औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 115, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेता ५५
रौद्ररसौचित्य को प्रदर्शित करने के लिये कहा गया है—यथा भट्टेति ।
यो य इति । छल से मेरे पिता मारे गये यह समाचार सुनकर अश्वत्थामा क्रोधान्ध
होकर कह रहा है—पाण्डव की सेना में अपने बाहुबल का घमंड करने वाला जो
जो अस्त्र धारण करता है, अथवा द्रुपद के कुल में जो जो बच्चा बूढ़ा या गर्भस्थ
शिशु है तथा जो जो मेरे पिता की हत्या का साक्षी ( निर्विरोधरूप से देखने
वाला ) भी है, या मेरे संग्राम में पहुँचने पर जो जो मेरा विरोध करने वाला
होगा, वह स्वयं यमराज भी क्यों न हो आज इस युद्धभूमि में मैं क्रोधोन्मत्त
होकर सबका विनाश करके ही रहूँगा ।
अत्र क्रूरक्रोधस्थायिभावात्मकस्योन्निद्ररौद्ररसस्योचिता शिशुस्थ-
विरगर्भगतविशसननिस्त्रिंशकर्माध्यवसायाधिरोहणसंवादिनी द्रोणवधवि-
धुरामर्षविषविषमव्यथा कश्मलशिथिलमश्वत्थाम्नः स्थेमानं प्रतिज्ञा-
पयति ।
अत्र