आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 524, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमवलीयन्ते" इत्यादीनि ।
तस्मादभ्यासकामोऽप्यपदद्वाराणि विहाय द्वारैरेव प्रवि-
शेत्, यतो मार्गविमार्गसंमोहमाशङ्कमानैरुच्यते "लक्ष्येण
धनुषा योग" इति ।
बहुतरपरतन्त्र प्रान्तरध्वान्तभीत-
स्तिमितपथिकरक्षासार्थवाहेन यत्नात् ।
तदिदमुदयनेन न्यायलोकागमानां
व्यतिहतिमवधूय व्यञ्जितं वर्त्म मुक्तेः ॥ १ ।
विषयक मनन एव साक्षात्कारमें संलग्न"। आप्तकाम वह है, जिसने
आत्मविषयक साक्षात्कार प्राप्त कर लिया है। ऐसा व्यक्ति "ब्रह्म व
सन्' अर्थात् ब्रह्मके समान निरञ्जन होकर 'ब्रह्म व समभ्येति" अर्थात्
केवलात्मा बन जाता है या कैवल्य प्राप्त कर जाता है। उसके प्राण
उत्क्रमण नहीं करते किन्तु उस आत्मामें ही लीन हो जाते हैं। अर्थात्
वह व्यक्ति जीवन मरणसे रहित हो जाता है।
इसलिये मोक्षनगरमे प्रवेश पानेके लिए अभ्यासकी कामना
करनेवाला व्यक्ति भी चार्वाकादि मतरूप अपद्वारोंका परित्यागकर कर्म-
मीमांसाप्रभृति द्वारोंसे ही प्रवेश करे। क्योंकि मार्ग और विमार्गके
सम्बन्धमे लोगोंको भ्रम हो जानेकी आशङ्का करते हुए आचार्योंने उससे
बचनेके लिए कहा है कि लक्ष्यके साथ धनुषका (धनुर्बाणका) संयोग
कदाचित् ही होता है। यदि होता भी है तो तभी, जब कि लक्ष्य तक
पहुंचा सकनेवाला धनुषका मार्ग ठीक हो ॥
परशास्त्र अनेक घन मार्गगत अज्ञानरूप-
अतिघोर तमसे भीत निष्क्रिय पांथजनके प्राणके-
रक्षार्थ, उदयन मार्गदर्शकने, हटा व्याघातको-
श्रुति-न्याय आलोकसे सुझाया मुक्तिके शुभ पथको ॥१॥