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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

३९६ आत्मतत्त्वविवेके
नापि तृतीयः, तुल्ययोगक्षेमयोरविशेषाद् व्यभिचार-
शङ्कानापादकत्वाच्च ।
चतुर्थस्तु स्यात् । सोऽपि न शरीरान्तर्भूतवृत्तिः, चेष्टमान-
शरीरहेतुकस्यापि कस्यचिदचेतनपूर्वकत्वप्रसङ्गात् । न चेद-
मिष्टम्, चेष्टाचेतनयोरविनाभावभङ्गप्रसङ्गात् । नापि सहवृत्तिः,
साधनसहवृत्तिरूप तृतीयपक्ष भी नहीं हो सकता । क्योंकि उपाधि
को साधनसमनियत माननेपर दोनोंके तुल्ययोगक्षेम होनेके कारण
साधन और उपाधिमे कोई विशेषता नहीं होगी । ऐसी स्थितिमें कार्यत्व-
हेतुसे सकर्तृकत्वका अनुमान किया जाय या तुम्हारेद्वारा उद्भावित
साधनसमनियत उपाधिसे सकर्तृकत्वका अनुमान किया जाय, इसमें
कोई अन्तर नहीं है। क्योंकि दोनों ही दशाओंमे क्षित्यादिके प्रति
कर्त्ता (ईश्वर) की सिद्धि हो जाती है । एव, इस प्रकारके साधन
समनियत उपाधिकेद्वारा व्यभिचार शङ्काकी उत्पत्ति नहीं होनेके कारण
वह उपाधि ही नहीं हो सकता। क्योकि जो साध्यका व्यापक और
साधनका अव्यापक होता है, वही व्यभिचारशङ्काका उत्पादक होनेके
कारण उपाधि कहाता है ।
साधनान्तर्वृत्ति (साधनव्याप्य) रूप चतुर्थपक्ष तो होगा, किन्तु वह
उपाधि भी शरीरिकर्तृकत्वकी अपेक्षा न्यूनवृत्ति कुलालकर्तृकत्व आदि
हो तो उस कुलालकर्तृकत्व उपाधिको चेतनकर्तृकत्वरूप साध्यका व्यापक
होना होगा । ऐसी स्थितिमे व्यापकका अभाव होनेसे व्याप्यका भी
अभाव हो जाता है, अतः जहाँ कुलालकर्तृकत्वरूप साध्यव्यापकका
अभाव होगा, जैसे पटादिकार्यमे, वहाँ चेतनकर्तृकत्वरूप साध्यका भी
अभाव होने लगेगा । यद्यपि वह पटादिकार्य कुलालकर्तृक न होते
हुए भी चेष्टायुक्त शरीरसे ही उत्पन्न होता है, अत वह वस्तुत चेतनकर्ता
से उत्पन्न होता ही है । यहाँ कुलालकर्तृकत्वका अभाव होनेके कारण
पटादिमे जो अचेतनकर्तृकत्वका (चेतनकर्तृकत्वाभावका) प्रसङ्ग
दिया गया है, उसमे इष्टापत्ति नहीं कह सकते । क्योंकि तब चेष्टा
और चेतनमें परस्पर जो अविनाभाव सम्बन्ध (व्याप्यव्यापकभाव) है,

