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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

७ ... ४३३
तथाहि, नास्त्येव तद्दर्शनं यत्र सांवृतमित्युक्त्वापि गर्भा-
धानाद्यन्त्येष्टिपर्यन्तां वैदिकीं क्रियां जनो नानुतिष्ठति, स्पृश्या-
स्पृश्यादिविभागं वा नानुमनुते, व्यतिक्रमे चाऽऽचमनादि-
प्रायश्चित्तं वा नानुतिष्ठति ।
न सर्वत्र सर्वो जन एवमिति चेत्, मा भूत । न हि सर्वै
रोगिभिरायुर्वेदार्थो नानुष्ठीयत इति न तस्य महाजनपरिग्रहः,
अपि तु सर्वदर्शनान्तःपातिभिरित्येव ।
आयुर्वेदशास्त्रने भी वेदोक्त विषयोंका विधान किया है । जैसे, “शत-
कृत्वो गायत्रीमभ्यस्य नीरुग् भवति” ऐसा आयुर्वेदशास्त्रमे लिखा है ।
तथा वह गायत्री वेदका ही अंश है न कि बौद्ध आगमोंका ! यह
परिग्रहका तीसरा अर्थ है ।
उक्त तीनों प्रकारके परिग्रहोंमें महाजनोंद्वारा वेदार्थानुष्ठानरूप
प्रथम परिग्रह इस प्रकार है—जैसे, ऐसा कोई भी दर्शन नहीं है,
जिसको माननेवाला व्यक्ति वैदिक क्रियाका अनुष्ठान न करता हो ।
यहाँ तक कि ब्रह्मातिरिक्त सब विषयको अविद्याकल्पित कहनेवाले
वेदान्ती जन भी गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टि तक वैदिक क्रियाओंको नहीं
करते हैं, ऐसी बात नहीं है । या कोई भी दार्शनिक जन वेदोक्त
स्पृश्यास्पृश्यविभागको न स्वीकार करता हो अथवा अस्पृश्यस्पर्शरूप
व्यतिक्रम हो जानेपर आचमन-स्नान आदि प्रायश्चित्त न करता हो,
यह बात नहीं है ।
यदि कहो कि—सभी दर्शनोंके सभी व्यक्ति तो वैदिक क्रियाओंका
अनुष्ठान नहीं करते हैं—तो वैसा भले ही मत हो । क्योंकि सभी रोगी
दवाका सेवन नहीं करते इससे वह शास्त्र महाजनपरिगृहीत नहीं है,
ऐसा नहीं हो जाता । किन्तु महाजनपरिगृहीत इतने ही से हो जाता
है कि सभी दर्शनोंके अधिकांश लोग वेदोक्त अर्थोंका अनुष्ठान करते
हैं । “फिर भी सभी वैदिक विधानोंका अनुष्ठान तो ये लोग भी नहीं
करते” यदि ऐसा कहो तो, भले ही वैसा न हो, उससे कोई क्षति नहीं
२८

४३४ आत्मतत्त्वविवेके

तथापि न सर्वो वेदार्थ एवमिति चेत्, मा भूत् । न हि
सर्वो वैद्यकार्थ एवमपि तु कश्चित् केनापि ।
एवं तर्हि सौगताद्यागमार्थोऽपि कश्चिदहिंसादिः सर्वदर्श-
नान्तःपातिभिरनुष्ठेयत एव कैश्चिदिति सोऽपि महाजनपरि-
गृहीतः स्यात्, न, सन्देहात् । किमयमहिंसादिर्वैदिक एवार्थो
बिडालव्रतन्यायेन श्रद्धाऽऽपादनाय शौद्धोदनिप्रभृतिभिरुप-
निबद्धः ? आहो स्वयं दृष्ट एवेति ? न तावत् स्वयं दृष्टः,
क्षपणकाद्यागमसाधारणत्वात् । यस्त्वसाधारणो मण्डली-
करणादिः केशोल्लुञ्चनादिर्वा, नासौ सर्वैरनुष्ठोयते । वैदिकस्तु
असाधारण एव निषेकादिस्तथेति ।


है ! क्योंकि आयुर्वेदोक्त सभी उपचारोंका अनुष्ठान सभी महाजन
नहीं करते किन्तु कोई किसीका ही अनुष्ठान करता है । वैसे ही वैदिक
विधानोंको भी समझना चाहिये ।
यदि कहो कि--ऐसे तो बौद्ध-आगमोंके अहिंसा आदि कुछ विषय
भी सभी दर्शनोंके कुछ जनोंके द्वारा अनुष्ठित होते ही हैं, इसलिये वे
भी महाजनपरिगृहीत हों—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अहिंसा
आदिके बौद्ध आगमोक्त होनेमें सन्देह है । कारण, क्या अहिंसा आदि
वेदोक्त विषय ही बिडालव्रत-न्यायसे लोगोंमें अपने प्रति श्रद्धा उत्पन्न
करनेके लिये बुद्धदेवाद्दिके द्वारा अपने ग्रन्थमें कहा गया है ? अथवा
स्वयं प्रत्यक्ष करके ही कहा गया है ? यहाँ स्वयं प्रत्यक्ष करके बुद्धदेवने
अहिंसाका प्रतिपादन किया है, यह पक्ष नहीं हो सकता । क्योंकि
जिस क्षपणक आदिके आगमको स्वयं बुद्धदेवने भी अप्रामाणिक माना
है, उसमें भी अहिंसाका प्रतिपादन हुआ है । इससे मालूम पडता है
कि वेदोक्त अहिंसाका तत्त्व बुद्धदेवने स्वयं प्रत्यक्ष नहीं किया है । किन्तु
बेडालव्रतके समान ही क्षपणक आदिकी तरह केवल दिखानेके लिये
उसे अपनाया है । जो तो मण्डलीकरण या केशोल्लुञ्चन आदि
बौद्धादि आगमोंका अपना विशेष विषय है, उसका अनुष्ठान सभी
नहीं करते । वेदमें कहे हुए निषेक (गर्भाधान) आदि तो वेदके

अनुपलब्धवादः ४३५
अपि च वाचकापभ्रंशविभागोऽस्तु न वा, तद्व्यवहार-
स्तावत् सर्वैरेव तीर्थिकैरविगानेन स्वीकृतः । तथा शिक्षा-
ज्योतिषच्छन्दोनिगमनिरुक्ताद्यर्थश्च । तेषां च वेदरक्षैव परमं
प्रयोजनमिति ।
स्यादेतत्, व्याकरणादीनि तावत् सर्वैरभ्युपगतार्थानि, वेदा
अपने विशेष विषय हैं, जिनका सभी महाजन अनुष्ठान करते हैं।
इसप्रकार महाजनद्वारा वैदिक विधानोंका अनुष्ठान होनेसे वेदोंका
सर्वज्ञ-प्रणीत होना सिद्ध होता है ।
एवं वाचकशब्द और अपभ्रंशात्मक शब्दका विभाग भले ही
व्याकरण द्वारा न हो सकता हो, क्योकि “गां गृहाण” इत्यादिमें वाचक-
भूत गो-प्रकृति और अम्-प्रत्यय तथा ग्रह्-प्रकृति एव सिप्-प्रत्यय इनमेंसे
कोई भी नहीं है किन्तु विकार या आदेश बन गया है। लोप स्थलमें
तो मूलशब्दका पता भी नहीं रहता, फिर भी उन स्थलोंमें व्याकरणद्वारा
परिकल्पित प्रकृति-प्रत्यय और आगमादिको व्याकरणद्वारा ही सभी
जानते और “गां गृहाण” आदिका अर्थ समझते हैं। इस प्रकार
व्याकरणका व्यवहार सभी दार्शनिकोंने श्रद्धापूर्वक स्वीकार किया है।
तथा उस सर्व-स्वीकृत व्याकरणने ‘बहुल छन्दसि’ इत्यादि सूत्रोंके द्वारा
“भद्रं कर्णेभि” इत्यादि वेदोक्त पदोंका ही साधन किया है न कि
बौद्धादि-आगमोक्त पदोंका। बल्कि व्याकरणके व्याख्याता महाभाष्य-
कारादिने सौगत आगमोंका अप्रमाण ही प्रतिपादित किया है।
एवं, वेदाङ्गभूत शिक्षा, ज्योतिष, छन्द, निगम और निरुक्तादिद्वारा
कथित अर्थका भी सभी तीर्थिकोंने स्वीकृत किया है। तथा प्रकृति-
प्रत्ययके व्यवहारको बतानेवाले व्याकरण और वेदोक्त अर्थोंको स्फुट
करनेवाले शिक्षादिका भी मुख्य प्रयोजन वेदोंकी रक्षा ही है। अर्थात्
वेदार्थोंका निश्चय करना और उनका अनुष्ठान किया जाना इसी मुख्य
प्रयोजनके उद्देश्यसे पाणिन्यादि मुनियोंने व्याकरण शिक्षा आदिकी
रचना की है। यदि वेद अप्रमाण होते तो उनके अर्थोंके निर्णयार्थ एवं
अनुष्ठानार्थ उन उन शास्त्रोंकी रचना ही मुनिगण नहीं करते ।
अस्तु, व्याकरणादिके विषय सभीके द्वारा स्वीकृत हों, तथा वेदोंका

