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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

अनुपलम्भवाद' ४५३
शून्यसाकारादिप्रतिपादकानां तु दुरभ्यासः, योगशास्त्रेष्वभ्य-
स्यतः स्वरूपशून्यमिव भाव्यमेकमेवेति प्रतिपादनात् ।
चैत्यचीवरादिप्रतिपादकानां तु स्वस्थितिमभिसन्धाय
दर्शनान्तरस्थितिद्वेषः, स्वस्थितौ प्रमाणमनपेक्ष्य परस्थितौ
विगानात् । ब्रह्मचर्यप्रतिपादकानां तु वेदा एव, न्यायावि-
रुद्धं परतन्त्रोक्तमप्यानुकूल्यप्रसिद्धेर्गृह्यत इति विमर्शात् । मन्त्र-
कोपप्रतिपादकानां तु प्रणवबीजजातयः सर्वसाधारणाः, श्रद्धेय-
होनेके कारण कभी मुक्त नहीं हो सकेगा—इत्यादि कथन कुतर्काभ्यास
ही है । इनका कुतर्कत्व पूर्व प्रकरणमे सिद्ध किया जा चुका है ।
जो आगम 'शून्यवाद' एव 'बाह्यपदार्थ ज्ञानके ही आकारविशेष हैं'
इत्यादि वादके प्रतिपादक हैं, उनका मूल तो दुरभ्यास (दूषित भावना)
है । क्योंकि योगशास्त्रका अभ्यास करते हुए चित्तको बाह्यवस्तुओंसे
पृथक्‌कर जगत् शून्यताको ही एकमात्र अपनी भावनाका विषय बनाते
हुए किसीने शून्यवादका सिद्धान्त बना डाला ।
जो आगम चैत्य (बौद्धोंका देवताविशेष) वन्दना एव चीवर-
(वस्त्र) परित्यागके प्रतिपादक हैं, उनका तो मूल दिगम्बरोंका अपने
सिद्धान्तके मोहमे अन्यदर्शनके साथ द्वेष ही है। क्योकि चैत्यवन्दन
एव चीवरपरित्यागके सिवाय अन्य कुछ भी मानने योग्य नहीं है—
अपने इस सिद्धान्तमे बिना कुछ प्रमाण दिये ही दूसरोंके सिद्धान्तका
केवल निन्दा करते हैं ।
जो आगम ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा आदिके प्रतिपादक हैं, उनका
मूल तो वेद ही है । क्योंकि अपने न्यायसे जो विरुद्ध न हो, ऐसा
परकीय आगममें कहा हुआ भी अपने अनुकूल होनेसे ग्राह्य होता है—
ऐसा विचार कर ब्रह्मचर्य आदिका प्रतिपादन किया गया है । अथवा
ब्रह्मचर्यके प्रतिपादनसे एक भागमें विश्वास उत्पन्न कर उसी दृष्टान्तसे
बौद्धागमोंके सभी भागोंके प्रति विश्वास पैदा करनेके लिये सुगतोंने
ब्रह्मचर्य आदिका प्रतिपादन कर दिया ।
बौद्धोंके जो आगम मन्त्र समुदायके प्रतिपादक हैं, उनका मूल तो

देवतानामाङ्कस्त्वधिकः । श्रद्धापरिगृहीतश्चाकारो देवतेति
हस्तसमालोचः ।
सत्यतपःशालिनां वचनं मन्त्रो, विषयवत्यां चिन्तायां
चित्तस्थैर्यं प्रयोजनम् । कथमन्यथा महर्षीणां शापानुग्रह-
क्षमता; कथं वा चतुर्भुजाष्टभुजाद्यवस्थेति¹ दुरुहादिति ।
हमारे वैदिक-मन्त्रगत प्रणवजातियाँ और उन उन देवताओंके बीज-
मन्त्राक्षर ही हैं, जो सर्वत्र एक रूपसे प्रयुक्त हैं। अर्थात् उन्हें ही
देखकर तदनुसार रूप कल्पनाकर या कहीं साक्षात् उन बीजाक्षरोंको ही
बौद्धोंने अपने मन्त्रोंमें प्रक्षिप्त कर लिया है तथा उन्हींके प्रभावसे बौद्धों
में आदित्यस्तम्भन या प्रतिमाका बोलना आदि शक्ति देखी जाती है।
श्रद्धेय देवताओंके सूर्य आदि नामकी जगह चैत्य आदि भिन्न नामोंका
निर्देश ही उनकी अपनी विशेषता है। चैत्य आदि जिस आकारका
श्रद्धासे ध्यान किया जाय, वही देवता है—यह तो उनकी अपने हाथ
की कल्पनामात्र है। अर्थात् सूर्य आदि देवताओंका अपना अपना रूप
निश्चित होता है। यह नहीं की ध्याताके ध्यानके अनुसार परिवर्तित
होने वाला हो।
यह कहना कि—सत्य और तपस्यासे युक्त व्यक्तियोंका वचन ही
मन्त्र है न कि आस्तिकोंका वेदभाग मन्त्र है। तथा किसी भी आकार-
का चिन्तन करनेपर जो चित्तमे स्थिरता आती है, वही उन देवताओंके
ध्यानका प्रयोजन है। यदि सत्य और तपस्याशील व्यक्तियोंका
वचन मन्त्र नहीं होता तो महर्षियोंमे शाप और वरदानकी क्षमता कैसे
आती। एव ध्यानानुसार यदि देवताका आकार नहीं होता तो चतुर्भुज,
अष्टभुज आदि अवस्थायें देवताकी कैसे होतीं—तो दुरुह (कल्पनातीत)
होनेके कारण यह पक्ष ठीक नहीं है। अर्थात् यदि तपस्वियोंका
वचन ही मन्त्र होता तो अनेक तपस्वियोंके अनेक वचन होनेसे किस
तपस्वीका कौन सा वचन मन्त्र है, यह कल्पना कठिन है। एव यदि
चित्तका स्थैर्यमात्र ही चतुर्भुज आदि अवस्थाओंका उपयोग होता तो
१. दुरुह वात् इति शङ्करमिश्रसम्मतः पाठः ।

