप्राप्तस्य च्युतदशनस्य कण्ठलोलिनः
ष्ठीवनेन बीभत्सस्यैव प्राधान्यम्, नतु हास्यरसस्य ।
अत्र पद्ये, लसुनलिप्तस्य रसोनरससम्पृक्तस्य, कुसुमशेखरस्य पुष्प-
माल्यस्य, अर्थात्स्वसुगन्धापेक्षयाधिकदुर्गन्धेन युक्तपुष्पमाल्यस्येवातिजु-
गुप्सितत्वादतिबीभत्सत्वादनीप्सितस्यानभिलषितस्य, बीभत्सरसाधि-
वासितस्य बीभत्सरसमिश्रितस्य, हास्यरसस्य, परमानौचित्येनात्यन्तम-
नुचितत्वेन, चमत्कारो विच्छित्तिस्तिरोहितो गुणीकृतः । गुणीकृतत्वे
हेतुमाह—वृद्धेति । वृद्धायाः परिचुम्बने, जिह्वामूलप्राप्तस्य, कण्ठलोलिनो
गललुण्ठनशीलस्य, च्युतदशनस्य पतितदन्तस्य वृद्धासम्बन्धिन इति भावः
ष्ठीवनेन थूत्करणेन, बीभत्सस्यैव बीभत्सरसस्यैव, प्राधान्यं मुख्यत्वं, नतु
ह्वास्यरसस्य । अत एवेदृशपरियोजना हास्यरसानौचित्यसूचिकेति भावः ।
जैसे लसुन के रस से लिप्त अतएव स्वकीय सुगंधापेक्षया अधिक दुर्गन्ध
युक्त पुष्पमाला घृणास्पद हो जाने से अनीप्सित हो जाती है वैसे ही बीभत्स-
मिश्रित-हास्यरस का वर्णन सर्वथा अनुचित है, क्योंकि एसी स्थिति में हास्य

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ५१
घृणित हो जाने से अभीष्ट नहीं होता। फलतः ऐसे ( बीभत्सरसमिश्रित ) हास्य-
रस का वर्णन सर्वथा अनुचित है, क्योंकि ऐसी स्थिति में हास्यरस का चमत्कार
तिरोहित ( गौण ) हो जाता है । चुम्ब्यमान वृद्धा के टूटकर कंठ में ठेकनेवाले
दाँत को चूमने वाले नायक के द्वारा थूकने का वर्णन करने पर क्या हास्यरस
की प्रधानता रह जाती है ? कभी नहीं इस स्थिति में तो बीभत्स ही प्रमुख हो
उठता है ।
करुणे यथा मम मुनिमतमीमांसायाम्—
प्रत्यग्रोपनताभिमन्युनिधने हा वत्स हा पुत्रके-
त्यश्मद्रावि सुभद्रया प्रलपितं पार्थस्य यत्तत्पुरः ।
येनोद्वाष्पविमुक्तशष्पकवलैः सेनातुरङ्गैरपि,
न्यञ्चत्पार्श्वगतैककर्णकुहरैर्निःस्पन्दमन्दं स्थितम् ॥
करुणरसौचित्यमुपदर्शयितुमुपक्रमते—करुणे यथा ममेति प्रत्यग्रेति ।
प्रत्यग्रं सद्यः ( अभिनवम् ) उपनतं प्राप्तं, यदभिमन्योस्तन्नामकार्जुन-
पुत्रस्य, निधनं मृत्युस्तस्मिन् सति, सुभद्रया तन्मात्रा, पार्थस्यार्जुनस्य
स्वपतेः, पुरोग्रे, “हा वत्स ? हा पुत्रक ?” इत्येवंरूपेण यत्प्रलपितं,
तदश्मद्रावि प्रस्तरद्रावकं, येन च प्रलपितेनोद्गतान्युत्पन्नानि, बाष्पाण्य-
श्रूणि येषान्तैस्तथा विमुक्तानि शष्पाणां तृणानां, कवलानि ग्रासानि,
यैस्तैर्न्यञ्चन्ति नम्रीभवन्ति, पार्श्वगतानि चैककर्णहराण्येकैकश्रवणविव-
राणि येषान्तैः, सेनातुरङ्गैः सैन्यवाजिभिरपि निष्पन्दं चेष्टारहितं, मन्दं
तीक्ष्णतारहितञ्च यथा स्यात्तथा स्थितं वृत्तम् ।
करुणरस का उदाहरण दिखलाने के लिए कहा जा रहा है—करुणे यथा
