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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 507

अनुपलम्भवादः ४५५
एकविप्रलम्भार्थं वा केनचित् कियदेव प्रणीतं तेनानुष्ठित-
मपरैस्तदनुयायिभिर्गृहीतमन्वष्ठितं व्याख्यातं विवर्धितं चेति
किमनुपपन्नम् ? तस्माद् विरुद्धागमव्युदासेन वेदा एवार्वा-
चीनपुरुषपूर्वकत्वशङ्काव्युदासेन परमेश्वरप्रणीतत्वादेव भूतार्थ-
भागस्याप्रामाण्यशङ्काव्युदासेन प्रमाणमेवेति नियमः ।
कथं चरम इति चेत् ? महाजनपरिग्रहस्य तत्साध्यस्य
वा सर्वज्ञपूर्वकत्वस्य पुरुषदोषाभावस्य वा प्रामाण्यहेतोर्भूतभा-
जिस किसी वस्तुकी चिन्तासे ही चित्त स्थिर हो जा सकता है, फिर
मूर्तिविशेषको देवताके रूपमें कैसे कल्पित कर सकते हैं ?
अथवा यों कहनेमें भी कोई अनुपपत्ति नहीं है कि किसी एकको
ठगनेके लिए किसीने कुछ बना दिया तथा उस वञ्चित व्यक्तिने तदनुसार
अनुष्ठान किया और उसीकी देखादेखी और अनुयायियोंने भी उसे
ग्रहण कर लिया, तदनुसार अनुष्ठान किया, उसकी व्याख्यायें कीं तथा
लोकमें उसे फैला दिया ।
इसलिये वेदविरुद्ध आगमोंके परवञ्चनार्थ बनाये होनेके कारण
अप्रामाणिक होनेसे उनके खण्डितकर दिये जानेसे ही, एवं वेदोंके
आधुनिक पुरुषद्वारा निर्मित होनेकी शङ्काके खण्डित हो जानेसे
परमेश्वरप्रणीत होनेसे ही, तथा वेदके भव्यार्थभाग ( साध्यार्थभाग
अर्थात् क्रियाभाग ) के समान भूतार्थभाग ( सिद्धार्थभाग ) में भी
अप्रामाण्यशङ्काके खण्डित हो जानेसे प्रमाण ही है, ऐसा नियम सिद्ध
हो जाता है । अर्थात् वेद ही प्रमाण है, अन्य नहीं--ऐसा उद्देश्यगत
नियम, तथा ईश्वरप्रणीत होनेसे ही प्रमाण है, अन्य कारणसे नहीं---
ऐसा हेतुगत नियम, तथा वेद प्रमाण ही है, अप्रमाण नहीं--ऐसा
विधेयगत नियम होकर त्रिविध नियम सिद्ध होते हैं ।
यदि पूछो कि - पूर्वके दो नियम भले ही हों, किन्तु अयोगव्यवच्छे-
दार्थक एवकारका प्रयोग कर, वेद प्रमाण ही है—यह अन्तिम नियम
कैसे है ?--तो इसका यही उत्तर है कि महाजनद्वारा परिगृहीत होना
अथवा महाजनपरिग्रहसे सिद्ध सर्वज्ञपूर्वक ( सर्वज्ञप्रणीत ) होना या
पुरुषगत दोषसे रहित होना ही वेदकी प्रामाणिकताका कारण है, जो