४३६ आत्मतत्त्वविवेके
अपि तैः पालनीया भवन्तु । त एवेति कुतः ? संसारमोचका-
गमोऽपि तत्पालनीयः किन्न स्यादिति चेत्, न, तत्कर्तृभिस्तथा-
नभ्युपगमात्, अव्युत्पादनात्, असाधारणलिङ्गाभावात्, विरुद्ध-
लिङ्गसद्भावाच्च । न हि वेदशब्दार्थाविव सुगताद्यागमा-
साधारणशब्दार्थाननुरुध्य तेषां प्रवृत्तिर्यत एवमुन्नीयत, प्रत्युत
विरोध एव, तैस्तदप्रामाण्यव्युत्पादनात् । तस्मात् सर्वाभ्युपेत-
व्यवहारव्याकरणादिपालनीयत्वमपि वेदानामेव नान्येषाम् ।
पालन उन व्याकरणादि शास्त्रोंका मुख्य उद्देश्य भी हो, फिर भी वेद ही
उनका पालनीय है, यह कैसे माना जाय ? ससारमोचकादि आगम भी
उनका पालनीय ( उद्देश्य ) क्यों न होगा ?—तो इस प्रकारकी शङ्का
नहीं की जा सकती । क्योंकि व्याकरणादिके रचयिता पाणिनि आदिके
द्वारा ससारमोचकागममे प्रतिपादित शब्द एव अर्थका अभ्युपगम नहीं
किया गया है। क्योंकि उनके द्वारा जैसे वैदिक पदोंका व्युत्पादन
किया गया है, वैसे बौद्धादि आगमोंके पदोंका व्युत्पादन नहीं किया गया
है। क्योंकि व्युत्पादित किये जानेका जो असाधारण लिङ्ग है, वह
उनमें नहीं है । अर्थात् वैसे पद उन आगमोंमे प्रयुक्त होते जो भाषामें
प्रयुक्त नहीं हैं, तब वे पद ही उनके असाधारण लिङ्ग होते और उनका
भी व्युत्पादन व्याकरणादिका उद्देश्य माना जाता, किन्तु वैसा है नहीं ।
बल्कि व्युत्पादनके विरोधी लिङ्ग ही ससारमोचकागमोंमें विद्यमान हैं ।
क्योंकि जैसे वेदमें असाधारण शब्द एव अर्थ हैं, वैसे सौगतादि आगमों
में असाधारण शब्द एव अर्थ नहीं हैं, जिनके अनुरोधसे मुनियोंकी
प्रवृत्ति होती और उनके द्वारा व्युत्पादन किये जानेकी कल्पना की
जाती । बल्कि अनुरोधकी जगह विरोध ही पाया जाता है । क्योंकि
मुनियोंने उन आगमोंके अप्रामाण्यका ही व्युत्पादन किया है । इस
प्रकार सिद्ध होता है कि सर्व स्वीकृत है व्यवहार जिसका, ऐसे व्याकर-
णादिके द्वारा वेदका ही पालन लक्ष्य है न कि सौगतादि आगमोंका ।
यह द्वितीय प्रकारका महाजनपरिगृहीतत्व है ।

अनुपलम्भवादः ४३७
सर्वाभ्युपेतप्रामाण्यैरायुर्वेदादिभिः स्वीकृतश्चैषामर्थः, प्रतिपदं
तदीयशान्तिकपौष्टिकप्रायश्चित्ततपोजपदानहोमाद्युपदेशात् ।
न चैष भागस्तत्राप्रमाणमेव, तुल्ययोगक्षेमत्वात् । एतदेवा-
सिद्धम्, प्रक्षेपस्यापि सम्भवादिति चेत्, न, अध्येतृऽध्यापयितृ-
संप्रदायाविच्छेदात् ।
“अन्यथाकरणे चास्य बहुभ्यः स्यान्निवारणम्”
इति न्यायात् ।
तस्मादेवंरूपोऽपि महाजनपरिग्रहो वेदानामिति । सोऽयमी-
दृशो महाजनपरिग्रहोऽसर्वज्ञपूर्वकत्वेऽसंभवन् सर्वज्ञपूर्वकत्वेन
व्याप्यते ।
एवं, सभीने जिसका प्रामाण्य माना है, ऐसे आयुर्वेदादिके द्वारा
भी वैदिक विषय स्वीकृत किया गया है। क्योंकि पद-पदपर वेदोक्त
शान्तिक, पौष्टिक, प्रायश्चित्त तप, जप, दान और होम आदिका उपदेश
पाया जाता है। यह नहीं हो सकता कि—आयुर्वेदका यह शान्तिक
पौष्टिकादि भाग अप्रमाण ही है—क्योंकि आयुर्वेदके सम्पूर्ण भागों
का समान योगक्षेम है। अर्थात् आयुर्वेदका जैसे औषधवाला भाग
प्रमाण है, वैसे ही शान्तिकादि भाग भी प्रमाण होगा, क्योंकि वह
भी उसीका भाग है। अन्यथा औषधवाला भाग भी प्रमाण नहीं हो
सकेगा।
यदि कहो कि—आयुर्वेदमे शान्तिकादि भाग प्रक्षिप्त हो सकते हैं,
अतः तुल्य योगक्षेमत्व ही असिद्ध है—तो यह नहीं हो सकता है।
क्योंकि उसके पढ़ने और पढ़ानेवालेका सम्प्रदाय कभी टूटा नहीं है,
इसलिये प्रक्षेपकी संभावना ही नहीं है। क्योंकि “अन्यथाकरणे चास्य
बहुभ्यः स्यान्निवारणम्” इस कुमारिलभट्टोक्त न्यायके अनुसार सर्वत्र
प्रक्षेपकी आशङ्का होने लगेगी। और तुम्हारे आगममें भी तुम्हें प्रक्षेप
मानना पड़ जायगा। इसलिये इस तृतीय प्रकारका महाजनपरिग्रह
भी वेदोंमें है। अतः पूर्वोक्त दोनों ही प्रकारके महाजनपरिग्रह वेदोंके

४३८ आत्मतत्त्वविवेके

यथा हि पूर्वविरुद्धपूर्वव्याकरणादिवैद्यकादिषु विगानाद-
परिग्रहः, तथा तथाविधे धर्मशास्त्रेऽपि । व्यामोहाद् भवन्नपि
कस्यचिदेव न तु सर्वेषाम् । अथ पूर्वाविरुद्धं चेत्, तथापि
पूर्वस्य पूर्ववदपरिग्रहे केनचित् परिग्रहे वा कथं तन्मूलस्यान्यस्य
सर्वैः परिग्रहः ?
न च नासीदेव पूर्वं धर्मशास्त्रम्, मानान्तरस्यात्र वस्तुनि

