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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 513

अनुपलब्धवादः ४६१
शल्यसम्मेदः । अत एव विविच्य भुज्यतां तुषतण्डुलवदित्य-
शक्यमिति ।
शक्यश्चायं, निवर्त्यत्वात् । स्वन्तश्च, अपरावृत्तेरनर्थवा-
सनानुकूलाभिसन्धित्वाच्चेति ।
नित्यं तु सुखं न सत्यम्, योग्यानुपलम्भबाधितत्वात् ।
मात्रामे दुःखरूपी काटोंका ही सम्मिश्रण है । इसीलिये भूसी और
चावलके न्यायसे दुःखरूपी काँटाको बिलगा बिलगा कर सुखका भोग
किया जाय, यह भी असम्भव है ।
एव, दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष साध्य भी है, अर्थात् असाध्य नहीं है ।
क्योंकि उपायद्वारा उसे किया जा सकता है । अर्थात् दुःखात्यन्ताभाव-
रूप मुक्तिके पक्षमे यद्यपि अत्यन्ताभावके नित्य होनेसे वह उत्पाद्य नहीं
हो सकता है, तथापि सम्पूर्ण दुःखसाधनोंका ध्वंस उत्पाद्य है, अत उसके
साथ दुःखात्यन्ताभावका सम्बन्ध भी उत्पाद्य होनेसे वह भी साध्य कोटि
मे आ जाता है । यदि विशिष्ट दुःखका ध्वंसरूप मुक्ति हो तो वह स्वतः
ही साध्य है । यदि दुःखका प्रागभाव ही मुक्ति हो तो वह भी दुःख-
कारणोंके विघटनके द्वारा साध्य ही है ।
साथ ही यह दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष परिणाममे भी अच्छा है ।
अर्थात् तक्षकसर्पके शिरका मणि लेनेके समान दुष्परिणामवाला भी
नहीं है । क्योंकि निवृत्त हुआ दुःख फिर नहीं पैदा होता है ।
तथा किसी अन्य अनर्थकामनाकी प्रयोजिका भी वह दुःखकी आत्य-
न्तिक निवृत्तिकी कामना नहीं है । अर्थात् जैसे, सुखाभिलाषी
व्यक्ति सुखका भोग होनेपर बारबार सुख और उसके साधनकी कामना
करता रहता है । तथा सुखका उचित साधन नहीं मिलनेपर अनुचित
साधनकी भी कामना करता है । जैसे, कामी व्यक्ति अपनी स्त्रीके
नहीं मिलनेपर परस्त्रीकी कामना करने लगता है, किन्तु वह कामना
परिणाममे महान् अनर्थका हेतु है । इस प्रकार सुखकी कामना उत्तरो-
त्तर अनर्थकामनाको ही उद्बुद्ध करनेवाली होती है । किन्तु यह दुःख-
निवृत्तिरूप मोक्षकी कामना वैसी नहीं है ।
नित्य सुख तो कोई सत्य वस्तु है ही नहीं । इसलिये नित्य सुख