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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 508, कुल 530 में से

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पृष्ठ 508

व्यार्थभागयोः साधारणत्वात् । किं तस्य फलमिति चेत् ?
स्वार्थप्रतिपादनम् । किं तेन प्रयोजनम् ? यथायथमुपादानं
हानं मोक्षश्च । तत्रानर्थहेतूनां तत्त्वज्ञानाद्धानमर्थहेतूनामुपादा-
नमात्मनो मोक्ष इति ।
कः पुनरयं मोक्षः ? आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्तिरात्मनः ।
किमात्यन्तिकत्वम् ? तज्जातीयात्यन्ताभावविशिष्टत्वम् । तेषां-
वेदके भूतार्थभाग और भव्यार्थभाग दोनों में समानरूपसे है । अतः
भव्यार्थभागके समान ही अर्थवादादिरूप भूतार्थभाग भी प्रमाण ही है ।
यदि पूछो कि—भव्यार्थभागका तो प्रवृत्ति या निवृत्ति फल है, किन्तु
भूतार्थभाग (अर्थवादादि भाग) का क्या फल है?—तो यही उत्तर
है कि स्वार्थका प्रतिपादन करना भूतार्थभागका साक्षात् फल है । पुनः
पूछो कि—स्वार्थप्रतिपादनका प्रयोजन क्या है ?—तो यही कि यथा-
योग्य कहीं उपादान (ग्रहण) करना, कहीं परित्याग करना और कहीं
मोक्षप्राप्ति । उनमें जो अनर्थके हेतु हैं, उनके तत्त्वज्ञानसे उनका
परित्याग करना होगा । जो इष्टके साधन हैं, उनके तत्त्वज्ञानसे उनका
ग्रहण होगा तथा आत्माके तत्त्वज्ञानसे मोक्ष होगा । अर्थात् अर्थवाद-
भागके भी परम्परया प्रवृत्ति, निवृत्ति और मोक्ष ही यथायोग्य फल हैं ।
जैसे, "वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता" "तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजेत"
इत्यादिका वायुयागादिमें प्रवृत्ति प्रयोजन है । "अन्धन्तमः प्रविशन्ति
ये के चात्महनो जनाः" इत्यादिका आत्महत्यासे निवृत्ति फल है । तथा
उपनिषद्भागका मोक्ष फल है ।
मोक्षका स्वरूप
प्रश्न—यह मोक्ष क्या वस्तु है ?
उत्तर—आत्मामें दुःखोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति ही मोक्ष है ।
प्रश्न—आत्यन्तिक किसे कहते हैं ?
उत्तर—दुःखमात्रका अत्यन्ताभाव होना दुःखकी आत्यन्तिकी
निवृत्ति है ।
प्रश्न—दुःखोंका अत्यन्ताभाव कैसे होता है ?