असर्वज्ञ प्रणीत होनेपर असम्भव हैं, इसलिये वेदोंमे सर्वज्ञपूर्वकत्वका
निश्चय होता है।
इसमे तर्क यह है कि जैसे पूर्ववर्ती व्याकरणादिसे विरुद्ध नवीन
व्याकरणादि एव वैद्यक आदिके निन्दित होनेके कारण वे महाजनद्वारा
परिगृहीत नहीं होते, वैसे पूर्वसे विरुद्ध नवीन धर्मशास्त्र भी निन्दित
होनेसे महाजनपरिगृहीत नही होता है। अर्थात् विवादका विषय
वेदरूप धर्मशास्त्र यदि सर्वज्ञपूर्वक (ईश्वरप्रणीत) नहीं होता तो वह
उक्त तीनों ही प्रकारके महाजनपरिग्रहका विषय नहीं होता। जैसे
कि आधुनिक व्याकरण वैद्यक आदि सर्वज्ञपूर्वक नहीं होनेके कारण
महाजनपरिग्रहका विषय भी नहीं होता है।
यदि उस पूर्वविरुद्ध संसारमोचकादि धर्मशास्त्रके प्रति अज्ञानतावश
परिग्रह होता भी है तो किसीको ही होता है न कि सबको। अर्थात्
वेद सभी महाजनोंद्वारा परिगृहीत है, इसलिये वेदका परिग्रह अज्ञान-
पूर्वक नहीं हो सकता है। यदि संसारमोचकादिकोंका या सुगतोंका
धर्मशास्त्र (आगम) पूर्ववर्ती धर्मशास्त्रसे अविरुद्ध हो तो भी उसका वह
पूर्ववर्ती धर्मशास्त्र स्वयं यदि महाजन परिगृहीत न हो या किसी एकके ही
द्वारा परिगृहीत हो तो तन्मूलक सुगतादिका धर्मशास्त्र सबके द्वारा परि-
गृहीत कैसे हो सकेगा ? अर्थात् सौगतोंको भी उस पूर्ववर्ती धर्मशास्त्रको
अवश्य ही महाजनपरिगृहीत मानना होगा। इस प्रकार वह पूर्ववर्ती
धर्मशास्त्र हमारा वेद ही है, जो महाजनपरिगृहीत होनेके कारण सर्वज्ञ
पूर्वक (सर्वज्ञप्रणीत) सिद्ध हो जाता है।
यह नहीं कह सकते कि—वेदरूप कोई पूर्ववर्ती धर्मशास्त्र था ही

कुण्ठतयाऽनुष्ठानाभावप्रसङ्गात् । तथा च धर्माभावे तत्कार्यस्य
सुखस्याप्यभावे रागानुत्पत्तौ लोकसमीहोच्छेदे लोकोच्छेद-
प्रसङ्गः ।
तस्मान्महाजनपरिगृहीतपूर्वपूर्वागमपूर्वकत्वात्, प्रवाहनित्य-
त्वाद् वा, प्रलयविच्छेदे सर्गादौ सर्वानुविधेयपुरुषधौरेयपूर्वकत्वाद्
वा महाजनपरिग्रहो न तु पूर्वागममानपेक्ष्यार्वाचीनपुरूषपशुपूर्वकत्वात्
पूर्वागमप्रामाण्याप्रामाण्ययोरुभयथाऽपि तस्य विप्रलम्भकत्वात् ।
प्रामाण्ये हि तद्विरुद्धाभिधानं विप्रलम्भ एव । अप्रामाण्येऽप्यु-
नहीं—क्योंकि यदि पूर्ववर्ती वेद न होता तो धर्मके विषयमे अर्थात् याग
दानादिकी इष्टसाधनतामे अन्य प्रमाण कुण्ठित हैं, इसलिये धर्मानुष्ठानका
अभाव हो जायगा । ऐसी स्थितिमें धर्मका अभाव होनेपर उससे उत्पन्न
होनेवाले सुखका भी अभाव हो जायगा और सुखके अभावमें उसकी
अनुभूति नहीं होनेके कारण पुन सुखप्राप्तिके प्रति राग नहीं उत्पन्न
होगा तथा रागके अभावमे प्रवृत्ति नहीं होनेसे जगत् निश्चेष्ट हो जायगा
और चेष्टाहीन हो जानेसे पुत्रादिकी उत्पत्ति भी नहीं हो सकेगी । इस
प्रकार जगत्का ही उच्छेद हो जायगा ।
अतः महाजनपरिगृहीत जो पूर्व पूर्व आगम, तत्पूर्वक होनेके कारण
या तत्तद् आगमोंके अनित्य होनेपर भी आगमधाराके नित्य होनेके
कारण अथवा प्रलयके द्वारा आगमधाराका विच्छेद हो जानेपर भी सृष्टि
के आदिमें किसी पुरुषविशेषसे निर्मित होनेके कारण ही कोई आगम
महाजनपरिगृहीत माना जाता है, न कि पूर्व आगमोंकी बिना अपेक्षा
किये आधुनिक-जनद्वारा प्रणीत होनेके कारण कोई भी आगम महाजन
परिगृहीत कहा जाता है । इनमे प्रथम पक्षके अनुसार पूर्व आगम जो
वेद, उसका प्रामाण्य मानकर या अप्रामाण्य मानकर, दोनों ही दशाओंमें
संसारमोचकागमोंका प्रणेता आधुनिक पुरुष विप्रलम्भक ( ठगनेवाला )
ही सिद्ध होता है । क्योंकि पूर्ववर्ती आगम वेदको यदि प्रमाण मानता
है तो उसके विरुद्ध कहना ठगना ही है । यदि उस पूर्ववर्ती आगम
वेदको अप्रमाण मानता है तो, "यागादिक स्वर्गादि सिद्धिका उपाय है" इस

८० आत्मतत्त्वविवेके

पायमविदुषोऽननुष्ठाने तदा ( भाव ) भासानुष्ठाने वाऽसर्वज्ञस्योप-
देशो विप्रलम्भ एवेति ।
तत्र न प्रथमः, वेदपरम्पराऽनुपलम्भात्, अर्वाचीनानां पाठ-
पारतन्त्र्यमात्रेण प्रवाहोपपत्तौ तत्कल्पनायां प्रमाणाभावात् ।
नापि द्वितीयः, वेदह्रासदर्शनात् । यत इदानीमश्रूयमाणस्यापि
बातको नहीं जाननेवाले उस असर्वज्ञ व्यक्तिद्वारा यागादिके अननुष्ठान
का उपदेश देना अथवा मण्डलीकरण केशोल्लुञ्चन प्रभृति सुखके उपाया-
भासोंके अनुष्ठानका उपदेश देना संसारको ठगना ही है । क्योंकि अर्थ-
निर्णय किये बिना ही स्वकपोलकल्पित ऐसा उपदेश दिया गया है ।
अर्थात् उक्तप्रकारका वञ्चनात्मक उपदेश महाजनपरिग्रहका विषय नहीं
हो सकता है ।
महाजनपरिग्रहके प्रति सम्भावित पूर्वोक्त तीन हेतुओंमें प्रथम हेतु
नहीं हो सकता है । क्योंकि पूर्वपूर्वागमपूर्वकत्व-हेतुमें “पूर्वपूर्वागम”
पदसे विजातीय वेदपरम्परा विवक्षित हो तो वैसी वेदपरम्परा प्रत्यक्ष-
प्रमाणसे सिद्ध नहीं है । यदि अनुमानद्वारा वर्तमान वेदके मूलके
रूपमें विजातीय वेदपरम्पराकी कल्पना करो तो यह संभव नहीं है ।
क्योंकि जैसे अर्वाचीन ( वर्तमान ) वेदोंका प्रवाह गुरु-शिष्यके केवल
क्रमिक पाठके द्वारा सजातीय प्रवाह ही चल रहा है, न कि शिष्यद्वारा
पढे जानेवाले वेदका मूल गुरुद्वारा पढा जानेवाला कोई विजातीय वेद
होता है । वैसे ही परम्परागत पाठके द्वारा सजातीय वेद परम्पराको
वर्तमान वेदके मूलके रूपमें कल्पना करना अप्रामाणिक है ।
प्रबाहनित्यत्वरूप द्वितीय पक्ष भी नहीं हो सकता है । अर्थात्
“प्रवाहरूपसे वेद नित्य है, इसलिये यह महाजनपरिगृहीत है” यह
पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि वेदका ह्रास देखे जानेसे वेदप्रवाह नित्य
नहीं हो सकता । कारण, जो वेदभाग इस समय उपलब्ध नहीं है,
उसके विषयका भी अनुष्ठान देखा जाता है तथा मनु आदि स्मृतिकारोंने
उस विषयको भी अपनी स्मृतियोंमें निबद्ध किया है । अर्थात् होलाका
( होली ) करनी चाहिये—इसका सूचक वेदभाग यद्यपि अनुपलब्ध है,
फिर भी उसका अनुष्ठान सर्वजन-प्रसिद्ध है । तथा अष्टकनामक याग