अनुपलम्भवादः ४५५
एकविप्रलम्भार्थं वा केनचित् कियदेव प्रणीतं तेनानुष्ठित-
मपरैस्तदनुयायिभिर्गृहीतमन्वष्ठितं व्याख्यातं विवर्धितं चेति
किमनुपपन्नम् ? तस्माद् विरुद्धागमव्युदासेन वेदा एवार्वा-
चीनपुरुषपूर्वकत्वशङ्काव्युदासेन परमेश्वरप्रणीतत्वादेव भूतार्थ-
भागस्याप्रामाण्यशङ्काव्युदासेन प्रमाणमेवेति नियमः ।
कथं चरम इति चेत् ? महाजनपरिग्रहस्य तत्साध्यस्य
वा सर्वज्ञपूर्वकत्वस्य पुरुषदोषाभावस्य वा प्रामाण्यहेतोर्भूतभा-
जिस किसी वस्तुकी चिन्तासे ही चित्त स्थिर हो जा सकता है, फिर
मूर्तिविशेषको देवताके रूपमें कैसे कल्पित कर सकते हैं ?
अथवा यों कहनेमें भी कोई अनुपपत्ति नहीं है कि किसी एकको
ठगनेके लिए किसीने कुछ बना दिया तथा उस वञ्चित व्यक्तिने तदनुसार
अनुष्ठान किया और उसीकी देखादेखी और अनुयायियोंने भी उसे
ग्रहण कर लिया, तदनुसार अनुष्ठान किया, उसकी व्याख्यायें कीं तथा
लोकमें उसे फैला दिया ।
इसलिये वेदविरुद्ध आगमोंके परवञ्चनार्थ बनाये होनेके कारण
अप्रामाणिक होनेसे उनके खण्डितकर दिये जानेसे ही, एवं वेदोंके
आधुनिक पुरुषद्वारा निर्मित होनेकी शङ्काके खण्डित हो जानेसे
परमेश्वरप्रणीत होनेसे ही, तथा वेदके भव्यार्थभाग ( साध्यार्थभाग
अर्थात् क्रियाभाग ) के समान भूतार्थभाग ( सिद्धार्थभाग ) में भी
अप्रामाण्यशङ्काके खण्डित हो जानेसे प्रमाण ही है, ऐसा नियम सिद्ध
हो जाता है । अर्थात् वेद ही प्रमाण है, अन्य नहीं--ऐसा उद्देश्यगत
नियम, तथा ईश्वरप्रणीत होनेसे ही प्रमाण है, अन्य कारणसे नहीं---
ऐसा हेतुगत नियम, तथा वेद प्रमाण ही है, अप्रमाण नहीं--ऐसा
विधेयगत नियम होकर त्रिविध नियम सिद्ध होते हैं ।
यदि पूछो कि - पूर्वके दो नियम भले ही हों, किन्तु अयोगव्यवच्छे-
दार्थक एवकारका प्रयोग कर, वेद प्रमाण ही है—यह अन्तिम नियम
कैसे है ?--तो इसका यही उत्तर है कि महाजनद्वारा परिगृहीत होना
अथवा महाजनपरिग्रहसे सिद्ध सर्वज्ञपूर्वक ( सर्वज्ञप्रणीत ) होना या
पुरुषगत दोषसे रहित होना ही वेदकी प्रामाणिकताका कारण है, जो

व्यार्थभागयोः साधारणत्वात् । किं तस्य फलमिति चेत् ?
स्वार्थप्रतिपादनम् । किं तेन प्रयोजनम् ? यथायथमुपादानं
हानं मोक्षश्च । तत्रानर्थहेतूनां तत्त्वज्ञानाद्धानमर्थहेतूनामुपादा-
नमात्मनो मोक्ष इति ।
कः पुनरयं मोक्षः ? आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्तिरात्मनः ।
किमात्यन्तिकत्वम् ? तज्जातीयात्यन्ताभावविशिष्टत्वम् । तेषां-
वेदके भूतार्थभाग और भव्यार्थभाग दोनों में समानरूपसे है । अतः
भव्यार्थभागके समान ही अर्थवादादिरूप भूतार्थभाग भी प्रमाण ही है ।
यदि पूछो कि—भव्यार्थभागका तो प्रवृत्ति या निवृत्ति फल है, किन्तु
भूतार्थभाग (अर्थवादादि भाग) का क्या फल है?—तो यही उत्तर
है कि स्वार्थका प्रतिपादन करना भूतार्थभागका साक्षात् फल है । पुनः
पूछो कि—स्वार्थप्रतिपादनका प्रयोजन क्या है ?—तो यही कि यथा-
योग्य कहीं उपादान (ग्रहण) करना, कहीं परित्याग करना और कहीं
मोक्षप्राप्ति । उनमें जो अनर्थके हेतु हैं, उनके तत्त्वज्ञानसे उनका
परित्याग करना होगा । जो इष्टके साधन हैं, उनके तत्त्वज्ञानसे उनका
ग्रहण होगा तथा आत्माके तत्त्वज्ञानसे मोक्ष होगा । अर्थात् अर्थवाद-
भागके भी परम्परया प्रवृत्ति, निवृत्ति और मोक्ष ही यथायोग्य फल हैं ।
जैसे, "वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता" "तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजेत"
इत्यादिका वायुयागादिमें प्रवृत्ति प्रयोजन है । "अन्धन्तमः प्रविशन्ति
ये के चात्महनो जनाः" इत्यादिका आत्महत्यासे निवृत्ति फल है । तथा
उपनिषद्भागका मोक्ष फल है ।
मोक्षका स्वरूप
प्रश्न—यह मोक्ष क्या वस्तु है ?
उत्तर—आत्मामें दुःखोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति ही मोक्ष है ।
प्रश्न—आत्यन्तिक किसे कहते हैं ?
उत्तर—दुःखमात्रका अत्यन्ताभाव होना दुःखकी आत्यन्तिकी
निवृत्ति है ।
प्रश्न—दुःखोंका अत्यन्ताभाव कैसे होता है ?

अनुपलम्भवादः ४५७
मभावः कथम् ? कारणमात्रोच्छेदात् । अपुरुषार्थोऽयमिति
चेत् , न, असत्यस्याकाम्यस्याशक्यस्य दुरन्तस्य तथाभावात् ।
न त्वयं तथा । सत्योऽयम् , प्रमाणसिद्धत्वात् सर्वैरभ्युपगमात् ।
काम्यश्च, दुःखस्य स्वभावहेयत्वात् । सुखार्थं तद्धानमिति चेत्,
न, अतद्धेतुत्वात् ।
व्याप्तेरिति चेत् , न असिद्धेः । न हि दुःखाभावः सुखेन
व्याप्यत इति । सुखं तावत्तेन व्याप्यत इति चेत् , तर्हि सुखे
सत्यवश्यं दुःखाभावो भवेदिति सुखप्रार्थनेति विपरीतापत्तिः ।
नावेद्यत्वादसौ काम्य इति चेत् , न, दुःखार्तानां तद-
उत्तर—दुःखके जितने भी कारण हैं, उनका उच्छेद हो जानेसे
दुःखोका अत्यन्ताभाव हो जाता है और वही मोक्ष है ।
यदि कहो कि—दुःखकी निवृत्ति तो पुरुषार्थ नहीं है—तो ऐसा
नहीं कह सकते । क्योंकि जो असत्य है, अकाम्य है, असाध्य है या
जिसका अन्त ( परिणाम ) दोषमय है, वही अपुरुषार्थ होता है । यह
तो वैसा है नहीं । बल्कि यह प्रमाणसिद्ध होनेसे सत्य है । सभीके
द्वारा अभीष्ट होनेसे काम्य भी है । क्योंकि दुःख स्वभावसे ही सबके
लिये त्याज्य है । यदि कहो कि—दुःख स्वरूपतः त्याज्य नहीं है किन्तु
सुखके लिये उसका त्याग होता है । अर्थात् मुख्यरूपसे सुख ही काम्य
है, दुःखाभाव तो उसका साधन है, इसलिये वह गौणरूपसे काम्य है—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि दुःखका त्याग सुखके प्रति हेतु
नहीं है ।
यदि कहो कि—दुःखाभाव और सुखमे परस्पर व्याप्ति होनेसे हेतु
है—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि उनकी परस्पर व्याप्ति ही असिद्ध
है । कारण, दुःखाभाव सुखसे व्याप्त नहीं है । क्योंकि सुषुप्त-अवस्था
में दुःखाभाव रहनेपर भी सुख नहीं रहता है । यदि कहो—दुःखाभाव
सुखसे व्याप्त भले ही न हो किन्तु सुख तो दुःखाभावसे व्याप्त है,
क्योंकि सुख होनेपर दुःखाभाव अवश्य रहता है—तब तो सुख होनेपर
अवश्य ही दुःखाभाव हो जायगा, इसी अभिप्रायसे सुखकी प्रार्थना होगी ।

