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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 518

४६६ आत्मतत्त्वविवेके
निश्चिनुयाः । तदतिरिक्ते तु सुखज्ञानव्यवहारे बीजाभावात्
तद्व्यवहाराभावः । अनुग्रहाभिष्वङ्गेन्द्रियप्रसादादिलक्षणं
हि कार्यं तद्व्यवहारबीजम्, अर्थप्रवणत्वं स्मृतिसंस्कारादिकार्यं
ज्ञानव्यवहारादिबीजं लोके, तयोश्चाभाव आत्मनीति ।
तस्मात्—
श्रुतेः श्रुत्वाऽत्मानं तदनु समनुक्रान्तवपुषो
विनिश्चित्य न्यायादथ विहतहेयव्यतिकरम् ।
ज्ञानस्वरूप नहीं है । एव वैषयिक सुख और ज्ञानसे अतिरिक्त आत्मा-
में तो सुख और ज्ञानके व्यवहारमे, जैसा कि वेदान्ती मानते हैं, कोई
बीज नहीं है । इसलिये वेदान्तादि सम्मत किसी भिन्न प्रकारके सुख
और ज्ञानका व्यवहार आत्मामे नहीं हो सकता है । क्योंकि अनुग्रह,
अभिष्वङ्ग ( संश्लेष ) तथा इन्द्रियोंकी प्रफुल्लता आदि कार्य ही सुख-
व्यवहारका बीज है । अर्थात् जिससे अनुग्रह आदि कार्य उत्पन्न होते
हैं, वही सुख है । वेदान्तादिसम्मत सुखसे तो अनुग्रहादिकार्य होता ही
नहीं है, इसलिये उसे सुख नहीं कह सकते । एव अर्थप्रवणता (विषय-
की ओर प्रवृत्ति ), स्मृति तथा सस्कार आदि कार्य ज्ञानव्यवहारका बीज
है । अर्थात् जो अर्थाभिमुखी प्रवृत्ति तथा स्मृति सस्कार आदिका
जनक है, वही ज्ञान है । आपका अभिमत ज्ञान ज्ञान नहीं है । एव
मुक्तावस्थामें आत्मामे उन दोनों ( सुख और ज्ञान ) का अभाव है ।
अर्थात् आगम, अनुभव और न्यायके बलसे यही सिद्ध होता है कि
आत्मा स्वप्रकाश सुख ज्ञानस्वरूप नहीं है । क्योंकि वैषयिक सुख और
ज्ञानके अतिरिक्त अन्य प्रकारका सुख और ज्ञान न्यायविरुद्ध होनेसे
है ही नहीं । और मुक्तावस्थ आत्मामे वैषयिक सुख और ज्ञानका
सर्वथा अभाव है । अत दुःखका आत्यन्तिक नाश ही मुक्ति है—यह
सिद्धान्त है । इसलिये—
अयि मानवो ! यदि चाहते ससार बन्धन भञ्जना,
तो वेदसे होगा प्रथम “आत्मा कीदृश है” जानना ।
वेदानुगामी न्यायसे फिर साधु निश्चित कर उसे,
संसर्ग दसविध-हेयका, विध्वस्त हो, फिर नहि फँसे ।