अनुपलम्भवादः ४४१
वेदस्यार्थोऽनुष्ठीयते निवध्यते च मन्वादिभिः ।
पुरुषाणामपचीयमानशक्तिकत्वाच्च । यथा ह्यश्वमेधराजसूया-
द्यनुष्ठानशक्तेरपचयस्तथाऽध्ययनशक्तेरपि । न च पूर्वमपि नानु-
ष्ठिता एव राजसूयादयः, तदर्थस्य वेदराशेर्वैयर्थ्यप्रसङ्गात् ।
न च नित्यानुमेयवेदसंभवः, वर्णानां नित्यत्वेऽप्यानुपूर्व्याः
पाठाश्रयत्वात् । न चानुपूर्वीशून्यवर्णाः पदं नाम, न चाका-
वर्तमान वेदमें नहीं मिलता है, फिर भी मनु आदि ऋषियोंने अपनी
स्मृतिमें उसका उल्लेख किया है । इससे सिद्ध होता है कि वेदका वह
भाग उच्छिन्न हो चुका है ।
एव पुरुषोंकी अध्ययनशक्ति क्रमशः क्षीण होती देखी जा रही है,
इससे भी सिद्ध होता है कि वेदका ह्रास संभव है । अर्थात् एक व्यक्ति
वेदकी समस्त शाखाओंका अध्ययन करनेमें असमर्थ है, अतः एकके
समान दूसरेके द्वारा भी किसी शाखाका अध्ययन संभव है । इससे
वैदिक शाखाके उच्छेदकी संभावना सिद्ध होती है । क्योंकि जैसे
बहुद्रव्य-साध्य अश्वमेध-राजसूय आदि यज्ञोंकी अनुष्ठानशक्तिका ह्रास
हो गया है ; यह नहीं कह सकते कि—पूर्वकालमें भी राजसूय आदि-
का अनुष्ठान नहीं ही हुआ था—क्योंकि तब उस विषयका प्रतिपादक
वेदसमुदाय व्यर्थ हो जायगा ।
यह नहीं हो सकता कि—होलाकादि-विषयक वेद कभी भी पाठमें
नहीं आये किन्तु पूर्वकालीन स्मृति और आचारके द्वारा उक्त वेदभाग
का अनुमान करके ही तदनुसार मन्वादि-स्मृति या शिष्टाचार बने हैं ।
अर्थात् मन्वादिस्मृति या आचारका आधार सीधे वेद नहीं हैं किन्तु
तद्विषयक वेदके अनुमापक पूर्वकालीन अन्य स्मृति या आचार ही हैं ।
अतः वेद, नित्यानुमेय हैं तथा शाखा-उच्छेदमे कोई प्रमाण नहीं है—
क्योंकि वर्ण भले ही नित्य हों, किन्तु वर्णोंकी आनुपूर्वी ( गकारोत्तर-
अकारोत्तर-णकारोत्तर-अत्त्वादि ) तो पुरुषाधीन पाठ ( उच्चारण ) के
आश्रित होनेसे अनित्य ही है । क्योंकि आनुपूर्वी रहित वर्ण पद नहीं
कहाता । एवं आकाङ्क्षा-योग्यता-और आसत्तिसे युक्त पदसमूहके अलावे

दृष्टायुपेतपदकदम्बादन्यद् वाक्यं नामेति गुरुरपि लघुरेव ।
तस्मात् पुरुषाणामनुष्ठानशक्तिवत् अध्ययनशक्तिरपि युग-
क्रमेणापचीयते, ततो वेदानां शाखोच्छेदः, तदर्थानामन्ष्ठानो-
च्छेदः, वर्णाश्रमाचारव्यवस्थाविप्लवश्चेति ।
अतएव भगवतो व्यासस्य पुरुषशक्त्यपचयमपेक्ष्य वचनानि
“अल्पायुषो ऽल्पसत्त्वा” इत्यादीनि । वेदोच्छेदसवेक्ष्य “प्रति-
मन्वन्तरं चैषा श्रुतिरन्या विधीयते” इत्यादीनि । अनुष्ठानो-
त्सादमवेक्ष्य “दानमेकं कलौ युगे” इत्यादीनि । आचारविप्लव-
मवेक्ष्य “प्रजास्तत्र भविष्यन्ति शिरनोदरपरायणाः” इत्यादीनि ।
तथा च श्रूयमाणा अपि वेदा उच्छेदमुपयास्यन्ति, वेदत्वाद्
वाक्यत्वाद् वा, उच्छिन्नशाखावदिति न्यायात् । यथा चैतत् तथा
आश्रय भी नहीं होता । अतः पूर्वोक्त रीतिसे वेदको नित्यानुमेय
प्रतिपादित करनेवाले गुरु 'प्रभाकर' भी वस्तुत लघु ही हैं ।
इसलिये पुरुषोंकी अनुष्ठान-शक्तिके समान अध्ययनशक्ति भी युग-
क्रमके अनुसार क्षीण होती है और अध्ययन-शक्तिके क्षीण होनेके कारण
वेदकी शाखाओंका उच्छेद, उसके विधियोंके अनुष्ठानका उच्छेद तथा
वर्णाचार एवं आश्रमसम्बन्धी आचारोंकी व्यवस्था भी छिन्न-भिन्न हो
जाती है। इसीलिये पुरुष-शक्तिके ह्रासकी दृष्टिसे भगवान् व्यासके
"अल्पायुषोऽल्पसत्त्वाः" इत्यादि वचन हैं। वेद सम्प्रदायके ह्रासकी
दृष्टिसे "प्रतिमन्वन्तर चैषा श्रुतिरन्या विधीयते" इत्यादि वचन हैं।
अनुष्ठान ह्रासकी दृष्टिसे "दानमेकं कलौ युगे" इत्यादि वचन हैं।
तथा आचारोंके ह्रासकी दृष्टिसे "प्रजास्तत्र भविष्यन्ति शिरनोदर-
परायणाः" इत्यादि वचन हैं।
इस प्रकार जो वेद आज श्रूयमाण (प्रत्यक्ष) हैं, वे भी उच्छिन्न हो
जायेंगे, वेद होनेके कारण या वाक्य होनेके कारण, पूर्वमें उच्छिन्न
वेदकी शाखाओंके समान—यह अनुमान उच्छेदमें प्रमाण है। एवं, जैसे
भविष्यमें वेदोंका उच्छिन्न हो जाना अनुमान-प्रमा...

