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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 517, कुल 530 में से

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पृष्ठ 517

अनुपलम्भवादः ४६५
“अलाभे मत्तकाशिन्या दृष्टा तिर्यक्षु कामिता” इत्युदा-
हरणादिति ।
स्यादेतत्, आत्मा तु किं स्वप्रकाशसुखस्वभावोऽन्यथा
वेति पृच्छामः । श्राद्धोऽसि चेदुपनिषदः पृच्छ । मध्यस्थोऽसि
चेत्, अनुभवं पृच्छ ।
नैयायिकोऽसि चेत्, न वैषयिकसुखज्ञानस्वभाव इति
सुखसंस्कारके उद्बुद्ध होनेपर पूर्वकी अपेक्षा उत्कृष्ट सुखकी अभिलाषा
करनेवाले व्यक्तिको उस उत्कृष्ट सुखके नहीं मिलनेपर निम्नकोटिके
वैषयिक सुखमें ही प्रवृत्ति होने लगेगी, जो कि मोक्षका विरोधी है ।
क्योंकि “मत्तकाशिनी (सुन्दरी स्त्री) की अप्राप्तिमें तिर्यग्योनियों
के प्रति भी कामवासना देखी जाती है” ऐसा उदाहरण है । अर्थात्
मोक्षको सुखरूप माननेमें उत्तरोत्तर बन्धन ही बढ़ता जायगा तथा
मुक्ति असंभव हो जायगी ।
आत्माका स्वरूप
“अस्तु, आत्मा क्या स्वप्रकाश-सुखस्वभाव है ? यह हम पूछते हैं ।
आशय यह है कि आत्मा यदि स्वप्रकाश-सुखस्वभाववाला हो तो
उसमें दुःखकी संभावना ही कहाँ है कि आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्ति मोक्ष-
का स्वरूप हो” । इसका उत्तर यह है कि यदि श्रद्धालु रूपमें पूछते हो
तो उपनिषदोंको पूछो । अर्थात् उपनिषदोंमें आत्माका प्रतिपादन ज्ञान
और सुखसे भिन्नरूपमें ही किया गया है । जहाँ कहीं सुखज्ञान-
स्वभावत्वका प्रतिपादन है, उसका दूसरा तात्पर्य बताया जा चुका है ।
यदि मध्यस्थके रूपमें अर्थात् न्याय और आगमका अपक्षपाती होकर
पूछते हो तो अपने अनुभवको पूछो । अर्थात् “अहं सुखी, अहं जाने”
इत्यादि अनुभवसे आत्मा सुख और ज्ञानसे युक्त प्रतीत होता है न कि
सुख और ज्ञानरूप । यदि वैसा होता तो “अहं ज्ञानम् अहं सुखम्”
ऐसा अनुभव होता ।
यदि नैयायिकके रूपमें अर्थात् आत्माका स्वरूप न्यायद्वारा जानने-
की रुचिसे पूछते हो तो यही निर्णय करो कि आत्मा वैषयिक-सुख और
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