४५८ आत्मतत्त्वविवेके
भाववेदनमनभिसन्धायैव तज्जिहासादर्शनात् । कथमन्थथा
देहमपि जह्युः । अविवेकिनस्त इति चेत्, किमत्र विवेकेन ?
इष्यमाणतामात्रानुबन्धित्वात् पुरुषार्थत्वस्य, गम्यागम्ययोः
कामवत्¹ । बहुतरानर्थप्रसक्तिशङ्कया शास्त्रमनुकूलयन्तस्त
इतरेभ्यो भिद्यन्ते ?
अपि चैवं कण्टकादिजन्यदुःखनिवृत्तिरपि पुरुषार्थो न
स्यात्, अवेद्यत्वात् । प्रथमं विद्यते तावदसाविति चेत्,
ऐसी स्थितिमे सुख गौण काम्य हो गया और दुःखाभाव ही मुख्यरूपसे
अभीष्ट (काम्य) सिद्ध हो गया । इस प्रकार "सुखके लिये दुःखका
अभाव होता है" इस तुम्हारे पूर्ववचनके विपरीत ही सिद्ध हो गया ।
यदि कहो, दुःखाभावका अनुभव नहीं होता है, इसलिये वह काम्य
नहीं होता—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि दुःखसे पीड़ित व्यक्ति
दुःखाभाव प्रतीतिकी बिना ख्याल किये ही दुःखसे छुटकारा पानेकी
इच्छा करता है, ऐसा देखा जाता है । यदि उसे दुःखाभावकी अनुभू-
तिकी भी कामना रहती तो विषादिका भक्षण कर क्यों देहको भी छोड़
देना चाहता है ? जब कि अनुभूतिके लिये देह अपेक्षित है । यदि
कहो—वे अविवेकी हैं—तो इसमें विवेकका क्या प्रयोजन है ? इष्य-
माणतामात्रसे ही पुरुषार्थका सम्बन्ध है । अर्थात् जो अभीष्ट है, वही
पुरुषार्थ है । जैसे कामनामक पुरुषार्थ गम्या या अगम्याके विवेककी
अपेक्षा नहीं करता । अर्थात् गम्याकी कामना भी काम है और अगम्या
की कामना भी । हाँ विवेकियोंमें अविवेकियोंसे इतना अन्तर है कि
विवेकी लोग अत्यधिक अनर्थोंकी प्रसक्तिकी आशङ्कासे शास्त्रानुकूल ही
आचरण करते हैं। अर्थात् दुःखसे छुटकारा पानेकी इच्छासे
विषभक्षणादिद्वारा आत्महत्या या कामशान्तिके लिये अगम्यागमन
नहीं करते हैं ।
एवं अनुभूयमानताकी दशामें ही यदि दुःखाभाव पुरुषार्थ माना
जाय तो कण्टकादिसे होनेवाले दुःखकी निवृत्ति भी पुरुषार्थ नहीं होगा ।
क्योंकि उस दुःखनिवृत्तिका सदा अनुभव नहीं होता रहता है ।
१ काममह्ववत् इति २ पु० पा०

तुल्यं मोक्षेऽपि । नाध्यक्षेणेति चेत्, तर्हि दुरितक्षयकामस्य
कर्मानुष्ठानानर्थक्यप्रसङ्गः, तदभावतत्फलाभावयोरप्यनध्यक्ष-
त्वात् । उपलब्धियोग्यतापन्नानिष्टनिवृत्तिरूपत्वादयमदोष-
इति चेत्, तुल्यम् ।
दुःखवत् सुखस्याप्युच्छेदादकाम्योऽयमिति चेत्, न,
तृष्णया दोषतिरस्कारेण प्रवृत्तिवदलंप्रत्ययेन गुणतिरस्कारान्नि-
यदि कहो कि—कण्टक निकल जानेपर प्रथम कालमे दुःखनिवृत्तिका
अनुभव होता है, इसलिये उसके पुरुषार्थ होनेमे कोई बाधा नहीं है।
अर्थात् कदाचित् अनुभूयमान होना ही पुरुषार्थका लक्षण है—तो यह
बात आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्तिरूप मोक्षमे भी तुल्य है। अर्थात् शब्द,
अनुमान आदि द्वारा मोक्षकालिक दुःखनिवृत्ति भी अनुभूयमान ही है।
यदि कहो कि—उस दुःखनिवृत्तिका शाब्दबोध या अनुमिति होनेपर भी
साक्षात्कार नहीं होता है, अत वह पुरुषार्थ नहीं हो सकता है—तब तो
पापनाशकी इच्छासे प्रायश्चित्तादि कर्मोंका अनुष्ठान ही अनर्थक हो
जायगा। क्योंकि पापाभाव और पापके फलस्वरूप दुःखके अभावका
भी साक्षात्कार नहीं होता।
यदि कहो कि—प्रायश्चित्त-जन्य दुःखनिवृत्तिके प्रत्यक्षसे उपलब्ध-
मान न होनेपर भी उपलब्धिकी योग्यतासे युक्त दुःखनिवृत्तिरूप होनेसे
यहाँ कोई दोष नहीं है। अर्थात् पुरुषार्थ होनेके लिये उपलब्धि अपे-
क्षित नहीं है, किन्तु उपलब्धिकी योग्यता अपेक्षित है। तथा वह
योग्यता प्रायश्चित्त-जन्य दुःखप्रागभावमे भी है, क्योंकि उसका प्रतियोगी-
भूत दुःख उपलब्धिके योग्य है—तो ऐसी उपलब्धि-योग्यता आत्यन्तिक
दुःखनिवृत्तिरूप मोक्षमें भी तुल्य है।
यदि कहो—दुःखके समान सुखका भी इस पक्षमे उच्छेद हो जाने
से दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष किसीका काम्य नहीं हो सकता—तो ऐसा नहीं
कह सकते। क्योंकि जैसे, अत्युत्कट रागवश अगम्यागमनादिमे दोष
की उपेक्षा कर उसमे अविवेकीकी प्रवृत्ति होती है, वैसे ही सुख-
साधनों में विवेकियोंको अलबुद्धि (अनपेक्षाबुद्धि) होनेसे उनके गुणोंकी
उपेक्षा कर सुख साधनोंसे निवृत्ति भी देखी जाती है। इसमें मधु