अनुपलम्भवादः ४४३
पर्वता अपि चूर्णीभविष्यन्ति, पार्थिवत्वात्, घटवत् । समुद्रा अपि
शोषमेष्यन्ति, जलाशयत्वात्, स्थलीपल्वलवत् । सूर्योऽपि निर्वा-
स्यति, तैजसत्वात् प्रदीपवत् । ब्रह्मापि प्रैष्यति, शरीरित्वात्,
अस्मदादिवदित्यागमाविरोधेनानुमीयताम् ।
स्यादेतत्, भविष्यन्नुच्छेदोऽनुमितः । न तु भूतोऽपीति
कुत इति चेत्, यत एव १ उच्छेदानन्तरं पुनः सर्गेण भाव्यम् ।
अन्यथा संसारिणां कृतहानप्रसङ्गात् । न हि विश्वनिर्माणमन्तरेण
भोगज्ञानयोः सम्भवः । न च तेन विना कर्मप्रवाहसंरोधः । ततो
ही-पर्वत भी चूर्ण हो जायेंगे, पार्थिव अर्थात् पृथिवीसमवेत द्रव्य होनेके
कारण, घटके समान । समुद्र भी सूख जायेंगे, जलाशय होनेके कारण,
पोखरोंके समान । सूर्य भी बुझ जायगा, तैजस अर्थात् तेजःसमवेत द्रव्य
होनेके कारण, प्रदीपके समान । तथा ब्रह्मा भी मरेंगे, शरीरधारी होनेके
कारण, हम लोगोंके समान । इस प्रकार आगमानुसार अनुमान कर लें ।
शङ्का—अस्तु, पूर्वोक्त हेतुओंसे कार्य जगत्के भावी उच्छेदका
अनुमान हुआ । किन्तु भूतकालमें भी उच्छेद था, यह कैसे सिद्ध होगा ?
अर्थात् यदप्रवाहके अनादि होनेसे ही वह महाजनपरिगृहीत क्यों न है ?
समाधान—इसलिये कि उच्छेदके बाद पुनः सृष्टि होनी चाहिये ।
अन्यथा संसारियोंके लिये कर्मोंकी हानि अर्थात् निष्फलता हो जायगी ।
तात्पर्य यह है कि वर्तमान सृष्टिमें जो कर्म प्राणियोंने किये हैं, वे
निष्फल हो जायेंगे, यदि भविष्यमें सृष्टि न हो । अतः वर्तमान सृष्टिके
बाद प्रलय होने पर पुनः सृष्टिका होना अनिवार्य है । इसी प्रकार यह
वर्तमान सृष्टि भी पूर्वप्रलयके बाद हुई है तथा उस प्रलयके पूर्वकी
सृष्टि भी उसके पूर्ववर्ती प्रलयके बाद हुई थी । इस प्रकार यह सृष्टि
और प्रलयका प्रवाह अनादि ही सिद्ध है ।
यदि प्रलयके बाद पुनः सृष्टि न हो तो कर्मोंके फलस्वरूप सुखदुःख-
साक्षात्काररूप भोग तथा तत्त्वज्ञान नहीं हो सकेंगे । इस प्रकार कृतहान-
दोषकी प्रसक्ति हो जायगी । एवं भोग और ज्ञान इन दोनोंके असम्भव
१. अत एव यत इति क्वचित् पाठः ।

४५४ आत्मतत्त्वविवेके

यथा भविष्यन् विश्रमर्गं उच्छेदपूर्वकस्तथाऽयमपीति । समय-
नियमस्तु प्राणिनां कर्मवैषम्येऽपि वर्षादिनियमवदुदयास्तनियमवद्
वा द्रष्टव्यः, कर्मणामेवैवंस्वभावत्वात् । एतदर्थमेव हि पुराणेषु
सृष्टिप्रलययोर्दिवसरात्रिव्यवहारः ।
तथापि सर्वप्राणिनाशयौगपद्ये किं प्रमाणमिति चेत्, द्वि-
सप्तभौमभुवनप्रासादभङ्गेऽपि निर्भया एव ग्रामकुटीहट्टविहारिणः १
हो जानेसे कर्मप्रवाहका निरोध भी नहीं हो सकेगा । अर्थात् मुक्ति
भी असम्भव हो जायगी । क्योंकि प्रारब्धकर्मोंका भोगद्वारा ही नाश
होगा तथा अन्य कर्मोंका तत्त्वज्ञानसे । अतः मोक्षोपयोगी भोग और
तत्त्वज्ञानके साधनके लिये प्रलयोत्तर पुन सृष्टि अनिवार्य है ।
यहाँ प्राणियोंके कर्मोंके विपाकका समय यद्यपि भिन्न भिन्न होता है,
फिर भी ब्रह्माकी आयुके सौ वर्ष काल बीतनेपर प्रलय होनेका जो नियम
है, वह तो वर्षाकाल आदिके नियमके समान अथवा सूर्योदय सूर्यास्त
काल (दिन रात) के नियमके समान है, ऐसा जानना चाहिये । अर्थात्
जैसे, वर्षा आदि ऋतुओंके जनक कर्म एक नियत अवधिके बाद ही
वर्षादिकालको उत्पन्न करते हैं, न कि कभी घण्टा प्रहर आदिके बाद
और कभी वर्ष दो वर्ष आदिके बाद । एव जैसे, दिन और रात नियमवत
होती है, वैसे ही सृष्टि और प्रलयके जनक कर्म भी ब्रह्माकी आयुके
हिसाबसे सौ सौ वर्ष बीतने पर ही सृष्टि और प्रलयको नियमवत उत्पन्न
करते रहते हैं । क्योंकि कर्मोंका ही ऐसा स्वभाव है कि सुषुप्ति अवस्था
के समान उन सबोंकी वृत्ति एक साथ निरुद्ध हो जाती है । इसीलिये
पुराणोंमें सृष्टि और प्रलयका दिन और रातके रूपमें व्यवहार किया
गया है ।
यदि कहो कि-कुछ प्राणियोंके कर्मका एकसाथ निरोध और
प्राकट्य भले ही हो किन्तु सभी प्राणियोंका एकसाथ नाश होनेमें क्या
प्रमाण है ? तो चौदह कोठों वाले भुवनरूपी महलके ध्वस्त हो जानेपर
भी गाँवकी कुटिया एवं हट्ट (झापड़ी) में विहार करनेवाले शरीरधारी
१. ग्रामटीहट्टकुटीविहारिण इति २ पु० पा० ।