अनुपलम्भवादः ३९७
देहस्यानुपाधित्वे तस्याप्यनुपाधित्वात्, तयोस्तुल्ययोगक्षेम-
स्यात् । अतथाभावे वा सहवृत्तित्वनियमानुपपत्तेः ।
शरीरस्य च नोपाधित्वम्, कत्र्तृव्यापकत्वात् । तत्कार्य्य-
त्वस्योपाधेर्विद्यमानत्वात् । नाप्यायतनतया तथाभावो,
भोगोपाधित्वात् । नाप्युपकरणप्रापकतया, साक्षात् प्रयत्ना-
नधिष्ठेयतोपाधित्वात् । अन्यथापि तत्प्राप्तेरिति ।
यदि यह उपाधि शरीरिकर्तृकत्वसे न्यूनवृत्ति न हो, किन्तु शरीरसह-
वृत्ति हो तो वह भी नहीं हो सकता है । क्योंकि देहके उपाधि नहीं
होनेके कारण उसका सहवृत्ति भी उपाधि नहीं हो सकेगा । कारण, देह
और यह उपाधि दोनों ही तुल्ययोगक्षेम हैं । यदि वे तुल्ययोगक्षेम न
हों तो उन दोनोंमे सहवृत्तिका नियम नहीं रह जायगा ।
उक्त आपत्तिके भयसे यदि कहो कि—शरीरघटित शरीरजन्यत्व ही
उपाधि होगा—तो वैसा नहीं हो सकता है । क्योकि शरीरजन्यत्व
सकर्तृकत्वरूप साध्यका व्यापक नहीं है । कारण सभी सकर्तृक शरीर-
जन्य ही नहीं होता, जैसे वृक्षादिक ही । यदि कहो कि—कुलाल आदि
कर्ता शरीरसापेक्ष ही घटादि-कार्य करता हुआ पाया जाता है, अतः
अवश्य ही सभी सकर्तृक शरीरजन्य होंगे—तो यह भी नहीं हो सकता ।
क्योंकि शरीरसापेक्षतामे भी शरीरकार्यत्वरूप उपाधि विद्यमान है ।
अर्थात् उसी कार्यके लिये कर्ताको शरीरकी अपेक्षा है, जो कार्य शरीरसे
उत्पन्न होता है । वृक्ष अंकुर आदि कार्य तो शरीरसे उत्पन्न होता नहीं,
अत उसके कर्ता (ईश्वर) को शरीरकी अपेक्षा नहीं है ।
एवं ईश्वर भोगायतनके रूपमे शरीरकी अपेक्षा नहीं करता, क्योंकि
वैसा करनेमे भोग उपाधि है । अर्थात् ईश्वरमें भोग ही नहीं होता है
कि भोगायतन (भोगका माध्यम) रूपमे वह शरीरकी अपेक्षा करेगा ।
उपकरणोंकी प्राप्ति करानेके लिये भी ईश्वरको शरीरकी अपेक्षा नहीं
है । क्योंकि वैसा वहीं होता है, जहाँका उपकरण साक्षात् कर्ताके
प्रयत्नका विषय नहीं होता । जैसे, कुलाल शरीरके बिना दण्डचक्रादिका
सञ्चालन नहीं कर सकता और घटकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है । किन्तु
ईश्वर तो शरीररूपमाध्यमके बिना ही सीधे ही अपने प्रयत्नसे पर-

