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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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४६४ आत्मतत्त्वविवेके

ज्ञानज्ञेययोर्नित्यत्वेऽपि तत्सम्बन्धो जन्यते, स च षट्-
पदार्थव्यतिरेकादुत्पन्नोऽपि न निवर्तते ध्वंसवदिति चेत्, न,
भावाभावयोः प्रकारान्तराभावात् ।
तत्र स नाभावः, प्रतियोग्यनुपपत्तेः। भावत्वे त्ववश्यमुत्पन्नो
निवर्त्तेत, उपाध्यन्तराभावात् । अविद्याविध्वंसनमेव तत्प्राप्ति-
रिति चेत्, अत्र न नो विवादः । न ह्येकविंशतिप्रभेदभिन्न-
दुःखव्यतिरिक्ता अविद्या नाम । तद्विध्वंसनञ्च पुरुषार्थ
इति प्रतिपादनादिति ।
दुरन्तं च तत्, तदभिसन्धेः सुखसंस्कारसहकारितया
तदुद्भवे विशिष्टसुखाभिलाषिणो वैषयिकेऽपि प्रवृत्तिसंभवात् ।

यदि कहो कि—ज्ञान और सुखरूप ज्ञेय इन दोनोंके नित्य होनेपर
भी उनका सम्बन्ध उत्पन्न होता है। अतः वह उपासनादि विधियोंके
द्वारा साध्य है। तथा वह सम्बन्ध उत्पत्तिशाली होनेपर भी द्रव्यादि
षट् पदार्थोंसे भिन्न होनेके कारण विनष्ट नहीं होता है। जैसे, ध्वंस
उत्पत्तिमान् होनेपर भी विनष्ट नहीं होता—तो ऐसा नहीं हो सकता है।
क्योंकि भाव और अभावके अतिरिक्त पदार्थोंका कोई दूसरा प्रकार ही
नहीं होता है। उसमें वह सम्बन्ध अभावरूप नहीं है। कारण, निष्प्र-
प्रतियोगिक अभाव होता ही नहीं है। यदि वह सम्बन्ध भावरूप हो तो
उत्पन्न होनेके कारण वह अवश्य विनष्ट हो जायगा। क्योंकि उत्पन्न
वस्तुके विनाशो होनेमे भावत्व ही उपाधि है, अन्य नहीं। यदि कहो
कि—अविद्याका ध्वंस होना ही नित्यज्ञान और नित्यसुखका सम्बन्ध
है—तो इसमें हमारा कोई विरोध नहीं है। क्योंकि इक्कीस प्रकारोंमें
विभक्त दुःखके अलावे कोई अविद्या नहीं है तथा इन दुःखोंका विध्वंस
ही पुरुषार्थ (मोक्ष) है, यह न्यायमे प्रतिपादित किया गया है।
अर्थात् न्यायसम्मत दुःखध्वंस ही अन्ततोगत्वा मोक्षका स्वरूप सिद्ध
होता है।
एव, नित्यसुखरूप मोक्ष दुरन्त अर्थात् परिणाममें दोषपूर्ण भी है।
क्योंकि सुखकी कामनासे पूर्वमें प्राप्त सुखोंके संस्कारोंकी सहायता पाकर