४६० आत्मतत्त्वविवेके

वृत्तेरपि दर्शनात् । मधुविषसंपृक्तमन्नमत्रोदाहरणम् । सन्ति
च केचनालंप्रत्ययवन्तः । न च समत्वम्, दुःखस्यैव प्राचुर्यात्,
दुःखे सुखहेत्वननुषङ्गेऽपि सुखे दुःखहेत्वनुषङ्गनियमात् ।
तथाहि न्यायोपार्जितेष्वेव विषयेषु कियती सुखखद्यो-
तिका कियन्ति चार्जनरक्षणादिभिर्दुःखदुर्दिनानि । अन्यायो-
पार्जितेषु यद् भविष्यति तन्मनसापि चिन्तयितुमशक्यम् ।
विदाङ्कुर्वन्तु च सन्तो यदि कण्टकादिजन्येषु दुःखेषु लेशतोऽपि
-सुखानुषङ्गः । अस्ति च स्वर्गादिसुखेष्वपि बहुलो दुःख-
एवं विषसे संपृक्त अन्न उदाहरण है । अर्थात् मधुका लोभी व्यक्ति
-विषसे होने वाले अनिष्टकी उपेक्षा कर उस अन्नको खा लेता है, तथा
मधुका जो लोभी नहीं है, ऐसा व्यक्ति मधुकी मधुरतागुणकी उपेक्षा कर
विषमिश्रित अन्नका परित्याग कर देता है । दुःखरूपी दुर्दिनसे डरे हुए
बहुतसे व्यक्ति हैं, जो उस सुखके प्रति भी विरक्त हैं । तात्पर्य यह है
कि सुखका भी उच्छेद हो जायगा, इस कारण दुःखनिवृत्तिरूप पुरुषार्थमें
अकाम्यत्वका प्रसङ्ग नहीं आयगा ।
साथ ही दुःख और सुखमें कोई समता भी नहीं है । क्योंकि
संसारमे दुःख ही अधिकमात्रामें है । अतः अधिक दुःखोंकी निवृत्ति-
रूप लाभकी मात्रा विशेष है तथा उसके समक्ष स्वल्प सुखका उच्छेदरूप
हानिकी मात्रा बहुत थोड़ी है, इसलिये दुःख-निवृत्ति अवश्य काम्य
होगी । क्योंकि दुःखमे सुखहेतुकी अनुवृत्ति नहीं भी रहती है, किन्तु
प्रत्येक सुखमें दुःखका हेतु अवश्य ही अनुवर्तमान रहता है । जैसे कि
न्यायपूर्वक उपार्जित विषयोंमें ही कितनी सुखरूपी जुगनू भासित होती
है ? और अर्जन एवं रक्षा आदिको लेकर कितने दुःखरूपी दुर्दिनोंका
सामना करना पड़ता है ? अर्थात् न्यायोपार्जित विषयोंमें भी सुखसे
अधिक दुःख ही भोगना पड़ता है । किन्तु जो विषय अन्यायसे उपार्जित
होंगे, उनमें जो भोगना पड़ेगा, उसकी तो मनसे भी कल्पना नहीं की जा
सकती है । सज्जन ही अनुभव करें, यदि कण्टकादिसे होनेवाले दुःखोंमें
-लेशमात्र भी सुखका संसर्ग हो । और स्वर्गादि सुखोंमें भी बहुल-

अनुपलब्धवादः ४६१
शल्यसम्मेदः । अत एव विविच्य भुज्यतां तुषतण्डुलवदित्य-
शक्यमिति ।
शक्यश्चायं, निवर्त्यत्वात् । स्वन्तश्च, अपरावृत्तेरनर्थवा-
सनानुकूलाभिसन्धित्वाच्चेति ।
नित्यं तु सुखं न सत्यम्, योग्यानुपलम्भबाधितत्वात् ।
मात्रामे दुःखरूपी काटोंका ही सम्मिश्रण है । इसीलिये भूसी और
चावलके न्यायसे दुःखरूपी काँटाको बिलगा बिलगा कर सुखका भोग
किया जाय, यह भी असम्भव है ।
एव, दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष साध्य भी है, अर्थात् असाध्य नहीं है ।
क्योंकि उपायद्वारा उसे किया जा सकता है । अर्थात् दुःखात्यन्ताभाव-
रूप मुक्तिके पक्षमे यद्यपि अत्यन्ताभावके नित्य होनेसे वह उत्पाद्य नहीं
हो सकता है, तथापि सम्पूर्ण दुःखसाधनोंका ध्वंस उत्पाद्य है, अत उसके
साथ दुःखात्यन्ताभावका सम्बन्ध भी उत्पाद्य होनेसे वह भी साध्य कोटि
मे आ जाता है । यदि विशिष्ट दुःखका ध्वंसरूप मुक्ति हो तो वह स्वतः
ही साध्य है । यदि दुःखका प्रागभाव ही मुक्ति हो तो वह भी दुःख-
कारणोंके विघटनके द्वारा साध्य ही है ।
साथ ही यह दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष परिणाममे भी अच्छा है ।
अर्थात् तक्षकसर्पके शिरका मणि लेनेके समान दुष्परिणामवाला भी
नहीं है । क्योंकि निवृत्त हुआ दुःख फिर नहीं पैदा होता है ।
तथा किसी अन्य अनर्थकामनाकी प्रयोजिका भी वह दुःखकी आत्य-
न्तिक निवृत्तिकी कामना नहीं है । अर्थात् जैसे, सुखाभिलाषी
व्यक्ति सुखका भोग होनेपर बारबार सुख और उसके साधनकी कामना
करता रहता है । तथा सुखका उचित साधन नहीं मिलनेपर अनुचित
साधनकी भी कामना करता है । जैसे, कामी व्यक्ति अपनी स्त्रीके
नहीं मिलनेपर परस्त्रीकी कामना करने लगता है, किन्तु वह कामना
परिणाममे महान् अनर्थका हेतु है । इस प्रकार सुखकी कामना उत्तरो-
त्तर अनर्थकामनाको ही उद्बुद्ध करनेवाली होती है । किन्तु यह दुःख-
निवृत्तिरूप मोक्षकी कामना वैसी नहीं है ।
नित्य सुख तो कोई सत्य वस्तु है ही नहीं । इसलिये नित्य सुख

४६२ आत्मतत्त्वविवेके
श्रुतिस्तत्र मानमिति चेत्, न, योग्यानुपलब्धिबाधिते तदनव-
काशात् अवकाशे १ वा ग्रावप्लवनश्रुतेरपि तथाभावप्रसङ्गात् ।
नापि काम्यं, सदातनत्वात् । न हि यद् यस्यास्ति स
तत्कामयते । भ्रान्तेरेवम्, कण्ठस्थचामीकरवदिति चेत्, न
स्वसंवेद्ये तदभावात् ।
मोक्ष है—यह पक्ष नहीं हो सकता । क्योंकि सुख और दुःख नियमतः
प्रत्यक्षयोग्य ही होते हैं । अतः यदि नित्य सुख होता तो उसका प्रत्यक्ष
होता । इसलिये प्रत्यक्षयोग्यता होनेपर भी उसकी उपलब्धि नहीं होनेसे
नित्य सुखका होना बाधित है । यदि कहा जाय कि—नित्य सुखकी
सत्तामें श्रुति प्रमाण है—तो यह नहीं हो सकता । क्योंकि जो योग्य
होता हुआ भी अनुपलब्धिके कारण बाधित है, उसका बोधक श्रुति भी
नहीं हो सकती है। यदि हो तो ग्रावप्लवन (पत्थरका तैरना) की
प्रतिपादिका श्रुति भी वस्तुगत्या ग्रावप्लवनकी प्रतिपादिका हो जायगी ।
अर्थात् 'नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म, आनन्दं ब्रह्मणो रूपं तच्च मोक्षे
प्रतिष्ठितम्' इत्यादि श्रुतियाँ मोक्षावस्थामें नित्य सुखको नहीं बताती हैं,
किन्तु दुःखात्यन्ताभावपरक हैं ।
एवं, नित्य सुख काम्य भी नहीं हो सकता है । क्योंकि नित्य होने
से वह सदा है ही, फिर कामना क्यों ? ऐसा नहीं होता कि जो वस्तु
जिसके पास है, उसकी वह कामना करता हो । यदि कहें कि—नित्य
सुखके विद्यमान होनेपर भी उसके अविद्यमान होनेकी भ्रान्तिसे उसकी
कामना होती है । जैसे कण्ठमें ही स्थित स्वर्णाभरणको नहीं देखनेसे
भ्रमवशात् उसकी कामना होती है—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि
स्वकण्ठस्थित स्वर्णाभरण दूसरेके द्वारा संवेद्य होनेके कारण भ्रमवशात्
भले ही काम्य हो, किन्तु सुख तो सदा स्वसंवेद्य है, अर्थात् रहनेपर स्वयं
ही विदित होता रहता है । इसलिये स्वयंप्रकाश सुखमें भ्रम हो ही
नहीं सकता । अतः नित्य सुखरूप मोक्ष सदा प्राप्त और सदा प्रत्यक्ष
होनेके कारण काम्य नहीं हो सकता है ।
१. संभव वा इति क्वचित् पाठ

