आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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श्रुतिस्तत्र मानमिति चेत्, न, योग्यानुपलब्धिबाधिते तदनव-
काशात् अवकाशे १ वा ग्रावप्लवनश्रुतेरपि तथाभावप्रसङ्गात् ।
नापि काम्यं, सदातनत्वात् । न हि यद् यस्यास्ति स
तत्कामयते । भ्रान्तेरेवम्, कण्ठस्थचामीकरवदिति चेत्, न
स्वसंवेद्ये तदभावात् ।
मोक्ष है—यह पक्ष नहीं हो सकता । क्योंकि सुख और दुःख नियमतः
प्रत्यक्षयोग्य ही होते हैं । अतः यदि नित्य सुख होता तो उसका प्रत्यक्ष
होता । इसलिये प्रत्यक्षयोग्यता होनेपर भी उसकी उपलब्धि नहीं होनेसे
नित्य सुखका होना बाधित है । यदि कहा जाय कि—नित्य सुखकी
सत्तामें श्रुति प्रमाण है—तो यह नहीं हो सकता । क्योंकि जो योग्य
होता हुआ भी अनुपलब्धिके कारण बाधित है, उसका बोधक श्रुति भी
नहीं हो सकती है। यदि हो तो ग्रावप्लवन (पत्थरका तैरना) की
प्रतिपादिका श्रुति भी वस्तुगत्या ग्रावप्लवनकी प्रतिपादिका हो जायगी ।
अर्थात् 'नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म, आनन्दं ब्रह्मणो रूपं तच्च मोक्षे
प्रतिष्ठितम्' इत्यादि श्रुतियाँ मोक्षावस्थामें नित्य सुखको नहीं बताती हैं,
किन्तु दुःखात्यन्ताभावपरक हैं ।
एवं, नित्य सुख काम्य भी नहीं हो सकता है । क्योंकि नित्य होने
से वह सदा है ही, फिर कामना क्यों ? ऐसा नहीं होता कि जो वस्तु
जिसके पास है, उसकी वह कामना करता हो । यदि कहें कि—नित्य
सुखके विद्यमान होनेपर भी उसके अविद्यमान होनेकी भ्रान्तिसे उसकी
कामना होती है । जैसे कण्ठमें ही स्थित स्वर्णाभरणको नहीं देखनेसे
भ्रमवशात् उसकी कामना होती है—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि
स्वकण्ठस्थित स्वर्णाभरण दूसरेके द्वारा संवेद्य होनेके कारण भ्रमवशात्
भले ही काम्य हो, किन्तु सुख तो सदा स्वसंवेद्य है, अर्थात् रहनेपर स्वयं
ही विदित होता रहता है । इसलिये स्वयंप्रकाश सुखमें भ्रम हो ही
नहीं सकता । अतः नित्य सुखरूप मोक्ष सदा प्राप्त और सदा प्रत्यक्ष
होनेके कारण काम्य नहीं हो सकता है ।
१. संभव वा इति क्वचित् पाठ