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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 521, कुल 530 में से

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पृष्ठ 521

अथार्थाभावः, यमाश्रित्य वेदान्तद्वारमात्रोपसंहारः शून्य-
नैरात्म्यसमुत्थानं च। तत्प्रतिपादनार्थम् "असदेवेदमग्र
आसीत्" इत्यादि। तद्घानाथम् ‘अन्धं तमः प्रविशन्ति
ये के चात्महनो जनाः" इत्यादि।
ततो विवेको यमाश्रित्य साङ्ख्यमतोपसंहारः शक्तिसत्त्व-
समुत्थानञ्च। तत्प्रतिपादनार्थम् "प्रकृतेः परस्तात्" इत्यादि।
इसके बाद अर्थका भी अभाव भासित होता है, जिसका आश्रयण
कर वेदान्तके द्वारमात्रका ही उपसहार हुआ। अर्थात् अर्थाभाव सिद्ध
होनेपर ही उसके द्वारा अद्वैतकी सिद्धि होगी, इसलिये वह वेदान्तका
द्वार हुआ। एव अर्थाभावका आश्रयण कर ही शून्यवाद या नैरात्म्य-
वादका समुत्थान हुआ। अर्थात् जगत्प्रपञ्चके मिथ्यात्वज्ञानसे ही
आत्माको भी प्रपञ्चान्तर्गत होनेसे मिथ्या मानते हुए शून्यवादीयोंने शून्य
नैरात्म्यवादका सिद्धान्त बना लिया। इन दोनोंका मूल "असदेवेदमग्र
आसीत्" इत्यादि श्रुतिवाक्य है। किन्तु उक्त श्रुतिवाक्यका गलत
अभिप्राय लगानेवाले नैरात्म्यवादियोंके निषेधके लिये "अन्धं तमः प्रवि-
शन्ति ये के चात्महनो जनाः" इत्यादि श्रुतिवाक्य है। यहाँ "आत्म-
हनः" का अर्थ है "आत्माको अस्वीकार करने वाले"। यहाँ भी
बृहस्पतिका अभिप्राय पाखण्डियोंका प्रतारणमात्र है, न कि उन्हें वस्तुत
नैरात्म्यवाद अभिप्रेत है।
इसके बाद ध्यानक्रमसे बाह्य अर्थसे (अनात्मासे) आत्माका विवेक
भासित होता है। अर्थात् सर्वथा आत्मातिरिक्त वस्तुके अभावकी
अवस्था अभी तक नहीं आनेसे बाह्यवस्तुका बिना विरोध किये उससे
आत्माका विवेक (भेद) भासित होता है। जिसका आश्रयण कर सांख्य
मतका उपसहार हुआ। अर्थात् प्रकृति पुरुषके विवेकके अभिप्रायसे
ही कपिलमुनिने सांख्यसूत्रोंका प्रणयन किया। एवं उक्त विवेकका आश्र-
यण कर ही शक्ति (प्रकृति) और सत्त्व (महान् या बुद्धि) का समुत्थान
हुआ। अर्थात् सांख्यमतानुयायियोंने आत्माकी निर्लेपता सिद्ध करनेके
लिये सुखादिके आश्रयके रूपमें महत् या बुद्धितत्त्वको तथा जगत्के मूल
कारणके रूपमें प्रकृतिको स्वीकार किया। इनका मूल "सभी वस्तुओंको