अनुपलब्धवादः ४६३
नापि शक्यम्, न हि तन्निर्वर्त्यं नित्यत्वात् । नापि
विकार्यम्, अपरिणामित्वात् । नापि संस्कार्यम्, अनाधेया-
तिशयत्वात् । न प्राप्यम्, नित्यसम्बन्धवत्त्वात् ।
न ज्ञेयम्, ज्ञानस्यापि नित्यत्वात् । अनित्यत्वे वा
शरीरादिकारणापाये तदनुत्पत्तेः । उत्पत्तौ वा तेषामकारण-
त्वप्रसङ्गात् । तथा च सर्वः सर्वदर्शी स्यात्, आत्ममनः-
संयोगादेः सर्वत्राविशेषात् ।
एव, नित्यसुखरूप मोक्ष शक्य ( साध्य ) भी नहीं है । क्योंकि
शक्यका क्या अर्थ है ? उत्पाद्य या विकार्य या सस्कार्य या प्राप्य अथवा
ज्ञेय । यदि शक्यका अर्थ उत्पाद्य लें तो वह उत्पाद्य नहीं हो सकता,
क्योंकि नित्य है । नित्य सुख विकार्य भी नहीं हो सकता, क्योंकि यह
अपरिणामी है । सस्कार्य ( सस्कारद्वारा कुछ अतिशय लानेयोग्य )
भी वह नहीं है, जैसा कि “व्रीहीन् प्रोक्षति” यहाँ प्रोक्षणद्वारा व्रीहिका
सस्कार होता है—क्योंकि नित्य सुख अनाधेयातिशयरूप है । अत
उसमें सस्कारद्वारा किसी प्रकारके अतिशयका आधान नहीं किया जा
सकता है ! नित्यसुखको प्राप्य भी नहीं कह सकते, जैसा कि नित्य भी
वेद अध्ययनद्वारा प्राप्त किया जाता है—क्योंकि नित्य होनेसे सदा
प्राप्त ही है ।
ऐसे ही नित्य सुखवादी वेदान्तियोंके यहाँ ज्ञान भी नित्य ही होता
है । अत ज्ञान और सुख दोनोंके नित्य होनेसे उपासनादि विधियोंसे
नित्य सुखको ज्ञेय कहना भी ठीक नहीं है ।
यदि कहो कि—ज्ञान अनित्य है—तो मुक्तिदशामे शरीरादि ज्ञान
साधनोंके अभावमे नित्यसुखका ज्ञान ही नहीं उत्पन्न हो सकता है ।
यदि उस कालमें शरीरादि कारणोंके अभावमे भी सुखज्ञानकी उत्पत्ति
मानो तो ज्ञानोत्पत्ति के प्रति शरीरादि अहेतु हो जायगा । अर्थात् बिना
शरीरेन्द्रियादिके भी ज्ञान पैदा होने लगेगा । ऐसी स्थितिमें सब सर्वज्ञ
हो जायेंगे । क्योकि ज्ञानका कारण जो आत्मा और मनका सयोग है,
वह सबमे समानरूपसे है ।

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४६४ आत्मतत्त्वविवेके

ज्ञानज्ञेययोर्नित्यत्वेऽपि तत्सम्बन्धो जन्यते, स च षट्-
पदार्थव्यतिरेकादुत्पन्नोऽपि न निवर्तते ध्वंसवदिति चेत्, न,
भावाभावयोः प्रकारान्तराभावात् ।
तत्र स नाभावः, प्रतियोग्यनुपपत्तेः। भावत्वे त्ववश्यमुत्पन्नो
निवर्त्तेत, उपाध्यन्तराभावात् । अविद्याविध्वंसनमेव तत्प्राप्ति-
रिति चेत्, अत्र न नो विवादः । न ह्येकविंशतिप्रभेदभिन्न-
दुःखव्यतिरिक्ता अविद्या नाम । तद्विध्वंसनञ्च पुरुषार्थ
इति प्रतिपादनादिति ।
दुरन्तं च तत्, तदभिसन्धेः सुखसंस्कारसहकारितया
तदुद्भवे विशिष्टसुखाभिलाषिणो वैषयिकेऽपि प्रवृत्तिसंभवात् ।

यदि कहो कि—ज्ञान और सुखरूप ज्ञेय इन दोनोंके नित्य होनेपर
भी उनका सम्बन्ध उत्पन्न होता है। अतः वह उपासनादि विधियोंके
द्वारा साध्य है। तथा वह सम्बन्ध उत्पत्तिशाली होनेपर भी द्रव्यादि
षट् पदार्थोंसे भिन्न होनेके कारण विनष्ट नहीं होता है। जैसे, ध्वंस
उत्पत्तिमान् होनेपर भी विनष्ट नहीं होता—तो ऐसा नहीं हो सकता है।
क्योंकि भाव और अभावके अतिरिक्त पदार्थोंका कोई दूसरा प्रकार ही
नहीं होता है। उसमें वह सम्बन्ध अभावरूप नहीं है। कारण, निष्प्र-
प्रतियोगिक अभाव होता ही नहीं है। यदि वह सम्बन्ध भावरूप हो तो
उत्पन्न होनेके कारण वह अवश्य विनष्ट हो जायगा। क्योंकि उत्पन्न
वस्तुके विनाशो होनेमे भावत्व ही उपाधि है, अन्य नहीं। यदि कहो
कि—अविद्याका ध्वंस होना ही नित्यज्ञान और नित्यसुखका सम्बन्ध
है—तो इसमें हमारा कोई विरोध नहीं है। क्योंकि इक्कीस प्रकारोंमें
विभक्त दुःखके अलावे कोई अविद्या नहीं है तथा इन दुःखोंका विध्वंस
ही पुरुषार्थ (मोक्ष) है, यह न्यायमे प्रतिपादित किया गया है।
अर्थात् न्यायसम्मत दुःखध्वंस ही अन्ततोगत्वा मोक्षका स्वरूप सिद्ध
होता है।
एव, नित्यसुखरूप मोक्ष दुरन्त अर्थात् परिणाममें दोषपूर्ण भी है।
क्योंकि सुखकी कामनासे पूर्वमें प्राप्त सुखोंके संस्कारोंकी सहायता पाकर

