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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 505, कुल 530 में से

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पृष्ठ 505

अनुपलम्भवाद' ४५३
शून्यसाकारादिप्रतिपादकानां तु दुरभ्यासः, योगशास्त्रेष्वभ्य-
स्यतः स्वरूपशून्यमिव भाव्यमेकमेवेति प्रतिपादनात् ।
चैत्यचीवरादिप्रतिपादकानां तु स्वस्थितिमभिसन्धाय
दर्शनान्तरस्थितिद्वेषः, स्वस्थितौ प्रमाणमनपेक्ष्य परस्थितौ
विगानात् । ब्रह्मचर्यप्रतिपादकानां तु वेदा एव, न्यायावि-
रुद्धं परतन्त्रोक्तमप्यानुकूल्यप्रसिद्धेर्गृह्यत इति विमर्शात् । मन्त्र-
कोपप्रतिपादकानां तु प्रणवबीजजातयः सर्वसाधारणाः, श्रद्धेय-
होनेके कारण कभी मुक्त नहीं हो सकेगा—इत्यादि कथन कुतर्काभ्यास
ही है । इनका कुतर्कत्व पूर्व प्रकरणमे सिद्ध किया जा चुका है ।
जो आगम 'शून्यवाद' एव 'बाह्यपदार्थ ज्ञानके ही आकारविशेष हैं'
इत्यादि वादके प्रतिपादक हैं, उनका मूल तो दुरभ्यास (दूषित भावना)
है । क्योंकि योगशास्त्रका अभ्यास करते हुए चित्तको बाह्यवस्तुओंसे
पृथक्‌कर जगत् शून्यताको ही एकमात्र अपनी भावनाका विषय बनाते
हुए किसीने शून्यवादका सिद्धान्त बना डाला ।
जो आगम चैत्य (बौद्धोंका देवताविशेष) वन्दना एव चीवर-
(वस्त्र) परित्यागके प्रतिपादक हैं, उनका तो मूल दिगम्बरोंका अपने
सिद्धान्तके मोहमे अन्यदर्शनके साथ द्वेष ही है। क्योकि चैत्यवन्दन
एव चीवरपरित्यागके सिवाय अन्य कुछ भी मानने योग्य नहीं है—
अपने इस सिद्धान्तमे बिना कुछ प्रमाण दिये ही दूसरोंके सिद्धान्तका
केवल निन्दा करते हैं ।
जो आगम ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा आदिके प्रतिपादक हैं, उनका
मूल तो वेद ही है । क्योंकि अपने न्यायसे जो विरुद्ध न हो, ऐसा
परकीय आगममें कहा हुआ भी अपने अनुकूल होनेसे ग्राह्य होता है—
ऐसा विचार कर ब्रह्मचर्य आदिका प्रतिपादन किया गया है । अथवा
ब्रह्मचर्यके प्रतिपादनसे एक भागमें विश्वास उत्पन्न कर उसी दृष्टान्तसे
बौद्धागमोंके सभी भागोंके प्रति विश्वास पैदा करनेके लिये सुगतोंने
ब्रह्मचर्य आदिका प्रतिपादन कर दिया ।
बौद्धोंके जो आगम मन्त्र समुदायके प्रतिपादक हैं, उनका मूल तो