आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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पादनार्थश्च "पराञ्चि खानि" इत्यादि । "तद्धानाय रंप
कर्मभ्य" इत्यादि ।
अथार्थाकारः, यमाश्रित्य त्रैदण्डिकमतोपसंहारो योगा-
चारसमुत्थानञ्च । तत्प्रतिपादनार्थम् "आत्मैवेदं सर्वम्"
इत्यादि । तद्धानार्थम् 'अगन्धरसम्, इत्यादि ।
उदासीन थे । यहाँ उपसंहारशब्दसे कर्मकाण्डके विषयमे कर्ममीमांसाका
प्रामाण्य सूचित होता है ।
यहीं से चार्वाकमतका उत्थान भी होता है । अर्थात् वाह्यपदार्थोंको
ही लेकर बृहस्पतिने भी चार्वाकदर्शनका निर्माण किया और प्रत्यक्षाति-
रिक्त वस्तुको अप्रमाण कह दिया । बृहस्पतिके वैसा प्रतिपादन करनेमे
"पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्"
इत्यादि श्रुति मूल है । यहाँ उत्थानशब्दसे चार्वाकमतका उत्थान ही
भर होता है, उसका उपसंहार नहीं हुआ है । अत इसके प्रतिपादक
आचार्य बृहस्पतिका भी इसमे अन्तिम तात्पर्य नहीं था । इसलिये
चार्वाकशास्त्र अप्रमाण होनेसे शास्त्राभास है—यह बात सूचित होती
है । इसीलिये इस मतके निषेधके लिये "कर्मणा मृत्युमृषयो निषेदु
प्रजावन्तो द्रविणमीहमाना । अथापरे ऋषयो मनीषिण परं कर्मभ्योऽ
मृतत्वमानशु " इत्यादि श्रुतियाँ हैं ।
इसके बाद ध्यानक्रमसे अर्थाकार आत्मा भासित होता है और योगा-
चारमतका समुत्थान होता है । इसके प्रतिपादनमे "आत्मैवेद सर्वम्"
इत्यादिश्रुति मूल है । अर्थात् संज्ञा रूपादि पञ्चस्कन्धात्मक यह विश्व
आत्मा ही है । यहाँ आत्माशब्दसे 'विज्ञान' अर्थ लेकर विज्ञानवादी
योगाचार व्यामोहमे पड़ गया । तथा भास्करमतानुयायी त्रिदण्डियोंके
मतका—सब पदार्थ आत्माका ही आकार है, अतः आत्मा ही वस्तुत
ध्येय है—ऐसा मानते हुए उपसंहार हुआ है । योगाचारमतके निषेधके
लिये "अगन्धरसम्" इत्यादिश्रुति वाक्य है । अर्थात् आत्मा या
विज्ञान गन्धरसादि विषयोंसे भिन्न वस्तु है । त्रिदण्डिमतका तो मुख्य
अभिप्राय आत्माको वास्तविक ध्येय बतलानेमे है, न कि उसे अर्थाकार
बतलानेमें ।