ममेति । प्रत्यग्रेति । सद्यः संपन्न अभिमन्यु की मृत्यु से उसकी माता सुभद्रा ने
अपने पति अर्जुन के समक्ष हा वत्स ! हा पुत्र ? इत्यादि रूप से जो करुण
क्रन्दन किया वह पत्थर को भी पिघला देनेवाला था । साथ ही सेना में काम
आनेवाले घोड़ों की आँखों में भी आँसू भर आये, वे भी घासों का ग्रास छोड़
कर और अपने कानों को नीचे की ओर मोड़कर चुपचाप निस्तेज से खड़े रहे ।

५२ औचित्यविचारचर्चा
अत्र प्रत्यग्रोपनतप्रियतरतनयवियोगोपजनितशोकाख्यस्थायिभावो-
चितं—दृषदामपि हृदयद्रावणं सुभद्रया यत्प्रलपितं तदर्जुनचेतसि प्रति-
फलितं न केवलमुद्दीप्ततामुपगतं यावत्तिरश्चां तुरङ्गमाणामप्यन्तःसंक्रान्त-
मुद्द्बाष्पविमुक्तशष्पकवलनिःस्पन्दमन्द-स्थितादिभिरनुभावैरुदीर्णतरुणकरु-
णरसप्रतिपत्तिं किमप्यादधाति।
अत्रोपयुक्तपद्ये प्रत्यग्रं तत्कालमेवोपनतस्य संप्राप्तस्य, प्रियतरस्य
हृद्यस्य, तनयस्य पुत्रस्य, वियोगेन मृत्युनोपजनितो यः शोकाख्यस्थायिभाव
स्तदुचितं तदुपयुक्तं, दृषदामपि प्रस्तराणामपि, हृदयद्रावणं चित्तद्रावि,
यथा स्यात्तथा, सुभद्रया तन्मात्रा, यत्, प्रलपितं विलपितं, तदर्जुनचेतसि
पार्थचित्ते, प्रतिफ़लितं प्रतिबिम्बितं सत्, न

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ५३
हा देवोज्जयिनीभुजङ्ग युवतिप्रत्यक्षकन्दर्प हा,
हा सद्बान्धव हा कलामृतकर ? क्वासि प्रतीक्षस्व नः ॥
करुणरसानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह — नतु यथेति । हा शृङ्गारेति ।
हेति शोके शृङ्गारस्तन्नामकरसः स एव तरङ्गिणी नदी, तस्याः कुलगिरिः
कुलपर्वतो, नदीप्रभवाः केचन हिमालयादिमुख्यपर्वताः कुलपर्वतत्वेन
परिगणितास्तदन्यतम इति भावः, तत्संबुद्धौ रूपं, यथा तरङ्गिणीनां
मूलभूताः पर्वता एव तथैव त्वमेव शृङ्गाररसस्यादिकारणमिति बोध्यम्,
हा, राज्ञामन्यभूपालानां, चूडामणिर्मुकुटमणिरिव वर्तमानस्तत्संबुद्धौ,
हहेति शोकोपचये, विदग्धो विज्ञजनस्तस्य भावो वैदग्ध्यं, तस्य दुग्धोदधिः
क्षीरसागरस्तत्संबुद्धौ, हा देव हा राजन् ?, उज्जयिन्यास्तन्नामकनगर्या
भुजङ्गो विटः कामुक इति यावत्तत्संबुद्धौ, हा, युवतीनां यौवनसंपन्न-
सुन्दरीणां प्रत्यक्षः साक्षात् । कन्दर्पः कामदेवः, सुन्दरत्वेनोन्मादकत्वा-
दिति भावस्तत्सम्बुद्धौ, हा सद्बान्धव ? हा सन्मित्र ?, हा, कलेवामृतं
तत्करोतीति तत्संबुद्धौ, क्वासि क्व वर्तसे, न, स्त्वद्वियोगज्वालावलीढान-
स्मान्, प्रतीक्षस्व विलोकय ।
करुण रस के अनौचित्य को प्रदर्शित करने के लिये कहा जा रहा है—नतु-
यथेति । हा शृङ्गारेति । उज्जयिनीपति के निधन से शोक संतप्त उनके बान्धव
विलाप कर रहे हैं कि हे देव ? तुम शृङ्गार तरङ्गिणी के लिये एकमात्र उत्स,
