औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 119, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता ५९
यह पद्य क्षेमेन्द्रकृत नीतिलता नामक निबन्ध का है, इस पद्य का वक्ता
रावण के सेवक शुक और सारण हैं। वे दोनों रावण के सामने कहते हैं कि
यह वही राम हैं जिन्होंने ....... ऐसा किया । इस पद्य से राम की वीरता अभि-
व्यक्त होती है। कारण राम ने ब्राह्मणजातिविरुद्ध शस्त्रग्रहण-करने वाले
परशुराम को ब्राह्मणोचित मर्यादा का उपदेश किया-अर्थात् उनसे शस्त्र-त्याग
करवा दिया, इस वर्णन से सिद्ध होता है कि राम ने परशुराम पर आक्रमण
किया, पर उस आक्रमण के लिए पूर्व से कोई तैयारी नहीं थी उसमें उतावला-
पन भी नहीं था, अपितु-गंभीरता थी, इससे राम का समुचित प्रभाव व्यक्त
होता है। चाप द्वारा भ्रूभङ्ग की बात कह कर औचित्य की रक्षा और अधिक
की गयी है, क्योंकि भ्रूभङ्ग एक क्रोधजन्य विकार है और वीर जन के कोप,
विकार-रहित होते हैं। इन सब सिद्धान्तों के अनुकूल वर्णन यहाँ है। परशुराम
के पराभव से राम की उत्कृष्टता सिद्ध की गयी है। फलतः वीररसौचित्य का पद्य
उदाहरण है।
यथा वा राजशेखरस्य—
स्त्रीणां मध्ये सलीलं भ्रमितगुरुगदाघातनिर्नष्टसंज्ञः,
सद्यो वध्योऽभवस्त्वं पशुरिव विवशस्तेन राज्ञाऽर्जुनेन ।
तस्य च्छेत्तापि योऽसौ सकलनृपरिपुर्जा मदग्न्यो भुजानां,
जित्वोच्चैः सोऽपि येन द्विज इति न हतस्तापसस्त्वेष रामः ॥
वीररसस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयितुमाह—यथा वा राजेति ।
स्त्रीणामिति । रावणं प्रत्युक्तिरियम् । स्त्रीणां वनितानां, मध्येऽग्रत एव,
स्त्रीणां मध्ये सर्वेऽपि स्वपुरुषार्थं प्रदर्शयन्त्यतस्तत्समक्षे, जायमाना दुर-
वस्थाऽधिकाधिप्रदेति भावः, पशुरिव, विवशोऽशक्तो, भ्रमिता घूर्णिता गुर्वी
घोरा, या गदा तस्याघातेन प्रहारेण, निर्नष्टा, संज्ञाऽवबोधो यस्यैव-
भूतस्त्वं रावण इत्यर्थः, तेनातिबलवता राज्ञा नृपतिनाऽर्जुनेन, कार्तवीर्या-
र्जुनेन, सद्यस्तत्कालमेव, सलीलमनायासं, वध्यते घातयितुं योग्योऽभवः
संजातः, तस्य, कार्तवीर्यार्जुनस्य च भुजानां सहस्रसंख्यकबाहू