३९८ आत्मतत्त्वविवेके
नाप्यधिकवृत्तिः, शरीरविनाकृतस्य कर्तुः स्वयमनभ्युप-
गमात् । अस्तु पाक्षिकोऽभ्युपगमः । तेन न तत्कार्यत्वमात्रात्
कर्तृमत्त्वसिद्धिः, शङ्कितोपाधित्वात् । न चोपाधेरेव तत्सिद्धिः,
तस्य स्वयं सन्दिग्धासिद्धत्वादिति चेत्, न, उभयथाऽप्यशरी-
रिकर्तृव्यवस्थातिनियमात् ।
माणुओंमे गति उत्पन्न कर सकता है और तदनन्तर पृथिवी जलादिकी
उत्पत्ति कर सकता है ।
शरीरकी अपेक्षा अधिक सीमामे रहनेवाला भी उपाधि नहीं हो
सकता । अर्थात् जो कार्य शरीरकर्तृक नहीं है उसमे रहनेवाला धर्म
भी उपाधि नहीं हो सकता । क्योकि तत्र शरीरके बिना भी कर्तृत्व
सिद्ध हो जायगा जो तुम्हारे लिए अपसिद्धान्त है । इसका यदि यह
समाधान करो कि—शरीररहित कर्तृत्वरूप शरीराधिकवृत्ति उपाधिका
निश्चयात्मक अभ्युपगम होनेपर ही निरीश्वरवादीके लिये अपसिद्धान्त
होता, पर वैसा नहीं है, किन्तु उक्त उपाधिका पाक्षिक (सन्देहात्मक)
अभ्युपगम है । अत कार्यत्व हेतुमात्रसे सकर्तृकत्वकी सिद्धि नहीं
होगी क्योंकि वहाँ शङ्कितोपाधि है अर्थात् सोपाधिकत्वकी आशङ्कासे
हेतुमें व्यभिचारकी आशङ्का हो जाती है और व्याप्तिज्ञानका प्रतिबन्ध
होकर अनुमिति भी रुक जाती है । अत मेरे लिये अपसिद्धान्त नहीं
होता है । यहाँ नैयायिक यह नहीं कह सकता कि-‘शरीराधिकवृत्ति उस
उपाधिके सकर्तृकत्वरूप साध्यका व्यापक होनेके साथ साथ व्याप्य भी
होनेके कारण उस उपाधिसे ही सकर्तृकत्वरूप साध्यकी सिद्धि हो
जायगी’ क्योंकि उक्त उपाधि स्वयं ही सन्दिग्धासिद्ध है । अर्थात्
न्यायमतमें उसका उपाधित्व ही सन्दिग्ध है । अथवा उसमें सकर्तृकत्व
रूप साध्यका व्याप्यत्व ही असिद्ध है । अतः उपाधिबलसे न्यायमतमें
सकर्तृकत्वकी सिद्धि नहीं की जा सकती है—तो ऐसा समाधान नहीं
कर सकते हो । क्योंकि शरीराधिकवृत्ति उपाधि हो या न हो, दोनों
ही दशाओंमे अशरीरी कर्त्ताकी सिद्धि हो जायगी । अर्थात् यदि
शरीरातिरिक्तवृत्ति उपाधि हो तो उस उपाधिके बलसे ही अशरीरी कर्त्ता
(ईश्वर) की सिद्धि हो जाती है । यदि उक्त उपाधि न हो तो उपाधि

[Header] अनुपलब्धवादः ३९९

किन्तु कथञ्चिदुपाधिमादाय स व्यवतिष्ठताम् । यद्वा
कार्यत्वमेवेति सन्देहः परिशिष्यते, गत्यन्तराभावादिति सोऽपि
निवार्यते । न तावद् देहव्यतिरेकेऽनित्यज्ञानसम्भवः,
तयो कार्यकारणभावनियमात् । ततो नित्यं भवेत् ततः
सर्वविषयं च । नियतविषयताया अनित्यत्वेन व्यापनात् ।
विषयनियमस्य सामग्रीशक्तिसमवधानाधीनतया नित्यात्
तस्याः स्वव्याप्यमुपादाय निवर्तमानाया अनित्ये विश्रामात् ।


रहित होनेके कारण कार्यत्व-हेतुसे ही क्षित्यादिके प्रति अशरीरी कर्त्ता
सिद्ध हो जाता है ।
अब यहाँपर केवल यही सन्देह बच जाता है कि उक्त अशरीरि-
कर्तृत्व कथञ्चित् अर्थात् शरीराधिकवृत्ति उपाधिके बलको लेकर सिद्ध
होगा या कार्यत्व हेतुको लेकर सिद्ध होगा । इन दोके अलावे अश-
रीरिकर्तृत्वसिद्धिके लिये कोई तीसरी गति नहीं है । अत इस
सन्देहका भी अब निवारण किया जा रहा है ।
जैसे—यदि क्षित्यादिका कर्त्ता शरीररहित है तो उसका ज्ञान अनित्य
नहीं हो सकता है । क्योंकि अनित्यज्ञान और देहमें कार्यकारणभावका
नियम होनेसे देहरूपकारणके अभावमें अनित्यज्ञानका भी अभाव हो
जायगा । इसलिये उसका ज्ञान नित्य होगा और सर्वविषयक भी
होगा । क्योंकि नियतविषयता अनित्यत्वसे व्याप्त है । अर्थात् अनित्य
ज्ञान ही निर्धारित (सीमित) विषयक होता है । नित्यज्ञान तो अनियत-
विषयक होनेसे सर्वविषयक ही होगा । कारण, ज्ञानमे विषयविशेषका
नियमन ज्ञानसामग्रीशक्तिकी उपस्थितिके अधीन है । अत नित्यज्ञानसे
स्वयं निवृत्त होती हुई ज्ञानोत्पादक सामग्रीशक्ति अपने व्याप्यभूत
विषयनियमको भी निवृत्त करती हुई अनित्यज्ञानमें ही व्यवस्थित होती
है । अर्थात् नित्यज्ञानमे सामग्रीकी अधीनता नहीं रहनेसे विषयका
नियम भी नहीं रहता । प्रत्युत अनित्यज्ञान ही सामग्रीके अधीन उत्पन्न
होता है और नियतविषयक होता है । अत नित्यज्ञान सर्वविषयक
ही होगा ।

