आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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उपासीत श्रद्धाशमदमविरामैकविभवो
भवोच्छित्त्यै चित्तप्रणिधिविहितैर्योगविधिभिः ॥
उपास्यमाने च तस्मिन् प्रथमं बहिरर्था एव भासन्ते,
यानाश्रित्य कर्ममीमांसोपसंहारः चार्वाकसमुत्थानञ्च । तत्प्रति-
तच शमन दम-वैराग्य श्रद्धामात्र धन ले, चित्तकी
स्थिति हेतु यौगिक रीतियोंसे कर उपासा आत्मकी।
अर्थात् श्रुतिद्वारा आत्मतत्त्वका श्रवण कर वेदाविरुद्ध युक्तियोंसे "आत्मा
शरीरेन्द्रियादिसे भिन्न, ज्ञानसुखादि गुणवाला तथा नित्य एव विभु है"
ऐसा सम्यक् निश्चयात्मक मनन करे। तदनन्तर जिसमें शरीर इन्द्रिय-
विषय बुद्धि मन प्रवृत्ति-दोष-प्रेत्यभाव-फल और दुःखरूप दस प्रकारके
हेयोंका तादात्म्यादि सम्बन्ध विध्वस्त हो चुका है, ऐसे आत्मामें श्रद्धा-
शम दम तथा वैराग्यसे युक्त होकर आसन प्राणायाम आदि पातञ्जल-
शास्त्रोक्त योगविधियोंसे चित्तको स्थिर करते हुए संसार (आवागमन)
के आत्यन्तिक नाशरूप मोक्षके लिये उसकी उपासना (निदिध्यासन)
करे।
उस आत्माकी उपासना किये जानेकी दशामें प्रथम प्रथम बाह्य
पदार्थ ही भासित होते हैं, जिनका आश्रयण कर जैमिनि प्रणीत कर्म-
मीमांसादर्शनका उपसंहार हो जाता है। अर्थात् उद्देश्यपूर्ण हो जानेसे
उसका विराम हो जाता है। आशय यह है कि जब तक भोगकी
कामना वर्तमान है, तब तक ग्राम, पशु तथा हिरण्य आदि पदार्थ ही
मानवोंको अभिलषित होते हैं और उत्कट वासनावश वे ही पहले
भासित होते हैं, आत्मा नहीं भासित होता है। इसलिये उन अभि-
लाषाओंकी सिद्धिके लिये "ग्रामकामो यजेत, चित्रया यजेत पशुकाम,
पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार यागादि कर्मोंके
प्रतिपादनके उद्देश्यसे जैमिनिने कर्ममीमांसाका प्रणयन किया। तथा
अपना उक्त उद्देश्य पूर्ण कर कर्ममीमांसा कृतकृत्य हो गयी। यद्यपि
मुमुक्षुओंके लिये अन्य श्रुतियोंमें उक्त पदार्थ हेय कहे गये हैं, फिर भी
पुरुषेच्छाके अनुरोधसे उन श्रुतियोंका कर्ममीमांसादर्शनमें विचार नहीं
किया गया। एसा नहीं है कि ब्रह्मकाण्डके प्रति जैमिनि महर्षि