सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 111

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ५१
घृणित हो जाने से अभीष्ट नहीं होता। फलतः ऐसे ( बीभत्सरसमिश्रित ) हास्य-
रस का वर्णन सर्वथा अनुचित है, क्योंकि ऐसी स्थिति में हास्यरस का चमत्कार
तिरोहित ( गौण ) हो जाता है । चुम्ब्यमान वृद्धा के टूटकर कंठ में ठेकनेवाले
दाँत को चूमने वाले नायक के द्वारा थूकने का वर्णन करने पर क्या हास्यरस
की प्रधानता रह जाती है ? कभी नहीं इस स्थिति में तो बीभत्स ही प्रमुख हो
उठता है ।
करुणे यथा मम मुनिमतमीमांसायाम्—
प्रत्यग्रोपनताभिमन्युनिधने हा वत्स हा पुत्रके-
त्यश्मद्रावि सुभद्रया प्रलपितं पार्थस्य यत्तत्पुरः ।
येनोद्वाष्पविमुक्तशष्पकवलैः सेनातुरङ्गैरपि,
न्यञ्चत्पार्श्वगतैककर्णकुहरैर्निःस्पन्दमन्दं स्थितम् ॥
करुणरसौचित्यमुपदर्शयितुमुपक्रमते—करुणे यथा ममेति प्रत्यग्रेति ।
प्रत्यग्रं सद्यः ( अभिनवम् ) उपनतं प्राप्तं, यदभिमन्योस्तन्नामकार्जुन-
पुत्रस्य, निधनं मृत्युस्तस्मिन् सति, सुभद्रया तन्मात्रा, पार्थस्यार्जुनस्य
स्वपतेः, पुरोग्रे, “हा वत्स ? हा पुत्रक ?” इत्येवंरूपेण यत्प्रलपितं,
तदश्मद्रावि प्रस्तरद्रावकं, येन च प्रलपितेनोद्गतान्युत्पन्नानि, बाष्पाण्य-
श्रूणि येषान्तैस्तथा विमुक्तानि शष्पाणां तृणानां, कवलानि ग्रासानि,
यैस्तैर्न्यञ्चन्ति नम्रीभवन्ति, पार्श्वगतानि चैककर्णहराण्येकैकश्रवणविव-
राणि येषान्तैः, सेनातुरङ्गैः सैन्यवाजिभिरपि निष्पन्दं चेष्टारहितं, मन्दं
तीक्ष्णतारहितञ्च यथा स्यात्तथा स्थितं वृत्तम् ।
करुणरस का उदाहरण दिखलाने के लिए कहा जा रहा है—करुणे यथा
ममेति । प्रत्यग्रेति । सद्यः संपन्न अभिमन्यु की मृत्यु से उसकी माता सुभद्रा ने
अपने पति अर्जुन के समक्ष हा वत्स ! हा पुत्र ? इत्यादि रूप से जो करुण
क्रन्दन किया वह पत्थर को भी पिघला देनेवाला था । साथ ही सेना में काम
आनेवाले घोड़ों की आँखों में भी आँसू भर आये, वे भी घासों का ग्रास छोड़
कर और अपने कानों को नीचे की ओर मोड़कर चुपचाप निस्तेज से खड़े रहे ।