४००आत्मतत्त्वविवेके

सर्वगोचरे च ज्ञाने चिकीर्षाप्रयत्नयोरपि तथाभावः,
तदेकविषयत्वात्तयोः । तथा च कश्चिदुपाधिमादायाशरीर-
पूर्वकमपि किञ्चिदेव कार्यं कर्तृपूर्वकं भविष्यतीति शङ्कापिशा-
च्याः क्कावकाशः ।
एवमन्यत्राप्यनया दिशा उपाधिशङ्का निराकरणीयेति
निरुपाधिसम्बन्धसिद्धिः । विपक्षसम्भवे च साधनप्रयुक्तसाध्य-
एव ज्ञानके सर्वविषयक होनेपर चिकीर्षा और प्रयत्न भी सर्वविषयक
होंगे । क्योंकि ज्ञानका जो विषय होता है, वही चिकीर्षा और प्रयत्न-
का भी विषय होता है । अर्थात् यद्विषयक ज्ञान होता है, तद्विषयक
ही चिकीर्षा और प्रयत्न भी होते हैं । अतः सर्वविषयक नित्यज्ञान-
चिकीर्षा तथा प्रयत्नवाला ईश्वररूप अशरीरी कर्त्ता सिद्ध हो जाता है ।
इस तरह—‘किसी शङ्कित उपाधिको लेकर शरीरके बिना भी उत्पन्न
होनेवाला कुछ ही कार्य कर्तृजन्य होगा न कि सभी कार्य’ इस शङ्का
पिशाचीको भी कहा मौका है ? अर्थात् उपाधिकी आशङ्का ‘अशरीर
पूर्वक भी कुछ ही कार्य सकर्तृक होगा’ इस शङ्काका आपादन
नहीं कर सकेगी । क्योंकि बिना शरीरके भी कर्त्ता सिद्ध हो
जानेपर पूर्वोक्त युक्तिसे उस अशरीरी कर्ताके ज्ञान इच्छा और प्रयत्न
नित्य तथा सर्वविषयक मानने होंगे । ऐसी स्थितिमे जिस कार्यमें तुम
अकर्तृकत्वकी आशङ्का करते हो, उसका भी उपादानकारण अवश्य ही
उस नित्य तथा सर्वविषयक ज्ञान इच्छा और प्रयत्नका विषय होगा ।
तथा उपादानविषयक अपरोक्षज्ञान चिकीर्षा कृतिमत्त्व ही तो कर्तृत्व
है । अतः जिस कार्यमे तुम अकर्तृकत्वकी आशङ्का कर रहे हो उसमे भी
अकर्तृकत्वकी आशङ्का कैसे हो सकेगी ? तात्पर्य यह है कि कोई भी कार्य
बिना कर्त्ताके नहीं हो सकेगा । अतः अशरीरिकर्तृक सभी क्षित्यादिकार्य
सकर्तृक सिद्ध होते हुए ईश्वररूप सर्वज्ञ कर्ताको उपस्थित करते हैं ।
इस प्रकार अन्य अनुमानोंमे भी इसी रीतिसे अर्थात् पूर्वोक्त चार
विकल्पोंके द्वारा उपाधिशङ्काका निवारण करना चाहिये । इस तरह
कार्यत्व और सकर्तृकत्वमे निरुपाधिसम्बन्धरूप व्याप्तिकी सिद्धि हो
जाती है ।