भूधर के समान थे, राजाओं के मुकुटों के मणि, सुजनतारूप अमृत के आगार,
और विदग्धता के समुद्र थे, युवतियों के लिये साक्षात् कामदेव, सज्जनों के मित्र
तथा अपूर्व कलाकार थे, तुम कहाँ हो मेरी ओर दृष्टपात करो न ? ।
अत्र 'हाहेति हतमहीपतिविरहे तद्गुणामन्त्रणपदैर्वक्तृवक्त्रगत एव
शोकः केवलमुपलक्ष्यते, नतु विभावातुभावव्यभिचारिसंयोगेन शोकाख्यस्य
स्थायिभावोचितं रसीकरणं किञ्चिन्निष्पन्नम् ।
अत्र, "हाहेतिशब्दस्य प्राचुर्येण, हतमहीपतिविरहे दिवङ्गतमही-
पतिविरहे, तद्गुणामन्त्रणपदैस्तद्गुणाख्यापकशब्दैर्वक्तृवक्त्रगत एव प्रति-
पादकमुखनिष्ठ एव, शोकः, केवलमुपलक्ष्यते, विज्ञायते । नतु विभावा-

५४ औचित्यविचारचर्चा
नुभावव्यभिचारिसंयोगेन कार्यकारणसहकारिकारणसम्मिश्रणेन, शोकाख्य-
स्य शोकनामकस्य, स्थायिभावस्य चित्तविकृतिरूपस्योचितं समुचितं,
रसीकरणं रसरूपतासंपत्तिः, किंचिन्मनागपि निष्पन्नं सम्पन्नमिति।
उचितैर्विभावादिभिः पुष्टीकृत एव स्थायी रसरूपतां प्राप्नोति। अत्र तु
अपुष्टः शोको रसतां नासादयतीति भावः।
यहाँ पर मृत महीपति के विरह में 'हाहा' शब्द के बाहुल्य से ज्ञात होता है
कि केवल वक्ता के मुख में ही शोक है उसे वह व्यक्त करने में सफल नहीं हो
सका है क्योंकि विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संमिश्रण से जो शोक
रूप स्थायीभाव ( चित्तविकृति ) रस रूप में परिणत होता है वह यहाँ कुछ
भी नहीं हो सकता है फिर श्रोता या पाठक के हृदय में कुछ भी करुण रस का
संचार करे तो कैसे ?, इसीलिये यह करुण रसानौचित्य का उदाहरण हुआ।
रौद्रे यथा भट्टनारायणस्य—
यो यः शस्त्रं बिभर्ति स्वभुजगुरुमदः पाण्डवीनां चमूनां,
यो यः पाञ्चालगोत्रे शिशुरधिकवया गर्भशय्यां गतो वा।
यो यस्तत्कर्मसाक्षी चरति मयि रणे यश्च यश्च प्रतीपः,
क्रोधान्धस्तस्य तस्य स्वयमपि जगतामन्तकस्यान्तकोऽहम् ॥
रौद्ररसौचित्यं प्रदर्शयितुमाह—यथा भट्टनारायणेति। यो य इति।
पितृवधाकर्णनेन सक्रोधस्याश्वत्थाम्न उक्तिरियम्। पाण्डवीनां पाण्डवस्ये-
माः पाण्डव्यस्तासां, चमूनां सेनानां ( मध्ये ) यो यो जनः, स्वभुजयोः
स्वबाह्वोर्गुरुर्महान्मदो गर्वो यस्मिन् तादृशः सन्, शस्त्रं, बिभर्ति
धारयति, पाञ्चालगोत्रे द्रुपदराजकुले, यो यो जनः शिशुर्बालकोऽधिकवयाः
परिणतवया युवादिरित्यर्थः, गर्भशय्यां मातुर्गर्भदेशं, गतः प्राप्तो वा,
यो यो जनस्तस्य कर्मणो मत्पितृवधरूपमापातककार्यस्य, साक्षी द्रष्टा,
तथा मय्यश्वत्थाम्नि, रणे संग्रामे, चरति सति, यश्च जनः प्रतीपः
प्रतिकूलो भवेत्, क्रोधान्धो निरतिशयक्रोधशीलोऽहमिह संग्रामे, जगता-
मन्तकस्यापि यमस्यापि सत,स्तस्य तस्य सर्वस्येत्यर्थः, अन्तको यमो
विनाशयिता भवेयमिति भावः।

संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेता ५५
रौद्ररसौचित्य को प्रदर्शित करने के लिये कहा गया है—यथा भट्टेति ।
यो य इति । छल से मेरे पिता मारे गये यह समाचार सुनकर अश्वत्थामा क्रोधान्ध
होकर कह रहा है—पाण्डव की सेना में अपने बाहुबल का घमंड करने वाला जो
जो अस्त्र धारण करता है, अथवा द्रुपद के कुल में जो जो बच्चा बूढ़ा या गर्भस्थ
शिशु है तथा जो जो मेरे पिता की हत्या का साक्षी ( निर्विरोधरूप से देखने
वाला ) भी है, या मेरे संग्राम में पहुँचने पर जो जो मेरा विरोध करने वाला
होगा, वह स्वयं यमराज भी क्यों न हो आज इस युद्धभूमि में मैं क्रोधोन्मत्त
होकर सबका विनाश करके ही रहूँगा ।
अत्र क्रूरक्रोधस्थायिभावात्मकस्योन्निद्ररौद्ररसस्योचिता शिशुस्थ-
विरगर्भगतविशसननिस्त्रिंशकर्माध्यवसायाधिरोहणसंवादिनी द्रोणवधवि-
धुरामर्षविषविषमव्यथा कश्मलशिथिलमश्वत्थाम्नः स्थेमानं प्रतिज्ञा-
पयति ।
अत्र

५६ औचित्यविचारचर्चा
नतु यथा श्रीप्रवरसेनस्य--
दणुइन्दरुहिरलग्गे जस्स फुरन्ते णहप्पहाविच्छडे ।
गुप्पन्ती विवलाआ गलिअबत्थणंसुए, महासुरलच्छी ॥
[ दनुजेन्द्ररुधिरलग्ने यस्य स्फुरति नखप्रभासमूहे ।
व्याकुलीभवन्ती विपलायिता गलितस्तनांशुका महासुरलक्ष्मीः ॥ ]
॥ इति छाया ॥
रौद्ररसानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह-नतु यथा श्रीप्रवरसेनस्येति ।
दणुइन्देति ।
हिरण्यकशिपुविनाशकारिणो भगवतो नृसिंहस्य वर्णनेयम् । दनुजेन्द्र-
रुधिरलग्ने हिरण्यकशिपुरक्तव्याप्ते, यस्य नृसिंहस्य, नखप्रभासमूहे नख-
द्युतिसंघे, स्फुरति भासमाने सति, महासुरलक्ष्मीर्दैत्यराजश्रीः, व्याकुली-
भवन्ती क्लान्तचित्ताऽत एव गलितस्तनांशुका पतितकुचवस्त्रा, विपला-
यिता दूरं गता ।
दनुजेन्द्र ( हिरण्यकशिपु ) के रक्त से लिप्त जिनके नखद्युति की चमक से
व्याकुल होती हुई हिरण्यकशिपु की राज्यलक्ष्मी विवस्त्रा होकर भाग गयी ।
अत्र क्रोधव्यञ्जकपदविरहिततया "दनुजेन्द्ररुधिरलग्ने यस्य नृसिंहस्य
स्फुरति नखप्रभासमूहे व्याकुलीभवन्ती विपलायिता गलितस्तनांशुका
महासुरलक्ष्मीः" इति वर्णनया रुधिरलग्न इति बीभत्सरससंस्पर्शे व्या-
कुलीभवन्ती दैत्यश्रीः पलायितेति भयानकरससङ्करेण प्रकृतोचितप्रधान-
भूतस्य रौद्ररसस्य क्वचिन्मुखमपि न दृश्यते ।
पूर्वोक्तपद्यमेवोपपादयत्यत्रेति । अत्र पद्ये, क्रोधव्यञ्जकपदविरहिततया
कोपसूचकपदप्रयोगाभावेन, "दनुजेन्द्ररुधिरलग्ने" इत्यादिवर्णनेन, रुधिर-
लग्न इतिकथनात्, बीभत्सरससंस्पर्शेऽसृगादिवर्णनाया बीभत्सरसोपयुक्त-
त्वेन सर्वसम्मततया प्रकृते तदुपयोगाद्बीभत्सरसप्रवेशे इति भावः । तथा
व्याकुलीभवन्ती दैत्यश्रीः पलायितेतिभयानकरससङ्करेणार्थात् आतङ्कादे-