अनुपलम्भवादः ४६५
“अलाभे मत्तकाशिन्या दृष्टा तिर्यक्षु कामिता” इत्युदा-
हरणादिति ।
स्यादेतत्, आत्मा तु किं स्वप्रकाशसुखस्वभावोऽन्यथा
वेति पृच्छामः । श्राद्धोऽसि चेदुपनिषदः पृच्छ । मध्यस्थोऽसि
चेत्, अनुभवं पृच्छ ।
नैयायिकोऽसि चेत्, न वैषयिकसुखज्ञानस्वभाव इति
सुखसंस्कारके उद्बुद्ध होनेपर पूर्वकी अपेक्षा उत्कृष्ट सुखकी अभिलाषा
करनेवाले व्यक्तिको उस उत्कृष्ट सुखके नहीं मिलनेपर निम्नकोटिके
वैषयिक सुखमें ही प्रवृत्ति होने लगेगी, जो कि मोक्षका विरोधी है ।
क्योंकि “मत्तकाशिनी (सुन्दरी स्त्री) की अप्राप्तिमें तिर्यग्योनियों
के प्रति भी कामवासना देखी जाती है” ऐसा उदाहरण है । अर्थात्
मोक्षको सुखरूप माननेमें उत्तरोत्तर बन्धन ही बढ़ता जायगा तथा
मुक्ति असंभव हो जायगी ।
आत्माका स्वरूप
“अस्तु, आत्मा क्या स्वप्रकाश-सुखस्वभाव है ? यह हम पूछते हैं ।
आशय यह है कि आत्मा यदि स्वप्रकाश-सुखस्वभाववाला हो तो
उसमें दुःखकी संभावना ही कहाँ है कि आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्ति मोक्ष-
का स्वरूप हो” । इसका उत्तर यह है कि यदि श्रद्धालु रूपमें पूछते हो
तो उपनिषदोंको पूछो । अर्थात् उपनिषदोंमें आत्माका प्रतिपादन ज्ञान
और सुखसे भिन्नरूपमें ही किया गया है । जहाँ कहीं सुखज्ञान-
स्वभावत्वका प्रतिपादन है, उसका दूसरा तात्पर्य बताया जा चुका है ।
यदि मध्यस्थके रूपमें अर्थात् न्याय और आगमका अपक्षपाती होकर
पूछते हो तो अपने अनुभवको पूछो । अर्थात् “अहं सुखी, अहं जाने”
इत्यादि अनुभवसे आत्मा सुख और ज्ञानसे युक्त प्रतीत होता है न कि
सुख और ज्ञानरूप । यदि वैसा होता तो “अहं ज्ञानम् अहं सुखम्”
ऐसा अनुभव होता ।
यदि नैयायिकके रूपमें अर्थात् आत्माका स्वरूप न्यायद्वारा जानने-
की रुचिसे पूछते हो तो यही निर्णय करो कि आत्मा वैषयिक-सुख और
३०

४६६ आत्मतत्त्वविवेके
निश्चिनुयाः । तदतिरिक्ते तु सुखज्ञानव्यवहारे बीजाभावात्
तद्व्यवहाराभावः । अनुग्रहाभिष्वङ्गेन्द्रियप्रसादादिलक्षणं
हि कार्यं तद्व्यवहारबीजम्, अर्थप्रवणत्वं स्मृतिसंस्कारादिकार्यं
ज्ञानव्यवहारादिबीजं लोके, तयोश्चाभाव आत्मनीति ।
तस्मात्—
श्रुतेः श्रुत्वाऽत्मानं तदनु समनुक्रान्तवपुषो
विनिश्चित्य न्यायादथ विहतहेयव्यतिकरम् ।
ज्ञानस्वरूप नहीं है । एव वैषयिक सुख और ज्ञानसे अतिरिक्त आत्मा-
में तो सुख और ज्ञानके व्यवहारमे, जैसा कि वेदान्ती मानते हैं, कोई
बीज नहीं है । इसलिये वेदान्तादि सम्मत किसी भिन्न प्रकारके सुख
और ज्ञानका व्यवहार आत्मामे नहीं हो सकता है । क्योंकि अनुग्रह,
अभिष्वङ्ग ( संश्लेष ) तथा इन्द्रियोंकी प्रफुल्लता आदि कार्य ही सुख-
व्यवहारका बीज है । अर्थात् जिससे अनुग्रह आदि कार्य उत्पन्न होते
हैं, वही सुख है । वेदान्तादिसम्मत सुखसे तो अनुग्रहादिकार्य होता ही
नहीं है, इसलिये उसे सुख नहीं कह सकते । एव अर्थप्रवणता (विषय-
की ओर प्रवृत्ति ), स्मृति तथा सस्कार आदि कार्य ज्ञानव्यवहारका बीज
है । अर्थात् जो अर्थाभिमुखी प्रवृत्ति तथा स्मृति सस्कार आदिका
जनक है, वही ज्ञान है । आपका अभिमत ज्ञान ज्ञान नहीं है । एव
मुक्तावस्थामें आत्मामे उन दोनों ( सुख और ज्ञान ) का अभाव है ।
अर्थात् आगम, अनुभव और न्यायके बलसे यही सिद्ध होता है कि
आत्मा स्वप्रकाश सुख ज्ञानस्वरूप नहीं है । क्योंकि वैषयिक सुख और
ज्ञानके अतिरिक्त अन्य प्रकारका सुख और ज्ञान न्यायविरुद्ध होनेसे
है ही नहीं । और मुक्तावस्थ आत्मामे वैषयिक सुख और ज्ञानका
सर्वथा अभाव है । अत दुःखका आत्यन्तिक नाश ही मुक्ति है—यह
सिद्धान्त है । इसलिये—
अयि मानवो ! यदि चाहते ससार बन्धन भञ्जना,
तो वेदसे होगा प्रथम “आत्मा कीदृश है” जानना ।
वेदानुगामी न्यायसे फिर साधु निश्चित कर उसे,
संसर्ग दसविध-हेयका, विध्वस्त हो, फिर नहि फँसे ।

अनुपलब्धवादः ४६७
उपासीत श्रद्धाशमदमविरामैकविभवो
भवोच्छित्त्यै चित्तप्रणिधिविहितैर्योगविधिभिः ॥
उपास्यमाने च तस्मिन् प्रथमं बहिरर्था एव भासन्ते,
यानाश्रित्य कर्ममीमांसोपसंहारः चार्वाकसमुत्थानञ्च । तत्प्रति-
तच शमन दम-वैराग्य श्रद्धामात्र धन ले, चित्तकी
स्थिति हेतु यौगिक रीतियोंसे कर उपासा आत्मकी।
अर्थात् श्रुतिद्वारा आत्मतत्त्वका श्रवण कर वेदाविरुद्ध युक्तियोंसे "आत्मा
शरीरेन्द्रियादिसे भिन्न, ज्ञानसुखादि गुणवाला तथा नित्य एव विभु है"
ऐसा सम्यक् निश्चयात्मक मनन करे। तदनन्तर जिसमें शरीर इन्द्रिय-
विषय बुद्धि मन प्रवृत्ति-दोष-प्रेत्यभाव-फल और दुःखरूप दस प्रकारके
हेयोंका तादात्म्यादि सम्बन्ध विध्वस्त हो चुका है, ऐसे आत्मामें श्रद्धा-
शम दम तथा वैराग्यसे युक्त होकर आसन प्राणायाम आदि पातञ्जल-
शास्त्रोक्त योगविधियोंसे चित्तको स्थिर करते हुए संसार (आवागमन)
के आत्यन्तिक नाशरूप मोक्षके लिये उसकी उपासना (निदिध्यासन)
करे।
उस आत्माकी उपासना किये जानेकी दशामें प्रथम प्रथम बाह्य
पदार्थ ही भासित होते हैं, जिनका आश्रयण कर जैमिनि प्रणीत कर्म-
मीमांसादर्शनका उपसंहार हो जाता है। अर्थात् उद्देश्यपूर्ण हो जानेसे
उसका विराम हो जाता है। आशय यह है कि जब तक भोगकी
कामना वर्तमान है, तब तक ग्राम, पशु तथा हिरण्य आदि पदार्थ ही
मानवोंको अभिलषित होते हैं और उत्कट वासनावश वे ही पहले
भासित होते हैं, आत्मा नहीं भासित होता है। इसलिये उन अभि-
लाषाओंकी सिद्धिके लिये "ग्रामकामो यजेत, चित्रया यजेत पशुकाम,
पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार यागादि कर्मोंके
प्रतिपादनके उद्देश्यसे जैमिनिने कर्ममीमांसाका प्रणयन किया। तथा
अपना उक्त उद्देश्य पूर्ण कर कर्ममीमांसा कृतकृत्य हो गयी। यद्यपि
मुमुक्षुओंके लिये अन्य श्रुतियोंमें उक्त पदार्थ हेय कहे गये हैं, फिर भी
पुरुषेच्छाके अनुरोधसे उन श्रुतियोंका कर्ममीमांसादर्शनमें विचार नहीं
किया गया। एसा नहीं है कि ब्रह्मकाण्डके प्रति जैमिनि महर्षि