अनुपलब्धवादः ४४५
शरीरिण इति महती प्रेक्षा । तस्मात् सर्गादिमहाजनमन्वादि-
परिग्रहपूर्वकोऽयमद्याप्यनुवर्तत इति नानवमरदोषावकाशोऽ-
पीति युक्तमुत्पश्यामः ।
तदेवं कथं मन्वादिभिः परिगृह्यन्तां वेदा इति चेत्, आयुर्वेद-
वदाप्तोक्तत्वनिश्चयात् । स एव कुत इति चेत्, अध्यक्षतः, तेषाम-
प्यतीन्द्रियार्थदर्शित्वात् । तादृशां तेषां तत्परिग्रहेण किं प्रयोजन-
मिति चेत्, अस्मद्व्यवहारेणास्मदपत्यादि व्युत्पद्यताम्, तथा च
धर्मसंप्रदायः प्रवर्ततामिति भूतदया स्वाधिकारसम्पादनं च ।
जीव निर्भय ही हैं—यह आपकी अच्छी सूझ है । इसलिये सृष्टिके
आदिमें वेदोंके प्रणयनकालमे ही ईश्वरके द्वारा मनु आदि मानस
महाजन भी उत्पन्न किये गये और उन्हींके द्वारा पहिले वेदोंका परिग्रह
हुआ, जो आजतक चला आ रहा है । अतः "महाजनके अभावमें
महाजनद्वारा परिग्रहका अवसर ही कहाँ है !" इस दोषका भी अवकाश
नहीं है । अत हमारा यह विचार युक्त है ।
यदि कहो कि—सृष्टिके आदिकालमे मनुपभृति महाजन भले ही हों,
फिर भी उस समय उनके द्वारा परिग्रह कैसे हुआ ?—तो इसलिये कि
जैसे आप्तोक्तत्वके निश्चयसे आजकल हम लोग आयुर्वेदका परिग्रह
करते हैं, वैसे ही उस समय मनु आदिने वेदोंमे आप्तोक्तत्वका निश्चय
होनेसे उनका परिग्रह किया । यदि कहो कि—उन्हें वेदोंमें आप्तोक्तत्व-
का निश्चय ही कैसे हुआ ?—तो यही उत्तर है कि "प्रत्यक्षसे"। क्योंकि
वे भी अतीन्द्रिय विषयोंके द्रष्टा थे । यदि पूछो कि—वेदोंके परिग्रहसे
उनका क्या प्रयोजन था ?—तो यही कि हमारे वेदार्थानुष्ठानरूप
व्यवहारसे हमारे पुत्रादि भी परिचित होकर वैसा अनुष्ठान करें और
उनकी देखादेखी अन्य लोग भी वैसा अनुष्ठान करें । इस प्रकार लोकमे
धार्मिक सम्प्रदाय चालू हो-ऐसी भूतानुकम्पा तथा अपने अधिकारका
पालन ही उनका प्रयोजन था । अर्थात् सर्गादिकालमें मन्वादिकने
लोककल्याणकी भावनासे वेदार्थानुष्ठान ( वेदपरिग्रह ) किया । तथा
इसलिये भी वैसा किया कि ईश्वरने ही वेदोंका निर्माण कर उनके परि-
ग्रहार्थ मनु आदिको अधिकारी बनाया था ।

४५६ आत्मतत्त्वविवेके

अथवा सर्गान्तरगृहीतव्याप्तिप्रादुर्भावे सुप्तप्रतिबुद्धवत् पितृत्वे-
नाविप्रलम्भकत्वमुच्चावचभूतनिर्माणदर्शनेन सार्वज्ञयमनुमायाऽऽ-
प्तत्वनिश्चयस्तस्य तेषाम् ।
यद्वा भगवान्नेव सम्प्रदायप्रवर्तनव्यसनव्यग्रः कायसहस्राणि
व्युत्पाद्यव्युत्पादकभावव्यवस्थितानि निर्माय तदातन महाजनं
परिग्राहितवान् नटोपाध्याय इव स्वयं नटित्वेति सर्वं सुस्थम् ।
पक्षत्रयेऽप्यत्र पुराणादिसंवादोऽप्यस्तीति ।
स्यादेतत्, परमेश्वरप्रवर्तितोऽयमेव वेदसंप्रदायः सर्गान्तर-
अथवा सोकर उठे हुए व्यक्तिके समान मन्वादि भी पूर्वसृष्टिमें गृहीत
व्याप्तिका स्मरण कर पितृत्वहेतुसे ईश्वरमे अविप्रलम्भकत्व (अवञ्चकत्व)
का अनुमान करते हैं। तथा अनेक प्रकारके प्राणियोंकी रचना देखकर
उसमें सर्वज्ञत्वका भी अनुमान करते हैं। क्योंकि जो जिसका पिता
होता है, वह उसके प्रति वञ्चक नहीं होता है। अतः ईश्वर भी सबका
पिता होनेके कारण वञ्चक नहीं है। एव सर्वज्ञ ही विविध रचनामे
समर्थ हो सकता है, इसलिये ईश्वर सर्वज्ञ भी है। इस प्रकार अवि
प्रलम्भकत्व और सर्वज्ञत्वका अनुमान होनेके बाद मन्वादिकों को ईश्वर
में आप्तत्वका निश्चय होता है और वे ईश्वर प्रणीत वेदोंका परिग्रह
करते हैं ।
अथवा स्वयं ईश्वर ही धर्मसम्प्रदायके सञ्चालनरूप व्यसनमे व्यस्त
होकर हजारों शरीरको व्युत्पाद्य और व्युत्पादक (शिष्य शिक्षक) के
रूपमे बनाकर (धारणकर) सर्गादिकालीन मन्वादि महाजनोंको वेदोंका
परिग्रह कराया । जैसे, कोई नाट्यविद्या का आचार्य स्वयं नाट्य कर
अन्योंको नाट्यकी शिक्षा देता है । इस प्रकार पूर्वोक्त सम्पूर्ण विषय
सुस्थिर है । इन तीनों ही पक्षोंमे पुराणादिकोंका संवाद भी है । अर्थात्
पुराणोंद्वारा भी इन तीनों पक्षोंकी पुष्टि होती है ।
यदि कहो कि-उक्त रीतियोंसे महाजनद्वारा वेदोंका परिग्रह भले ही
हो, फिर भी परमेश्वरद्वारा, सञ्चालित वर्तमान वेद सम्प्रदाय पूर्वसृष्टिगत

[Header] अनुपलब्धवादः ४४७

वेदापेक्ष एवेति सेश्वरमीमांसापक्षः कपिलपक्षो वा स्यादिति चेत्,
किमर्थं पुनरियम्पेक्षा पूर्ववेदे जगन्नाथस्य ? न तावद् वेदार्थोप-
लम्भाय, नित्यसर्वज्ञत्वात् ।
नापि रचनार्थम्, स्वभावतः सर्वकर्तृतया आदर्शानपेक्ष-
त्वात् । नापि विरोधपरिहारार्थम्, प्रतिपाद्यानां तदनुसन्धान-

वेदके अनुसार ही सञ्चालित हो तो यह एक नया ही सेश्वर मीमांसापक्ष
हो गया, जो ईश्वरको वेदका कर्ता माननेसे सेश्वर हुआ और पूर्व पूर्व
वेदोंकी अपेक्षा करनेसे मीमांसा भी हुआ । अथवा कपिलपक्ष हो गया,
जिसके अनुसार धर्म, विज्ञान, और ऐश्वर्यसे सम्पन्न कपिलमुनिने ही
सुप्त-प्रबुद्धके समान पूर्वसृष्टिगत वेदोंका स्मरणकर वर्तमान सृष्टिके प्रारम्भ
में वेदोंको प्रकाशित किया—तो बताओ कि परमेश्वरको वर्तमान वेद-
सम्प्रदायको सञ्चालित करनेके लिये पूर्ववेदकी क्यों अपेक्षा होगी ? यदि
कहो कि—वैदिक विषयोंके ज्ञानके लिये पूर्ववेदकी अपेक्षा है । अर्थात्
जिन विषयोंका प्रतिपादन वर्तमान वेदद्वारा परमेश्वरको करना है, उन
विषयोंको वह पूर्ववेदसे ही जानता है—तो यह नहीं कह सकते ।
क्योंकि नित्य-सर्वज्ञ होनेके कारण वह स्वयं सम्पूर्ण वेदार्थका ज्ञान
रखता है ।
यदि कहो कि—वर्तमान वेदकी रचनाके लिये आदर्श ( नमूना ) के
रूपमें पूर्ववेदकी अपेक्षा है—तो यह भी नहीं हो सकता । क्योंकि
स्वाभाविकरूपसे ही वह सम्पूर्ण वस्तुओंका कर्ता होनेके कारण किसी
आदर्शकी अपेक्षा नहीं करता है। यदि कहो कि—पूर्ववेदसे वर्तमान
वेदमें विरोध-परिहारके लिये पूर्ववेदकी अपेक्षा है । कारण, पूर्ववेदसे
आजके वेदमें विरोध होनेपर मन्वादिद्वारा परिग्रह होनेमें शिथिलता
आ जायगी—तो यह भी ठीक नहीं है । क्योंकि मनु आदिको पूर्ववेदका
अनुसन्धान ही नहीं होता है, जिसके विरोध-परिहारार्थ परमेश्वरको पूर्व-
वेदकी अपेक्षा हो । यदि सर्वज्ञ होनेके कारण मन्वादिको पूर्ववेदका
अनुसन्धान संभव है, इसलिये उसके साथ विरोध-निवारणार्थ पूर्ववेदके
अनुसार ही परमेश्वरको वर्तमान वेद बनाना पड़ता है—ऐसा मानो, तो
भी सर्वज्ञ होनेसे मनु आदि परमेश्वरकी सर्वज्ञताको भी जानते ही