अनुपलब्धवादः ४०१
सद्भावसिद्धौ साध्याभावप्रयुक्तसाधनाभावलक्षणस्य व्यतिरेक-
स्यापि सिद्धेः न तदर्थं पृथगपेक्षेति ।
द्वितीयेऽपि श्रवणसम्पुटमवधाय कलकलस्त्यज्यताम् ।
तथा हि दण्डादिषूदासीनेषु दृश्योऽदृश्यो वा (नाना) कारक-
व्यापाराविनिर्भागवृत्तिश्चेतनो निवृत्तो न वेति त्वमेव प्रष्टव्यः ।
न चेत्, कुतः कारणान्युदासते ? निवृत्तश्चेत्, कथमदृश्य-
व्यतिरेकसंशयः ?
तथापि यादृशस्यान्वयस्तादृशस्य व्यतिरेकोऽपि उपयुज्यत
एव जहाँ साध्यका विपक्ष ( निश्चितसाध्याभाववान् ) सम्भव है,
यहाँ, जैसे पक्षमे साधन ( हेतु ) के रहनेके कारण साध्यकी सत्ता सिद्ध
होती है, वैसे ही विपक्षमे साध्यका अभाव होनेसे साधनाभावरूप
व्यतिरेक भी स्वतः सिद्ध हो जाता है । उसकेलिये पृथक् यत्नकी अपेक्षा
नहीं होती है । अर्थात् आकाशादिमें सत्त्व

४०२ आत्मतत्त्वविवेके
इति चेत्, कोऽय विप्रतिपद्यते ? कारकप्रयोक्तुरुभयत्रापि तुल्य-
त्वात् । देही तादृश इति चेत्, कोऽस्यार्थः ? किं देह-(देह-
व्यापारसम्पादन-) द्वारेण सर्वाणि कारकाणि प्रयुङ्क्ते चेतनः ?
आहो देहं प्रयुञ्जान एवेति ? न पूर्वः, देहस्यापि कारकतया
देहान्तरप्रयोज्यतायामनवस्थानात् । न द्वितीयः, विशशकलचा-
लनादौ व्यभिचारात् ।
देहं धारयन्निति चेत्, सोऽयं देहो धार्यः किं कारकतया
तत्कारकान्तरप्रयोगाऽर्थम् ? अथ स्वकर्मोपात्ततामात्रेण ? प्रथमे
उसी ढङ्गके कर्त्ताका व्यतिरेकग्रह भी व्याप्तिज्ञानमें उपयोगी होता है—
तो इसमें किसको विप्रतिपत्ति है ? क्योंकि कारकोंको कार्यमें प्रयुक्त
करनेवाला कर्त्ता दोनों जगह ( अन्वय-व्यतिरेक दोनोंमें ) समान है ।
यदि कहो कि—वह देही कर्ता है, जिसका कार्यके साथ अन्वय
गृहीत है, अत व्याप्तिज्ञानकेलिये उसीका व्यतिरेकग्रह भी उपयोगी
होगा। इसलिये उक्त अन्वय व्यतिरेकद्वारा शरीरी चेतन ही कर्त्ता
सिद्ध होता है अशरीरी नहीं—तो शरीरीको कर्ता माननेका क्या
अभिप्राय है ? क्या देहके द्वारा ही चेतन सभी कारकोंको प्रयुक्त करता
है सीधे नहीं ? अथवा देहको प्रयुक्त करता हुआ ही वह कारकोंको प्रयुक्त
करता है ? इसमें प्रथम पक्ष नहीं हो सकता । क्योंकि जैसे, अन्य कारकों
को प्रयुक्त करनेमें देह द्वारभूत है वैसे देह भी कारक ही है, अत उसे
भी प्रयुक्त करनेके लिये प्रयोजकके रूपमे दूसरी देहकी अपेक्षा होनेसे
अनवस्थादोष हो जायेगा ।
“देहको प्रयुक्त ( सञ्चालित ) करता हुआ ही अन्यकारकों को प्रयुक्त
करता है’ यह द्वितीयपक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि कमलनालके
टुकडेको जादूगर अपनी देहको चालित किये बिना ही ध्यानमात्रसे
सञ्चालित कर देता है। अत इस द्वितीयपक्षमें व्यभिचार दोष आ
जाता है ।
यदि कहो कि—देहको धारण करता हुआ कर्ता फलोत्पादनमें सभी
कारकोंको प्रयुक्त करता है इसी अभि[प्राय]... है ...

