आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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नापि शक्यम्, न हि तन्निर्वर्त्यं नित्यत्वात् । नापि
विकार्यम्, अपरिणामित्वात् । नापि संस्कार्यम्, अनाधेया-
तिशयत्वात् । न प्राप्यम्, नित्यसम्बन्धवत्त्वात् ।
न ज्ञेयम्, ज्ञानस्यापि नित्यत्वात् । अनित्यत्वे वा
शरीरादिकारणापाये तदनुत्पत्तेः । उत्पत्तौ वा तेषामकारण-
त्वप्रसङ्गात् । तथा च सर्वः सर्वदर्शी स्यात्, आत्ममनः-
संयोगादेः सर्वत्राविशेषात् ।
एव, नित्यसुखरूप मोक्ष शक्य ( साध्य ) भी नहीं है । क्योंकि
शक्यका क्या अर्थ है ? उत्पाद्य या विकार्य या सस्कार्य या प्राप्य अथवा
ज्ञेय । यदि शक्यका अर्थ उत्पाद्य लें तो वह उत्पाद्य नहीं हो सकता,
क्योंकि नित्य है । नित्य सुख विकार्य भी नहीं हो सकता, क्योंकि यह
अपरिणामी है । सस्कार्य ( सस्कारद्वारा कुछ अतिशय लानेयोग्य )
भी वह नहीं है, जैसा कि “व्रीहीन् प्रोक्षति” यहाँ प्रोक्षणद्वारा व्रीहिका
सस्कार होता है—क्योंकि नित्य सुख अनाधेयातिशयरूप है । अत
उसमें सस्कारद्वारा किसी प्रकारके अतिशयका आधान नहीं किया जा
सकता है ! नित्यसुखको प्राप्य भी नहीं कह सकते, जैसा कि नित्य भी
वेद अध्ययनद्वारा प्राप्त किया जाता है—क्योंकि नित्य होनेसे सदा
प्राप्त ही है ।
ऐसे ही नित्य सुखवादी वेदान्तियोंके यहाँ ज्ञान भी नित्य ही होता
है । अत ज्ञान और सुख दोनोंके नित्य होनेसे उपासनादि विधियोंसे
नित्य सुखको ज्ञेय कहना भी ठीक नहीं है ।
यदि कहो कि—ज्ञान अनित्य है—तो मुक्तिदशामे शरीरादि ज्ञान
साधनोंके अभावमे नित्यसुखका ज्ञान ही नहीं उत्पन्न हो सकता है ।
यदि उस कालमें शरीरादि कारणोंके अभावमे भी सुखज्ञानकी उत्पत्ति
मानो तो ज्ञानोत्पत्ति के प्रति शरीरादि अहेतु हो जायगा । अर्थात् बिना
शरीरेन्द्रियादिके भी ज्ञान पैदा होने लगेगा । ऐसी स्थितिमें सब सर्वज्ञ
हो जायेंगे । क्योकि ज्ञानका कारण जो आत्मा और मनका सयोग है,
वह सबमे समानरूपसे है ।