सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 509, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 509

अनुपलम्भवादः ४५७
मभावः कथम् ? कारणमात्रोच्छेदात् । अपुरुषार्थोऽयमिति
चेत् , न, असत्यस्याकाम्यस्याशक्यस्य दुरन्तस्य तथाभावात् ।
न त्वयं तथा । सत्योऽयम् , प्रमाणसिद्धत्वात् सर्वैरभ्युपगमात् ।
काम्यश्च, दुःखस्य स्वभावहेयत्वात् । सुखार्थं तद्धानमिति चेत्,
न, अतद्धेतुत्वात् ।
व्याप्तेरिति चेत् , न असिद्धेः । न हि दुःखाभावः सुखेन
व्याप्यत इति । सुखं तावत्तेन व्याप्यत इति चेत् , तर्हि सुखे
सत्यवश्यं दुःखाभावो भवेदिति सुखप्रार्थनेति विपरीतापत्तिः ।
नावेद्यत्वादसौ काम्य इति चेत् , न, दुःखार्तानां तद-
उत्तर—दुःखके जितने भी कारण हैं, उनका उच्छेद हो जानेसे
दुःखोका अत्यन्ताभाव हो जाता है और वही मोक्ष है ।
यदि कहो कि—दुःखकी निवृत्ति तो पुरुषार्थ नहीं है—तो ऐसा
नहीं कह सकते । क्योंकि जो असत्य है, अकाम्य है, असाध्य है या
जिसका अन्त ( परिणाम ) दोषमय है, वही अपुरुषार्थ होता है । यह
तो वैसा है नहीं । बल्कि यह प्रमाणसिद्ध होनेसे सत्य है । सभीके
द्वारा अभीष्ट होनेसे काम्य भी है । क्योंकि दुःख स्वभावसे ही सबके
लिये त्याज्य है । यदि कहो कि—दुःख स्वरूपतः त्याज्य नहीं है किन्तु
सुखके लिये उसका त्याग होता है । अर्थात् मुख्यरूपसे सुख ही काम्य
है, दुःखाभाव तो उसका साधन है, इसलिये वह गौणरूपसे काम्य है—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि दुःखका त्याग सुखके प्रति हेतु
नहीं है ।
यदि कहो कि—दुःखाभाव और सुखमे परस्पर व्याप्ति होनेसे हेतु
है—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि उनकी परस्पर व्याप्ति ही असिद्ध
है । कारण, दुःखाभाव सुखसे व्याप्त नहीं है । क्योंकि सुषुप्त-अवस्था
में दुःखाभाव रहनेपर भी सुख नहीं रहता है । यदि कहो—दुःखाभाव
सुखसे व्याप्त भले ही न हो किन्तु सुख तो दुःखाभावसे व्याप्त है,
क्योंकि सुख होनेपर दुःखाभाव अवश्य रहता है—तब तो सुख होनेपर
अवश्य ही दुःखाभाव हो जायगा, इसी अभिप्रायसे सुखकी प्रार्थना होगी ।