अनुपलम्भवादः ४०३
न विरोधः । देहस्य क्वचित् कार्यकारकतयाऽधिष्ठाननिय-
मात् । यत्र तु न तत् कारकं तत्रापि तदधिष्ठेयमिति कश्चेत-
नोऽभिदध्यात् ?
द्वितीयेऽपि यः साक्षादधिष्ठातुमशक्तः स साक्षादधिष्ठेयमु-
पादाय तत् प्रयुञ्जीत, न त्वेकस्य साक्षादधिष्ठानायोग्यमन्य-
स्यापि तथेति नियमः, देह एव व्यभिचारात् । तृतीये त्वजागल-
स्तनकल्पः कायो नोपयुक्तांशविवेचने स्वं निवेशयति, यथा
धूममात्रं प्रति तार्णदहनान्वयव्यतिरेकयोरालोकवत्तेति ।
उसके कारक होनेके नाते करता है ? या उससे अन्यकारकोंको प्रयुक्त
करनेके लिये देह-धारण आवश्यक है ? अथवा निजकर्माधीन प्राप्त होने-
मात्रसे कर्ताकेलिये शरीर धारण आवश्यक है ? इनमें प्रथमपक्षमें
मुझे कोई विरोध नहीं है । क्योंकि कहीं कार्यके प्रति देह भी कारक
होता है, अतः वहाँ उसका कर्ताद्वारा अधिष्ठित होना अपेक्षित है ।
जहाँ तो वह (देह) कारक नहीं होता, वहाँ भी वह कर्ताद्वारा अधिष्ठेय
होगा, इसे कौन चेतन व्यक्ति कह सकता है ।
द्वितीयपक्षमे भी जो (मनुष्यादि) साक्षात् (सीधे) कारकोंको
अधिष्ठित करनेमे असमर्थ है, वह सीधे अधिष्ठित किये जाने योग्य देहको
लेकर उन कारकोंको फलोत्पादनके लिये प्रयुक्त करेगा । ऐसा नियम
नहीं है कि जो (कारकसमूह) एक (मनुष्य) के द्वारा साक्षात्
अधिष्ठानके योग्य नहीं है, वह दूसरे (सर्वशक्तिमान् ईश्वर) के द्वारा
भी अधिष्ठेय नहीं है । क्योंकि देहमें ही व्यभिचार हो जाता है।
जैसे चैत्रदेह मैत्रके द्वारा अधिष्ठेय नहीं है, फिर भी वह चैत्रके द्वारा
अधिष्ठेय होता है ।
तृतीयपक्षमें तो बकरीके गलेमें लटकते हुए स्तनके समान देह भी
अपनेको उपयोगिताकोटिके विचारमें नहीं रख सकता है । अर्थात्
कारकोंका व्यापार वैसे ही देहके बिना निरुपयोगी होता है, जैसे
धूममात्रके प्रति तृणजन्य अग्निके अन्वय-व्यतिरेकमें आलोककी सत्ता
उपयोगिताके विचारमें अनपेक्षित है । अर्थात् कारक व्यापारमात्रके
प्रति देह और धूममात्रके प्रति आलोक समानरूपसे अन्यथासिद्ध है ।