४६८ आत्मतत्त्वविवेके
पादनार्थश्च "पराञ्चि खानि" इत्यादि । "तद्धानाय रंप
कर्मभ्य" इत्यादि ।
अथार्थाकारः, यमाश्रित्य त्रैदण्डिकमतोपसंहारो योगा-
चारसमुत्थानञ्च । तत्प्रतिपादनार्थम् "आत्मैवेदं सर्वम्"
इत्यादि । तद्धानार्थम् 'अगन्धरसम्, इत्यादि ।
उदासीन थे । यहाँ उपसंहारशब्दसे कर्मकाण्डके विषयमे कर्ममीमांसाका
प्रामाण्य सूचित होता है ।
यहीं से चार्वाकमतका उत्थान भी होता है । अर्थात् वाह्यपदार्थोंको
ही लेकर बृहस्पतिने भी चार्वाकदर्शनका निर्माण किया और प्रत्यक्षाति-
रिक्त वस्तुको अप्रमाण कह दिया । बृहस्पतिके वैसा प्रतिपादन करनेमे
"पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्"
इत्यादि श्रुति मूल है । यहाँ उत्थानशब्दसे चार्वाकमतका उत्थान ही
भर होता है, उसका उपसंहार नहीं हुआ है । अत इसके प्रतिपादक
आचार्य बृहस्पतिका भी इसमे अन्तिम तात्पर्य नहीं था । इसलिये
चार्वाकशास्त्र अप्रमाण होनेसे शास्त्राभास है—यह बात सूचित होती
है । इसीलिये इस मतके निषेधके लिये "कर्मणा मृत्युमृषयो निषेदु
प्रजावन्तो द्रविणमीहमाना । अथापरे ऋषयो मनीषिण परं कर्मभ्योऽ
मृतत्वमानशु " इत्यादि श्रुतियाँ हैं ।
इसके बाद ध्यानक्रमसे अर्थाकार आत्मा भासित होता है और योगा-
चारमतका समुत्थान होता है । इसके प्रतिपादनमे "आत्मैवेद सर्वम्"
इत्यादिश्रुति मूल है । अर्थात् संज्ञा रूपादि पञ्चस्कन्धात्मक यह विश्व
आत्मा ही है । यहाँ आत्माशब्दसे 'विज्ञान' अर्थ लेकर विज्ञानवादी
योगाचार व्यामोहमे पड़ गया । तथा भास्करमतानुयायी त्रिदण्डियोंके
मतका—सब पदार्थ आत्माका ही आकार है, अतः आत्मा ही वस्तुत
ध्येय है—ऐसा मानते हुए उपसंहार हुआ है । योगाचारमतके निषेधके
लिये "अगन्धरसम्" इत्यादिश्रुति वाक्य है । अर्थात् आत्मा या
विज्ञान गन्धरसादि विषयोंसे भिन्न वस्तु है । त्रिदण्डिमतका तो मुख्य
अभिप्राय आत्माको वास्तविक ध्येय बतलानेमे है, न कि उसे अर्थाकार
बतलानेमें ।

अथार्थाभावः, यमाश्रित्य वेदान्तद्वारमात्रोपसंहारः शून्य-
नैरात्म्यसमुत्थानं च। तत्प्रतिपादनार्थम् "असदेवेदमग्र
आसीत्" इत्यादि। तद्घानाथम् ‘अन्धं तमः प्रविशन्ति
ये के चात्महनो जनाः" इत्यादि।
ततो विवेको यमाश्रित्य साङ्ख्यमतोपसंहारः शक्तिसत्त्व-
समुत्थानञ्च। तत्प्रतिपादनार्थम् "प्रकृतेः परस्तात्" इत्यादि।
इसके बाद अर्थका भी अभाव भासित होता है, जिसका आश्रयण
कर वेदान्तके द्वारमात्रका ही उपसहार हुआ। अर्थात् अर्थाभाव सिद्ध
होनेपर ही उसके द्वारा अद्वैतकी सिद्धि होगी, इसलिये वह वेदान्तका
द्वार हुआ। एव अर्थाभावका आश्रयण कर ही शून्यवाद या नैरात्म्य-
वादका समुत्थान हुआ। अर्थात् जगत्प्रपञ्चके मिथ्यात्वज्ञानसे ही
आत्माको भी प्रपञ्चान्तर्गत होनेसे मिथ्या मानते हुए शून्यवादीयोंने शून्य
नैरात्म्यवादका सिद्धान्त बना लिया। इन दोनोंका मूल "असदेवेदमग्र
आसीत्" इत्यादि श्रुतिवाक्य है। किन्तु उक्त श्रुतिवाक्यका गलत
अभिप्राय लगानेवाले नैरात्म्यवादियोंके निषेधके लिये "अन्धं तमः प्रवि-
शन्ति ये के चात्महनो जनाः" इत्यादि श्रुतिवाक्य है। यहाँ "आत्म-
हनः" का अर्थ है "आत्माको अस्वीकार करने वाले"। यहाँ भी
बृहस्पतिका अभिप्राय पाखण्डियोंका प्रतारणमात्र है, न कि उन्हें वस्तुत
नैरात्म्यवाद अभिप्रेत है।
इसके बाद ध्यानक्रमसे बाह्य अर्थसे (अनात्मासे) आत्माका विवेक
भासित होता है। अर्थात् सर्वथा आत्मातिरिक्त वस्तुके अभावकी
अवस्था अभी तक नहीं आनेसे बाह्यवस्तुका बिना विरोध किये उससे
आत्माका विवेक (भेद) भासित होता है। जिसका आश्रयण कर सांख्य
मतका उपसहार हुआ। अर्थात् प्रकृति पुरुषके विवेकके अभिप्रायसे
ही कपिलमुनिने सांख्यसूत्रोंका प्रणयन किया। एवं उक्त विवेकका आश्र-
यण कर ही शक्ति (प्रकृति) और सत्त्व (महान् या बुद्धि) का समुत्थान
हुआ। अर्थात् सांख्यमतानुयायियोंने आत्माकी निर्लेपता सिद्ध करनेके
लिये सुखादिके आश्रयके रूपमें महत् या बुद्धितत्त्वको तथा जगत्के मूल
कारणके रूपमें प्रकृतिको स्वीकार किया। इनका मूल "सभी वस्तुओंको

