औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० | औचित्यविचारचर्चा
कर्तयितापि, सकलनृपरिपुर्निःशेषक्षत्रियध्वंसकारी, योऽसौ, योऽयं, जाम-
दग्न्यः परशुराम, सोऽपि परशुरामोऽपि, उच्चैः साधुतया सम्यक्प्रकारे-
णेत्यर्थः, जित्वा विजित्य, येन रामेण द्विज इति कृत्वा ब्राह्मण, इति
मत्वा, न, हतो मारितः । एष पुरोवर्ती, तापसस्तपस्वी, तु, स एव रामो-
ऽस्तीति भावः ।
वीररसौचित्य का दूसरा उदाहरण दिखलाने के लिए कहा गया है—यथा
वा राजेति । स्त्रीणामिति । इस पद्य के द्वारा रावण को राम का परिचय दिलाते
हुए कहा गया है कि जिस कीर्तवीर्यार्जुन ने स्त्रियों के सामने ही अपनी गदा के
आघात से तुम्हें बेहोश कर दिया था, इतना ही नहीं पशुओं के समान कातर
और विवश होकर मरने के लिए बाध्य भी कर दिया था, उस कीर्तवीर्यार्जुन के
हजारों हाथों को काट कर जिस परशुराम को अच्छी तरह जीत कर भी जिन्होंने
केवल ब्राह्मण होने के कारण जान से नहीं मारा यह तापसवेषधारी वही
पुरुषोत्तम राम हैं ।
अत्र रावणकार्तवीर्यजामदग्न्योत्कर्षोत्कर्षतरसोपानपरम्पराधिरोहण-
क्रमेण प्रधाननायकस्य प्रतापः परां कोटिमारोपितः ।
अत्रोपर्युक्तपद्ये, रावणकार्तवीर्यजामदग्न्योत्कर्षोत्कर्षतरसोपानपरम्प-
राधिरोहणक्रमेण रावणकार्तवीर्यार्जुनपरशुरामाणामुत्तरोत्तराधिकमहत्त्वा-
त्मकालिन्दश्रेणीसंप्राप्तिपरिपाट्या, प्रधाननायकस्य रामस्य, प्रतापो महिमा,
परामुत्कृष्टां, कोटिं काष्ठामारोपितो गमितः ।
इस पद्य में रावण, कार्तवीर्यार्जुन और परशुराम की उत्कृष्टता का जो
क्रमिक आधिक्य दिखाया गया है उससे प्रधान नायक राम की महिमा पराकाष्ठा
को प्राप्त कर जाती है । इस प्रकार वीर रस के औचित्य का बड़ा ही सुन्दर
निर्वाह यहाँ पर हो पाया है ।
नतु यथा भवभूतेः—
वृद्धास्ते न विचारणीयचरितास्तिष्ठन्तु हुं वर्ततां,
युद्धं स्त्रीदमनेऽप्यखण्डयशसो लोके महान्तो हि ते ।