आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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तद्धानाय "नान्यत् सत्" इत्यादि ।
ततः केवल आत्मा प्रकाशते, यमाश्रित्याद्वैतमतोपसंहारः ।
तत्प्रतिपादनार्थम् 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह"
इति । तद्धानार्थम् "नाद्वैतं नापि द्वैतम्" इत्यादि । ततः
समस्तसंस्काराभिभवात् केवलोऽपि न विकल्प्यते, यमाश्रित्य
चरमवेदान्तोपसंहारः । तत्प्रतिपादनार्थम् "न पश्यतीत्याहु-
उत्पन्न करनेवाली प्रकृति है तथा पुरुष उस प्रकृतिसे परे निर्लेप एव
कूटस्थ नित्य है' इस अर्थका प्रतिपादन करनेवाली 'वेदाहमेतं पुरुषं
महान्तमादित्यवर्णं तमस परस्तात्' इत्यादि श्रुति है। यहाँ 'तमस'
का अर्थ है 'प्रकृतिसे' । उक्त मतके निषेधके लिये "नान्यत् सत्"
इत्यादि श्रुति वाक्य है । अर्थात् प्रकृति पुरुषविवेकावस्था भी हेय ही
है । क्योंकि 'प्रकृति से भिन्न पुरुष है" इस भेदज्ञानमे प्रतियोगि-
रूपमें प्रकृति आदि भी भासित होती है, जब कि "नान्यत् सत्" इत्यादि
श्रुतिके अनुसार आत्माकी उपासनावस्थामें किसी अन्यकी सत्ताका भान
अभिप्रेत नहीं है ।
उसके बाद प्रकृति विविक्तत्वरूप विशेषणका भी परित्याग कर केवल
आत्मा ही स्वरूपत भासित होता है । जिसका आश्रयण कर "एकमेवा
द्वितीयम् ब्रह्म" इस अद्वैतमतका उपसहार होता है । इस केवल
आत्माके प्रतिपादनका मूल "न पश्यतीत्याहु एकी भवति, न जिघ्रती-
त्याहु एकीभवति' इत्यादि श्रुतिवाक्य है । इस अवस्थाके भी त्यागके
लिए "नाद्वैतं भवति नापि द्वैतम्' इत्यादि श्रुतिवचन है । क्योंकि
इसमे भी आत्माको अद्रष्टा आदि कहा है, जो न्यायविरुद्ध है । तथा
इसमे भी उपासनाकालमें द्वैताद्वैतका विचार वर्तमान रहता है, जब कि
"नाद्वैतं नापि द्वैतम्" इत्यादि श्रुतिको द्वैताद्वैत विचारसे रहित मनसे
केवल आत्माका साक्षात्कार अभिप्रेत है ।
इसके बाद ध्यान प्रकर्षकी चरम सीमा पर पहुँचे हुए शुद्धान
योगीको सम्पूर्ण संस्कारोंका अभिभव हो जानेके कारण अर्थात् वासना
सहित मिथ्याज्ञानका उन्मूलन हो जानेसे केवल आत्माका भी सविकल्पक
भान नहीं होता है । अर्थात् सभी विशेषणोंसे रहित केवल आत्माका