४४८ आत्मतत्त्वविवेके
विधुरत्वात् । अवैधुर्य्ये वा कर्तुः सार्वश्यविज्ञानादेव समस्तविरोध-
विधूननात् ।
तथापि पूर्वसर्गान्तरवेदव्यवहारोऽपि परमेश्वरस्य गोचर
इति चेत् , कः सन्देहः ? यदि चैतदेव वेदस्य प्रवाहनित्यत्वम् ,
न केवलमेतस्य, किंतु घटादेरपीति न्याय एव दर्शनम् । अन्यथा
मीमांसेति क्व सेश्वरमीमांसेति । तस्मादुक्तरूपः परिग्रहो
नान्यथा संभवतीति प्रतिबन्धसिद्धिः । तथा चाप्तोक्तत्वात्
प्रामाण्यसिद्धिः ।
हैं, उससे ही मनु आदिको समस्त विरोधोंका विधूनन हो जाता है ।
अर्थात् परमेश्वरकी सर्वज्ञताके ज्ञानसे ही मनु आदिको परमेश्वरकृत वेद
में विरोध-बुद्धिका उदय नहीं होता है ।
फिर भी यदि कहो कि—वर्तमान वेदके रचयिता परमेश्वरको पूर्व-
सृष्टिगत वेद-व्यवहारका भी ज्ञान रहता ही है, क्योंकि वह सर्वज्ञ है ।
अत एव यहाँ सेश्वर मीमांसापक्ष ही आता है—तो इसमे क्या सन्देह
है ? क्योंकि यदि इसे ही (वेदनिर्माता ईश्वरको पूर्ववेदका ज्ञान रहनेको
हो) वेदकी प्रवाह नित्यता कहो तो इस प्रकारका प्रवाह-नित्यत्व न
केवल वेदका ही है किन्तु घटादि वस्तुओंका भी है । अतः यह न्याय-
दर्शन ही हुआ । किन्तु यदि इससे भिन्न प्रवाह-नित्यत्व कहो, अर्थात्
जो वेद पूर्वसृष्टिमें था वही इस समयमें भी है, यही प्रवाह-नित्यत्व
है—तो यह शुद्ध मीमांसापक्ष होगा, जिसका खण्डन किया जा
चुका है । इसलिये सेश्वमीमांसानामक अतिरिक्त पक्षका प्रसङ्ग कहाँ
आता है ?
इसलिये मन्वादिकोंद्वारा वेदोंका पूर्वोक्त परिग्रह वेदोंमें आप्तोक्तत्व-
निश्चयके बिना नहीं हो सकता । अतः महाजनपरिग्रह और आप्तोक्तत्व
मे परस्पर व्याप्तिसम्बन्धकी सिद्धि हो जाती है । अर्थात् जो जो महाजन-
परिगृहीत होता है, वह आप्तोक्त होता है । वेद भी मन्वादि महाजनद्वारा
परिगृहीत है, इसलिये वह आप्तोक्त (ईश्वरोक्त) है । तथा आप्तोक्त
होनेके कारण ही वेदोंका प्रामाण्य भी सिद्ध होता है ।

अनुपलम्भवादः ४४९
कथं पुनः सुगताद्यागमेषु नादरश्छान्दसानाम् ? वेदविद्वेषि-
दर्शनान्तःपातिपुरुषप्रणीतत्वादिति मा शङ्किष्ठाः, जिनेन्द्रजग-
दिन्द्रप्रभृतिप्रणीतेष्वप्यादरात् । तत्कस्य हेतोः ? महाजन-
परिगृहीतपूर्वागमाविरुद्धतया तदनुसारित्वात् । कुतस्तर्हि ?
सिद्धप्रामाण्यवेदविरोधात् । कथं तर्हि कतिपयैरपि तत्परिग्रहः ?
अलसभीरुमृदुःषमयजात्यनुरूपधर्मविशेषात्, उदुम्बरगर्तौयतन्तुवाय-
प्रश्न—तो फिर बुद्धादिके आगमोंके प्रति वैदिकोंके अन्दर आदरकी
भावना क्यों नहीं है ?
उत्तर—यहाँ ऐसी आशङ्का मत करो कि—वेदोंके प्रति द्वेषभाव
रखनेवाले नास्तिक-दर्शनोंकी सीमामें आये हुए पुरुषों
(बुद्धादि) के द्वारा निर्मित होनेके कारण सुगतादि प्रणीत
आगमोंके प्रति वैदिकोंमे आदरभाव नहीं है—क्योंकि
जिनेन्द्र-जगदिन्द्र प्रभृति नास्तिकोंद्वारा प्रणीत आगमोंमें भी
वैदिकोंका आदर देखा जाता है ।
प्रश्न—वैसा किस कारण से है ?
उत्तर—वैसा इसलिये है कि महाजनद्वारा परिगृहीत वेदरूप पूर्व-
वर्त्ती आगमसे अविरुद्ध होनेके कारण जिनेन्द्र-जगदिन्द्र
प्रभृतिका आगम वेदानुसारी है । अर्थात् वेदानुकूल होनेके
कारण ही उक्त आगमोंमें वैदिकोंका आदर है, न कि
नास्तिक या आस्तिक नामधारी किसी पुरुषद्वारा प्रणीत
होनेके कारण ।
प्रश्न—तो फिर क्यों बुद्धादिकोंके आगमोंमें भी वैदिकोंके अन्दर
आदरभाव नहीं है ?
उत्तर—उक्त आगमोंमें आदरभाव इसलिये नहीं है कि—जिनका
प्रामाण्य सिद्ध हो चुका है, ऐसे वेदोंसे बुद्धादिके आगम
विरुद्ध हैं ।
प्रश्न—तो फिर क्यों कुछ लोगोंके द्वारा भी बुद्धादिके आगमोंका
परिग्रह किया गया है ?

४५० आत्मतत्त्वविवेके

चेत् । न त्वेवं वेदे, कर्मण्येव निर्भरत्वात् । त्रैवर्णिकबहिष्कृतै-
रनधिकारिभिरनन्यगतिकत्वात् कीर्तिप्रज्ञाकरवत् । न त्वेवं श्रुतौ,
परैः पूज्यानामप्यत्राप्रवेशात् , इतः पतितानामपि परैरुपादानात् ।
भक्ष्यपेयाद्यद्वैतरुचिभिश्च रागात् सरभादिवत् । नत्वेवमा-
म्नाये, तद्विभागव्यवस्थापरत्वात् कुतर्काभ्यासिभिश्च मोहात्
काणादादिवत् । न त्वेवं ब्रह्मणि, आबालभावं प्रवृत्तेः ।

