आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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वृत्तेरपि दर्शनात् । मधुविषसंपृक्तमन्नमत्रोदाहरणम् । सन्ति
च केचनालंप्रत्ययवन्तः । न च समत्वम्, दुःखस्यैव प्राचुर्यात्,
दुःखे सुखहेत्वननुषङ्गेऽपि सुखे दुःखहेत्वनुषङ्गनियमात् ।
तथाहि न्यायोपार्जितेष्वेव विषयेषु कियती सुखखद्यो-
तिका कियन्ति चार्जनरक्षणादिभिर्दुःखदुर्दिनानि । अन्यायो-
पार्जितेषु यद् भविष्यति तन्मनसापि चिन्तयितुमशक्यम् ।
विदाङ्कुर्वन्तु च सन्तो यदि कण्टकादिजन्येषु दुःखेषु लेशतोऽपि
-सुखानुषङ्गः । अस्ति च स्वर्गादिसुखेष्वपि बहुलो दुःख-
एवं विषसे संपृक्त अन्न उदाहरण है । अर्थात् मधुका लोभी व्यक्ति
-विषसे होने वाले अनिष्टकी उपेक्षा कर उस अन्नको खा लेता है, तथा
मधुका जो लोभी नहीं है, ऐसा व्यक्ति मधुकी मधुरतागुणकी उपेक्षा कर
विषमिश्रित अन्नका परित्याग कर देता है । दुःखरूपी दुर्दिनसे डरे हुए
बहुतसे व्यक्ति हैं, जो उस सुखके प्रति भी विरक्त हैं । तात्पर्य यह है
कि सुखका भी उच्छेद हो जायगा, इस कारण दुःखनिवृत्तिरूप पुरुषार्थमें
अकाम्यत्वका प्रसङ्ग नहीं आयगा ।
साथ ही दुःख और सुखमें कोई समता भी नहीं है । क्योंकि
संसारमे दुःख ही अधिकमात्रामें है । अतः अधिक दुःखोंकी निवृत्ति-
रूप लाभकी मात्रा विशेष है तथा उसके समक्ष स्वल्प सुखका उच्छेदरूप
हानिकी मात्रा बहुत थोड़ी है, इसलिये दुःख-निवृत्ति अवश्य काम्य
होगी । क्योंकि दुःखमे सुखहेतुकी अनुवृत्ति नहीं भी रहती है, किन्तु
प्रत्येक सुखमें दुःखका हेतु अवश्य ही अनुवर्तमान रहता है । जैसे कि
न्यायपूर्वक उपार्जित विषयोंमें ही कितनी सुखरूपी जुगनू भासित होती
है ? और अर्जन एवं रक्षा आदिको लेकर कितने दुःखरूपी दुर्दिनोंका
सामना करना पड़ता है ? अर्थात् न्यायोपार्जित विषयोंमें भी सुखसे
अधिक दुःख ही भोगना पड़ता है । किन्तु जो विषय अन्यायसे उपार्जित
होंगे, उनमें जो भोगना पड़ेगा, उसकी तो मनसे भी कल्पना नहीं की जा
सकती है । सज्जन ही अनुभव करें, यदि कण्टकादिसे होनेवाले दुःखोंमें
-लेशमात्र भी सुखका संसर्ग हो । और स्वर्गादि सुखोंमें भी बहुल-