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ५७
भयानकरसोपयोगितया प्रकृते तद्वर्णनतो भयानकरससम्मिश्रणेन, प्रकृतस्य
प्रसङ्गप्राप्तस्योचितस्यानुरूपस्यात एव प्रधानस्य मुख्यतयाभिव्यञ्जनीयस्य,
रौद्ररसस्य, क्वचित्कुत्रापि मुखमपि न दृश्यते, आंशिकरूपेणापि प्रतीतिर्न
भवतीति भावः ।
इस पद्य में क्रोधव्यञ्जक पदों का अभाव रहने के कारण, तथा “रुधिरलग्ने”
इस वर्णन से बीभत्स रस का, एवं “व्याकुलीभवन्ती दैत्यश्रीः पलायिता” इस
वर्णन से भयानक रस का संमिश्रण हो जाने के कारण पूर्वप्रसंगानुरूप अतएव
प्रधानभूत रौद्र रस का कहीं पता तक नहीं चल पाता है । इसलिए यह पद्य
रौद्ररसानौचित्य का ही द्योतन कर रहा है, औचित्य का नहीं ।
वीरे यथा मम नीतिलतायाम्—
शौर्याराधितभर्ग भार्गवमुनेः शस्त्रग्रहोन्मार्गिणः,
संक्षेपेण निवार्य संक्षयमयीं क्षत्रोचितां तीक्ष्णताम् ।
आकर्णायतकृष्टचापकुटिलभ्रूभङ्गसंसर्गिणा,
येनान्यायनिषेधिना शममयी ब्राह्मी प्रदिष्टा स्थितिः ॥
वीररसौचित्यस्योदाहरणं प्रदर्शयितुमाह—वीरे यथा ममेति । शौर्या-
राधितेति । शस्त्रग्रहोन्मार्गिणः शस्त्रग्रहणरूपकुपथगामिनो, ब्राह्मणानां
शस्त्रग्रहणं शास्त्रविरुद्धमिति तथा कुर्वतः परशुरामस्य कुपथगामित्वं स्पष्ट-
मेवेति भावः, शौर्येण वीरतयाऽऽराधितोऽनुकूलितो भर्गः शिवो येनैवंभूतो
यो भार्गवमुनिस्तस्य, संक्षयमयीं विनाशात्मिकां, क्षत्रोचितां क्षत्रियानु-
कूलां, तीक्ष्णतां, तेजस्वितां, संक्षेपेण समासतो, निवार्य प्रतिरुद्ध्य,
आकर्णं कर्णदेशपर्यन्त, मायतो दीर्घः, कृष्टो यश्चापो धनुस्तद्रूपो यः कुटिलो
वक्रो भ्रूभङ्गस्तत्संसर्गिणा सम्पर्किणा, तद्युक्तेनेत्यर्थः, अन्यायनिषेधिनाऽनु-
चितप्रतिरोधिना, येन रामेण, शममयी शान्तिप्रचुरा, ब्राह्मी ब्राह्मणोचिता,
स्थितिर्मर्यादा, प्रदिष्टोपदिष्टा । सोऽयं राम इति पूर्वेणान्वयः ।
वीररसौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है—वीरे यथा ममेति ।
शौर्याराधितेति । शस्त्रग्रहण ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध है, फिर भी वैसा करके कुपथ
पर चलने वाले महामुनि परशुराम (जिन्होंने अपने तप के प्रभाव से भगवान्

५८ औचित्यविचारचर्चा

शंकर को भी अनुकूल कर लिया था ) को, उनकी विनाशमय क्षत्रियोचित
तीक्ष्णता को संक्षेप से निवारण करके कान तक खिंचे हुए धनुषरूप कुटिलभ्रूबङ्ग
के संपर्की अन्याय का विरोधी जिस राम ने शान्तिमय ब्राह्मणोचित मर्यादा का
उपदेश किया था । यह वही राम हैं यह पूर्व संबद्ध है ।
अत्र “सोऽयं राम” इति रावणाग्रे शुकसारणाभ्यां दूरान्निर्दिश्य-
मानस्य रामस्य निःसंरम्भगम्भीरावष्टम्भसंभाव्यमानप्रभावोचितायां