उत्तर—बौद्धादि-आगमोंका ग्रहण वे आलसी और भीरु ही करते
हैं, जिन्हें कष्टमय आश्रमीय भद्रकर्मोंसे द्वेष है। जैसे,
उदुम्बरगर्तनामक देशके निवासी कुविन्दों (जुलाहों) ने
आलस्यवश वैदिककर्मको छोड़कर संसारमोचकागमोंमें
बताये कर्मको गृहीत कर लिया। किन्तु वेदोंके सम्बन्धमें
ऐसी बात नहीं है कि आलसी और भीरु ही उनका ग्रहण
किये हों। क्योंकि कष्टमय कर्ममें ही वेदोंका निर्भर है।
अर्थात् कष्टमय कर्मके ही वे प्रतिपादक हैं।
अथवा त्रैवर्णिकोंसे बहिर्भूत होनेके कारण वैदिककर्मके लिये
अनधिकारी होनेसे अनन्यगत्या कुछ लोगोंने सुगतागमोंका परिग्रह
किया। जैसे, कीर्ति-प्रज्ञाकरप्रभृति बौद्धोंने किया था। ऐसी
अनन्यगति वेदोंके सम्बन्धमे नहीं है। क्योंकि जो दूसरोंके पूज्य हैं,
उनका भी वेदोंमें प्रवेश वर्जित कर दिया गया है। तथा वैदिक सम्प्रदाय
की दृष्टिसे जो पतित हो गये हैं, उन्हें भी बौद्धादि-आगमवाले ग्रहण
कर लेते हैं।
अथवा भक्ष्याभक्ष्य और पेयापेय आदि वस्तुओंके सम्बन्धमे कोई
भेदभाव नहीं चाहनेवाले व्यक्तियोंके द्वारा रागवशात् सौगतादि-आगमों
का ग्रहण किया गया है। जैसे, सरभप्रभृति बौद्धोंने किया है। किन्तु
ऐसी बात वेदोंके सम्बन्धमें नहीं है। क्योंकि भक्ष्य-पेय आदिके विभाग
की व्यवस्था वेदको अभिप्रेत है।
अथवा सत्तर्कको छोडकर जो केवल कुतर्कोंके ही अभ्यस्त हैं, उन्हों-
के द्वारा मोहवश सौगतादि-आगमोंका परिग्रह हुआ है। जैसे, काणा-

अनुपलम्भवाद | ४५१

अविवेकिभिश्च पाषण्डिसंसर्गात् शौण्डिकादिवत् । न त्वेवं
प्रकृते, पित्रादिक्रमेण प्रवर्तनात् । योगाभ्यासाभिमानिभि-
श्चाव्यग्रताभिसन्धेः सुभूत्यादिवत् । न त्वेवं प्रस्तुते, प्रथमस्य
कर्मकाण्ड एव नियोगात् ।
अयोग्यैराजीवनात् सामान्यश्रमणकवत् । न त्वेवं प्रक्रान्ते,
आगन्तुकानामधिकारात् । कुहकवञ्चितैः समीचीनप्रत्ययात्
दीपङ्करसुषिरदर्शिशालिशवत् । न त्वेवं प्रकृते, तदभावात् ।

चार्यप्रभृति बौद्धोंके द्वारा हुआ था। ऐसी बात वेदके सम्बन्धमें नहीं
है। क्योंकि कुतर्काभ्याससे पहले ही बालभाव अर्थात् मोहावस्थासे
उन्मुक्त होते ही वेदपरिग्रहमें प्रवृत्ति होती है।
एव, अज्ञानियोंके द्वारा ही पाखण्डियोंका संसर्ग पाकर सौगतादि-
आगमोंका परिग्रह किया गया है। जैसे, शौण्डिकप्रभृतिने किया था।
वेदके सम्बन्धमें यह बात नहीं है। क्योंकि पित्रादि-परम्परासे ही
वेदमें प्रवृत्ति होती है न कि पाखण्डियोंके संसर्गवशसे ।
एव, योगाभ्यासका मिथ्या अभिमान रखनेवाले व्यक्तियोंके द्वारा
कर्मकाण्डके लिये व्यग्र न होनेके अभिप्रायसे बौद्ध आगमोंका परिग्रह
किया गया है। जैसे सुभूतिप्रभृति बौद्धोंने किया था। किन्तु वेदके
सम्बन्धमें ऐसी बात नहीं है। वैदिक आगमके अनुसार गार्हस्थ्यके
बाद ही योगविधि एवं उपासनाआका उपदेश किया गया है। इसलिये
प्रथम प्रथम अत्यन्त कष्टमय गृहस्थ कर्मोंमें ही नियुक्त किया जाता है।
अथवा अपनी जीविकाके सम्पादनमें स्वयं असमर्थ व्यक्तियोंद्वारा
जीविकाके रूपमें बौद्धागमोंका परिग्रह किया गया है। जैसे, सामान्य
नामक भिक्षुको बौद्धोंने बहुत धन देकर अपने धर्ममें प्रवृत्त करा लिया
था। एसी बात वेदके सम्बन्धमें नहीं है। क्योंकि आगन्तुकोंका
अर्थात् पाखण्डियोंका इसमें अधिकार ही नहीं है।
अथवा ऐन्द्रजालिकोंसे ठगे गये व्यक्तियों भ्रमसे समीचीन (यथार्थ)
समझ कर सुगतादिकोंके आगमोंका ग्रहण कर लिया। जैसे, काठके बने
बहुत छिद्रवाले यन्त्रविशेषमें एक ही दीप रखा हुआ रहता है, किन्तु

४५२ आत्मतत्त्वविवेके
किन्तु महाजनपरिग्रहात् वक्तृप्रामाण्यमनुमाय, आयुर्वेदे नै-
रुज्यकामवदिति ।
किं पुनरमीषां मूलम् ? न ह्येतावन्तो ग्रन्थराशयः पर-
विप्रलम्भनार्थं प्रणीयन्ते, न च विश्वमेव विप्रलभ्यमिति चेत्,
भवतु किञ्चिन्मूलं किमनेन चिन्तितेन ? अतिनिर्वन्धे तु क्षणि-
कनैरात्म्यादिप्रतिपादकानां तर्काभ्यासः । प्रतिपादितं च तथा ।
मूर्खोंको उसके अनेक छिद्रोंसे निकलती हुई प्रभाओमे अनेक दीपोंका
भ्रम हो जाता है। किन्तु वेदके सम्बन्धमें ऐसी बात नहीं है। क्योंकि
वेदका मूलभूत कोई वञ्चक पुरुष नहीं है। अतः सौगतागमोंमें प्रवृत्ति-
के यही सब कारण हैं। किन्तु वैदिक यागादिकोंमें प्रवृत्ति तो—महा-
जन-परिगृहीत होनेके कारण वेद प्रामाणिक वक्ताद्वारा निर्मित है—
ऐसा अनुमान करके ही होती है। जैसे, नीरोगताकी कामना करने
वाला व्यक्ति आयुर्वेदमे उसकी प्रामाणिकताका अनुमान करके प्रवृत्त
होता है।
अस्तु, आलस्यादि कारणवश कुछ व्यक्तियोंद्वारा गृहीत किये गये
इन बौद्ध-आगमोंका फिर मूल क्या है ? अर्थात् कोई वस्तु निर्मूल नहीं
हुआ करती। अतः इनका भी कोई मूल होना चाहिये और समूल
होनेसे ही उन्हें प्रमाण भी मानना उचित है। क्योंकि अत्यन्त कष्ट
उठाकर रची गयी इतनी ग्रन्थराशियाँ केवल दूसरोंको ठगनेके लिए नहीं
बनायी गयीं हैं। यदि ठगना ही लक्ष्य हो, तो भी सम्पूर्ण विश्व नहीं
ठगा जा सकता है। अभिप्राय यह है कि ससारको ठगनेके लिये
बौद्ध-आगमोंकी रचना हुई है, ऐसी बात नहीं कही जा सकती—तो इन
आगमोंका भले ही कुछ मूल हो, उस चिन्तासे क्या प्रयोजन है ?
क्योंकि हमारी इष्टसिद्धि तो हमारे वेदागमोंकी प्रामाण्यसिद्धिसे ही हो
चुकी है। फिर भी बौद्धागमोंके मूलज्ञानार्थ हठ करो तो सुनो—
जो आगम क्षणिकवाद और नैरात्म्य (आत्माका अभाव) वादके
प्रतिपादक हैं, [उनका मूल है कुतर्कोंका अभ्यास। अर्थात् वस्तु यदि
स्थिर होती तो अर्थक्रियामे क्रमयौगपद्यकी उपपत्ति नहीं हो सकती है,
एवं आत्मा यदि हो तो आत्मदर्शी व्यक्ति उस आत्मामें अनुरागवान्