सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 506, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 506

देवतानामाङ्कस्त्वधिकः । श्रद्धापरिगृहीतश्चाकारो देवतेति
हस्तसमालोचः ।
सत्यतपःशालिनां वचनं मन्त्रो, विषयवत्यां चिन्तायां
चित्तस्थैर्यं प्रयोजनम् । कथमन्यथा महर्षीणां शापानुग्रह-
क्षमता; कथं वा चतुर्भुजाष्टभुजाद्यवस्थेति¹ दुरुहादिति ।
हमारे वैदिक-मन्त्रगत प्रणवजातियाँ और उन उन देवताओंके बीज-
मन्त्राक्षर ही हैं, जो सर्वत्र एक रूपसे प्रयुक्त हैं। अर्थात् उन्हें ही
देखकर तदनुसार रूप कल्पनाकर या कहीं साक्षात् उन बीजाक्षरोंको ही
बौद्धोंने अपने मन्त्रोंमें प्रक्षिप्त कर लिया है तथा उन्हींके प्रभावसे बौद्धों
में आदित्यस्तम्भन या प्रतिमाका बोलना आदि शक्ति देखी जाती है।
श्रद्धेय देवताओंके सूर्य आदि नामकी जगह चैत्य आदि भिन्न नामोंका
निर्देश ही उनकी अपनी विशेषता है। चैत्य आदि जिस आकारका
श्रद्धासे ध्यान किया जाय, वही देवता है—यह तो उनकी अपने हाथ
की कल्पनामात्र है। अर्थात् सूर्य आदि देवताओंका अपना अपना रूप
निश्चित होता है। यह नहीं की ध्याताके ध्यानके अनुसार परिवर्तित
होने वाला हो।
यह कहना कि—सत्य और तपस्यासे युक्त व्यक्तियोंका वचन ही
मन्त्र है न कि आस्तिकोंका वेदभाग मन्त्र है। तथा किसी भी आकार-
का चिन्तन करनेपर जो चित्तमे स्थिरता आती है, वही उन देवताओंके
ध्यानका प्रयोजन है। यदि सत्य और तपस्याशील व्यक्तियोंका
वचन मन्त्र नहीं होता तो महर्षियोंमे शाप और वरदानकी क्षमता कैसे
आती। एव ध्यानानुसार यदि देवताका आकार नहीं होता तो चतुर्भुज,
अष्टभुज आदि अवस्थायें देवताकी कैसे होतीं—तो दुरुह (कल्पनातीत)
होनेके कारण यह पक्ष ठीक नहीं है। अर्थात् यदि तपस्वियोंका
वचन ही मन्त्र होता तो अनेक तपस्वियोंके अनेक वचन होनेसे किस
तपस्वीका कौन सा वचन मन्त्र है, यह कल्पना कठिन है। एव यदि
चित्तका स्थैर्यमात्र ही चतुर्भुज आदि अवस्थाओंका उपयोग होता तो
१. दुरुह वात् इति शङ्करमिश्रसम्मतः पाठः ।