शस्त्रसंग्रहोन्मार्गगामिनो भार्गवस्य मुनेः स्वजातिसमुचितस्थित्युपदेशे
सति प्रभविष्णुतायां चापरूपभङ्ग्या भ्रूभङ्गः प्रदर्शितः न तु स्वाभाविकः
वीरस्य क्रोधे विकारासंभवात् । प्रसन्न मधुरधीरा हि वीरवृत्तिः, तदु-
चितमत्राभिहितम् । भार्गवाभिभवेन च प्रधाननायकस्योत्कर्षः प्रति-
पादितः ।
अत्रोक्तपद्ये, “सोऽयं रामः, इत्येवंरूपेण रावणाग्रे, शुकसारणाभ्यां
तत्तन्नामकाभ्यामनुचराभ्यां दूरान्निर्दिश्यमानस्य दूरत एव संकेततो दर्शय-
मानस्य, रामस्य, निःसंरम्भोऽयत्नसिद्धो, गम्भीरो गहनश्च, योऽवष्टम्भ
आक्रमणं, तेन संभाव्यमान उह्यमानो यः प्रभावस्तदुचितायां तदनुरू-
पायां, शस्त्रसंग्रहोन्मार्गगामिनः शस्त्रसंग्रहणरूपकुपथगामिनो, ब्राह्मणो
भूत्वा शस्त्रं संगृह्णातीति भार्गवस्योन्मार्गगामिता बोध्या, मुनेर्भार्गवस्य
परशुरामस्य, स्वजातिसमुचितस्थित्युपदेशे ब्राह्मणोपयुक्तमर्यादोपदेशे सति
ब्राह्मणोचितवृत्तिबोधे सतीत्यर्थः, प्रभविष्णुतायां प्रभावशालितायां, चाप-
रूपभङ्ग्या धनुःस्वरूपशैलीविशेषेण, भ्रूभङ्गः प्रदर्शितो, नतु स्वभाविको
यतो हि वीरस्य क्रोधे विकारासंभवः वीरस्य क्रोधकृतविकारो नोत्पद्यत
इति भावः । हि यतः, वीरवृत्तिर्वीरचरितं, प्रसन्नमधुरधीरा प्रसन्नोज्ज्वला,
मधुरा स्पृहणीया, धीरा धैर्यान्विता च भवतीति शेषः तदुचितं प्रोक्त-
वीरवृत्त्युपयुक्तमत्र प्रकृतपद्येऽभिहितमुक्तम् । भार्गवाभिभवेन परशुराम-
पराजयेन, च, प्रधाननायकस्य रामस्योत्कर्षो वैशिष्ट्यं प्रतिपादितः
कथितः ।

संस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता ५९
यह पद्य क्षेमेन्द्रकृत नीतिलता नामक निबन्ध का है, इस पद्य का वक्ता
रावण के सेवक शुक और सारण हैं। वे दोनों रावण के सामने कहते हैं कि
यह वही राम हैं जिन्होंने ....... ऐसा किया । इस पद्य से राम की वीरता अभि-
व्यक्त होती है। कारण राम ने ब्राह्मणजातिविरुद्ध शस्त्रग्रहण-करने वाले
परशुराम को ब्राह्मणोचित मर्यादा का उपदेश किया-अर्थात् उनसे शस्त्र-त्याग
करवा दिया, इस वर्णन से सिद्ध होता है कि राम ने परशुराम पर आक्रमण
किया, पर उस आक्रमण के लिए पूर्व से कोई तैयारी नहीं थी उसमें उतावला-
पन भी नहीं था, अपितु-गंभीरता थी, इससे राम का समुचित प्रभाव व्यक्त
होता है। चाप द्वारा भ्रूभङ्ग की बात कह कर औचित्य की रक्षा और अधिक
की गयी है, क्योंकि भ्रूभङ्ग एक क्रोधजन्य विकार है और वीर जन के कोप,
विकार-रहित होते हैं। इन सब सिद्धान्तों के अनुकूल वर्णन यहाँ है। परशुराम
के पराभव से राम की उत्कृष्टता सिद्ध की गयी है। फलतः वीररसौचित्य का पद्य
उदाहरण है।
यथा वा राजशेखरस्य—
स्त्रीणां मध्ये सलीलं भ्रमितगुरुगदाघातनिर्नष्टसंज्ञः,
सद्यो वध्योऽभवस्त्वं पशुरिव विवशस्तेन राज्ञाऽर्जुनेन ।
