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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 523, कुल 530 में से

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पृष्ठ 523

अनुपलम्भवादः ४७१

रेकी भवति” इत्यादि । सा चावस्था न हेया, मोक्षनगर-
गोपुरायमाणत्वात् ।
निर्वाणं तु तस्याः स्वयमेव, यमाश्रित्य न्यायदर्शनो-
पसंहारः ।
तत्प्रतिपादनार्थम् 'अथ यो निष्काम आत्मकामः स
ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति, न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, तत्रैव
निर्विकल्पकमात्र ही भान होता है। जिसका आश्रयण कर चरम
वेदान्तका उपसहार होता है। क्योंकि उसमें “स्वप्रकाश चिद्रूप आत्मा ही
मुक्ति है” ऐसा प्रतिपादन किया गया है। उस अवस्थाके प्रतिपादनके
लिए “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” यह श्रुति वाक्य है।
अर्थात् वाणीकी प्रवृत्ति तभी तक है, जब तक ध्यानपरिपाक काष्ठापर
नहीं पहुंचा रहता है तथा सधर्मक वस्तुमे ही मनकी भी प्रवृत्ति होनेसे
निर्धर्मक आत्माका बोध करानेमे मन भी असमर्थ हो जाता है। यह
अवस्था पूर्व अवस्थाओंकी तरह हेय नहीं है। क्योंकि वह अवस्था
मोक्षरूप नगरमे प्रवेश पानेके लिए द्वारभूत है। अर्थात् वह मोक्षके
अत्यन्त निकटकी अवस्था है।
उस निर्विकल्पक भानकी भी अवस्थासे छुटकारा तो अपने आप ही
हो जाता है। जैसे इन्धनको नष्ट कर अग्नि भी अपने आप ही नष्ट
हो जाती है। अर्थात् आत्मगत सम्पूर्ण वैशेषिक-गुणोंका उच्छेद ही
मोक्ष है। इसलिए मुक्तिदशामे निर्विकल्पक भान भी नहीं रहता तथा
उसके नाशके लिए किसी अन्य विरोधी गुणकी अपेक्षा नहीं होती है।
बल्कि अदृष्टनाशविशिष्ट कालसे ही उस निर्विकल्पक भानका नाश हो
जाता है। इसी अवस्थाका आश्रयण कर न्यायदर्शनका उपसंहार
होता है। अर्थात् मुक्तिकी इसी अवस्थामें न्यायदर्शनका तात्पर्य है।
उसके प्रतिपादनके लिये “अथ यो निष्काम आत्मकाम आप्तकाम,
स ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति, न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, तत्रैव समवलीयन्ते”
इत्यादि वेदवाक्य मूलभूत हैं। यहाँ निष्कामका अर्थ है “विषयोंके
प्रति उपेक्षाभाव रखनेवाला”। आत्मकामशब्दका अर्थ है “आत्म-