४७० आत्मतत्त्वविवेके
तद्धानाय "नान्यत् सत्" इत्यादि ।
ततः केवल आत्मा प्रकाशते, यमाश्रित्याद्वैतमतोपसंहारः ।
तत्प्रतिपादनार्थम् 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह"
इति । तद्धानार्थम् "नाद्वैतं नापि द्वैतम्" इत्यादि । ततः
समस्तसंस्काराभिभवात् केवलोऽपि न विकल्प्यते, यमाश्रित्य
चरमवेदान्तोपसंहारः । तत्प्रतिपादनार्थम् "न पश्यतीत्याहु-
उत्पन्न करनेवाली प्रकृति है तथा पुरुष उस प्रकृतिसे परे निर्लेप एव
कूटस्थ नित्य है' इस अर्थका प्रतिपादन करनेवाली 'वेदाहमेतं पुरुषं
महान्तमादित्यवर्णं तमस परस्तात्' इत्यादि श्रुति है। यहाँ 'तमस'
का अर्थ है 'प्रकृतिसे' । उक्त मतके निषेधके लिये "नान्यत् सत्"
इत्यादि श्रुति वाक्य है । अर्थात् प्रकृति पुरुषविवेकावस्था भी हेय ही
है । क्योंकि 'प्रकृति से भिन्न पुरुष है" इस भेदज्ञानमे प्रतियोगि-
रूपमें प्रकृति आदि भी भासित होती है, जब कि "नान्यत् सत्" इत्यादि
श्रुतिके अनुसार आत्माकी उपासनावस्थामें किसी अन्यकी सत्ताका भान
अभिप्रेत नहीं है ।
उसके बाद प्रकृति विविक्तत्वरूप विशेषणका भी परित्याग कर केवल
आत्मा ही स्वरूपत भासित होता है । जिसका आश्रयण कर "एकमेवा
द्वितीयम् ब्रह्म" इस अद्वैतमतका उपसहार होता है । इस केवल
आत्माके प्रतिपादनका मूल "न पश्यतीत्याहु एकी भवति, न जिघ्रती-
त्याहु एकीभवति' इत्यादि श्रुतिवाक्य है । इस अवस्थाके भी त्यागके
लिए "नाद्वैतं भवति नापि द्वैतम्' इत्यादि श्रुतिवचन है । क्योंकि
इसमे भी आत्माको अद्रष्टा आदि कहा है, जो न्यायविरुद्ध है । तथा
इसमे भी उपासनाकालमें द्वैताद्वैतका विचार वर्तमान रहता है, जब कि
"नाद्वैतं नापि द्वैतम्" इत्यादि श्रुतिको द्वैताद्वैत विचारसे रहित मनसे
केवल आत्माका साक्षात्कार अभिप्रेत है ।
इसके बाद ध्यान प्रकर्षकी चरम सीमा पर पहुँचे हुए शुद्धान
योगीको सम्पूर्ण संस्कारोंका अभिभव हो जानेके कारण अर्थात् वासना
सहित मिथ्याज्ञानका उन्मूलन हो जानेसे केवल आत्माका भी सविकल्पक
भान नहीं होता है । अर्थात् सभी विशेषणोंसे रहित केवल आत्माका

अनुपलम्भवादः ४७१

रेकी भवति” इत्यादि । सा चावस्था न हेया, मोक्षनगर-
गोपुरायमाणत्वात् ।
निर्वाणं तु तस्याः स्वयमेव, यमाश्रित्य न्यायदर्शनो-
पसंहारः ।
तत्प्रतिपादनार्थम् 'अथ यो निष्काम आत्मकामः स
ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति, न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, तत्रैव
निर्विकल्पकमात्र ही भान होता है। जिसका आश्रयण कर चरम
वेदान्तका उपसहार होता है। क्योंकि उसमें “स्वप्रकाश चिद्रूप आत्मा ही
मुक्ति है” ऐसा प्रतिपादन किया गया है। उस अवस्थाके प्रतिपादनके
लिए “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” यह श्रुति वाक्य है।
अर्थात् वाणीकी प्रवृत्ति तभी तक है, जब तक ध्यानपरिपाक काष्ठापर
नहीं पहुंचा रहता है तथा सधर्मक वस्तुमे ही मनकी भी प्रवृत्ति होनेसे
निर्धर्मक आत्माका बोध करानेमे मन भी असमर्थ हो जाता है। यह
अवस्था पूर्व अवस्थाओंकी तरह हेय नहीं है। क्योंकि वह अवस्था
मोक्षरूप नगरमे प्रवेश पानेके लिए द्वारभूत है। अर्थात् वह मोक्षके
अत्यन्त निकटकी अवस्था है।
उस निर्विकल्पक भानकी भी अवस्थासे छुटकारा तो अपने आप ही
हो जाता है। जैसे इन्धनको नष्ट कर अग्नि भी अपने आप ही नष्ट
हो जाती है। अर्थात् आत्मगत सम्पूर्ण वैशेषिक-गुणोंका उच्छेद ही
मोक्ष है। इसलिए मुक्तिदशामे निर्विकल्पक भान भी नहीं रहता तथा
उसके नाशके लिए किसी अन्य विरोधी गुणकी अपेक्षा नहीं होती है।
बल्कि अदृष्टनाशविशिष्ट कालसे ही उस निर्विकल्पक भानका नाश हो
जाता है। इसी अवस्थाका आश्रयण कर न्यायदर्शनका उपसंहार
होता है। अर्थात् मुक्तिकी इसी अवस्थामें न्यायदर्शनका तात्पर्य है।
उसके प्रतिपादनके लिये “अथ यो निष्काम आत्मकाम आप्तकाम,
स ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति, न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, तत्रैव समवलीयन्ते”
इत्यादि वेदवाक्य मूलभूत हैं। यहाँ निष्कामका अर्थ है “विषयोंके
प्रति उपेक्षाभाव रखनेवाला”। आत्मकामशब्दका अर्थ है “आत्म-

समवलीयन्ते" इत्यादीनि ।
तस्मादभ्यासकामोऽप्यपदद्वाराणि विहाय द्वारैरेव प्रवि-
शेत्, यतो मार्गविमार्गसंमोहमाशङ्कमानैरुच्यते "लक्ष्येण
धनुषा योग" इति ।
बहुतरपरतन्त्र प्रान्तरध्वान्तभीत-
स्तिमितपथिकरक्षासार्थवाहेन यत्नात् ।
तदिदमुदयनेन न्यायलोकागमानां
व्यतिहतिमवधूय व्यञ्जितं वर्त्म मुक्तेः ॥ १ ।

विषयक मनन एव साक्षात्कारमें संलग्न"। आप्तकाम वह है, जिसने
आत्मविषयक साक्षात्कार प्राप्त कर लिया है। ऐसा व्यक्ति "ब्रह्म व
सन्' अर्थात् ब्रह्मके समान निरञ्जन होकर 'ब्रह्म व समभ्येति" अर्थात्
केवलात्मा बन जाता है या कैवल्य प्राप्त कर जाता है। उसके प्राण
उत्क्रमण नहीं करते किन्तु उस आत्मामें ही लीन हो जाते हैं। अर्थात्
वह व्यक्ति जीवन मरणसे रहित हो जाता है।

इसलिये मोक्षनगरमे प्रवेश पानेके लिए अभ्यासकी कामना
करनेवाला व्यक्ति भी चार्वाकादि मतरूप अपद्वारोंका परित्यागकर कर्म-
मीमांसाप्रभृति द्वारोंसे ही प्रवेश करे। क्योंकि मार्ग और विमार्गके
सम्बन्धमे लोगोंको भ्रम हो जानेकी आशङ्का करते हुए आचार्योंने उससे
बचनेके लिए कहा है कि लक्ष्यके साथ धनुषका (धनुर्बाणका) संयोग
कदाचित् ही होता है। यदि होता भी है तो तभी, जब कि लक्ष्य तक
पहुंचा सकनेवाला धनुषका मार्ग ठीक हो ॥

परशास्त्र अनेक घन मार्गगत अज्ञानरूप-
अतिघोर तमसे भीत निष्क्रिय पांथजनके प्राणके-
रक्षार्थ, उदयन मार्गदर्शकने, हटा व्याघातको-
श्रुति-न्याय आलोकसे सुझाया मुक्तिके शुभ पथको ॥१॥