तस्य च्छेत्तापि योऽसौ सकलनृपरिपुर्जा मदग्न्यो भुजानां,
जित्वोच्चैः सोऽपि येन द्विज इति न हतस्तापसस्त्वेष रामः ॥
वीररसस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयितुमाह—यथा वा राजेति ।
स्त्रीणामिति । रावणं प्रत्युक्तिरियम् । स्त्रीणां वनितानां, मध्येऽग्रत एव,
स्त्रीणां मध्ये सर्वेऽपि स्वपुरुषार्थं प्रदर्शयन्त्यतस्तत्समक्षे, जायमाना दुर-
वस्थाऽधिकाधिप्रदेति भावः, पशुरिव, विवशोऽशक्तो, भ्रमिता घूर्णिता गुर्वी
घोरा, या गदा तस्याघातेन प्रहारेण, निर्नष्टा, संज्ञाऽवबोधो यस्यैव-
भूतस्त्वं रावण इत्यर्थः, तेनातिबलवता राज्ञा नृपतिनाऽर्जुनेन, कार्तवीर्या-
र्जुनेन, सद्यस्तत्कालमेव, सलीलमनायासं, वध्यते घातयितुं योग्योऽभवः
संजातः, तस्य, कार्तवीर्यार्जुनस्य च भुजानां सहस्रसंख्यकबाहू

६० | औचित्यविचारचर्चा

कर्तयितापि, सकलनृपरिपुर्निःशेषक्षत्रियध्वंसकारी, योऽसौ, योऽयं, जाम-
दग्न्यः परशुराम, सोऽपि परशुरामोऽपि, उच्चैः साधुतया सम्यक्प्रकारे-
णेत्यर्थः, जित्वा विजित्य, येन रामेण द्विज इति कृत्वा ब्राह्मण, इति
मत्वा, न, हतो मारितः । एष पुरोवर्ती, तापसस्तपस्वी, तु, स एव रामो-
ऽस्तीति भावः ।
वीररसौचित्य का दूसरा उदाहरण दिखलाने के लिए कहा गया है—यथा
वा राजेति । स्त्रीणामिति । इस पद्य के द्वारा रावण को राम का परिचय दिलाते
हुए कहा गया है कि जिस कीर्तवीर्यार्जुन ने स्त्रियों के सामने ही अपनी गदा के
आघात से तुम्हें बेहोश कर दिया था, इतना ही नहीं पशुओं के समान कातर
और विवश होकर मरने के लिए बाध्य भी कर दिया था, उस कीर्तवीर्यार्जुन के
हजारों हाथों को काट कर जिस परशुराम को अच्छी तरह जीत कर भी जिन्होंने
केवल ब्राह्मण होने के कारण जान से नहीं मारा यह तापसवेषधारी वही
पुरुषोत्तम राम हैं ।
अत्र रावणकार्तवीर्यजामदग्न्योत्कर्षोत्कर्षतरसोपानपरम्पराधिरोहण-
क्रमेण प्रधाननायकस्य प्रतापः परां कोटिमारोपितः ।
अत्रोपर्युक्तपद्ये, रावणकार्तवीर्यजामदग्न्योत्कर्षोत्कर्षतरसोपानपरम्प-
राधिरोहणक्रमेण रावणकार्तवीर्यार्जुनपरशुरामाणामुत्तरोत्तराधिकमहत्त्वा-
त्मकालिन्दश्रेणीसंप्राप्तिपरिपाट्या, प्रधाननायकस्य रामस्य, प्रतापो महिमा,
परामुत्कृष्टां, कोटिं काष्ठामारोपितो गमितः ।
इस पद्य में रावण, कार्तवीर्यार्जुन और परशुराम की उत्कृष्टता का जो
क्रमिक आधिक्य दिखाया गया है उससे प्रधान नायक राम की महिमा पराकाष्ठा
को प्राप्त कर जाती है । इस प्रकार वीर रस के औचित्य का बड़ा ही सुन्दर
निर्वाह यहाँ पर हो पाया है ।
नतु यथा भवभूतेः—
वृद्धास्ते न विचारणीयचरितास्तिष्ठन्तु हुं वर्ततां,
युद्धं स्त्रीदमनेऽप्यखण्डयशसो लोके महान्तो हि ते ।