४०४ आत्मतत्त्वविवेके
यदि चाकारकस्याप्यतत्प्रयोज ( गद्वार ) कस्यापि १ अवश्य-
मपेक्षा स्यात्, य एव कुलालकायवान् घटस्य कर्ता स एव करभ-
शरीरवानपि दण्डादीन् प्रयुञ्जीत। न खलु स्वकर्मोपात्ततामात्रेण
करभकुम्भकारशरीरयोः कश्चिद् विशेषः। कार्यविशेषे कायविशेषो-
ऽनुपयोगोऽप्यपेक्षणीय इति चेत्, तत्र कार्येऽनुपयुक्तश्चावश्यापेक्षणी-
यश्चेति व्याघातः। अव्याघाते वा कुम्भे कर्तव्ये करभशरीरमप्य-
वश्यमपेक्षणीयमविशेषादिति।
तस्मात् सन्देशवदयःपिण्डवत् २ कारकस्तत्प्रयोजकतयैव ३
शरीराधिष्ठाननियमो न तु शरीरत्वेनैव। न च शरीरस्य सर्वत्र
यदि कारक न होते हुएकी भी या कारकोंका प्रवर्तक न होते हुएकी भी
अवश्य अपेक्षा हो तो जो आत्मा कुलालशरीरधारी होकर घटका कर्त्ता
होता है, वही करभ (हस्तिशावक) शरीरधारी होकर भी दण्डचक्रादि-
का प्रयोजक होवे। क्योंकि स्वकर्मोपार्त्ततामात्रकी दृष्टिसे करभशरीर
और कुम्भकारशरीरमें कोई अन्तर नहीं है।
यदि कहो कि—कार्यविशेषमे शरीरविशेष अनुपयोगी होते हुए भी
अपेक्षणीय है—तो कार्यमे अनुपयुक्त भी है और अपेक्षणीय भी है,
यह कथन वदतोव्याघात है। यदि व्याघातदोष न हो तो घट निर्माण
करनेमे करभ शरीर भी अवश्य अपेक्षणीय होना चाहिये। क्योंकि
अनुपयुक्तताकी दृष्टिसे कुम्भकारशरीर और करभशरीरमे कोई अन्तर
नहीं है।
इसलिये सँडसीके समान या लोह पिण्डके समान कारकके रूपमे
या कारकव्यापारके आश्रयके रूपमे ही शरीरका अधिष्ठान आवश्यक है,
न कि शरीरके ही रूपमें। अर्थात् जिस कार्यमें जो शरीर कारक या
प्रयोजक होता है, उसी कार्यमे शरीर आत्माद्वारा अधिष्ठित होगा।
यही नियम है, न कि शरीर होनेमात्रसे आत्माद्वारा अधिष्ठित होना
१. कस्यापि देहस्येति २ पु० पा० २. अय पिण्डे इति १ पु० पा०
३ कारकप्रयोजकतयैव इति २ पु० पा०

कार्ये कारकत्वं तत्प्रयोजकत्वं वेति। एवं तर्हि न प्रतिनियत-
देहाधिष्ठातृसिद्धिः, अङ्कुरादिकारकाधिष्ठात्राऽपि तत्सिद्धेरिति
चेत्, न, वादान्तरत्वात्।
यदापि तत्प्रस्तावः, तदापि न कार्यमात्रेण कारकाधिष्ठान-
मात्रेण वा तदनुमानम्, ततः कर्तृमात्रसिद्धेः। किन्तु हर्षभय-
शोकस्मितादिलिङ्गैस्तानुन्नीय तैर्भोक्तुरनुमानमिति न किञ्चिदेतत्।
तृतीयेऽपीर्ष्याकषाये चक्षुषी निमील्य न्यायानुसारः श्रूयताम्।
इह जगति नास्त्येव तत् कार्यं नाम, यत् कारकचक्रमवधीर्यात्मा-
आवश्यक है। और यह भी नियम नहीं है कि सभी क्षित्यङ्कुरादि
कार्यमें शरीर कारण या प्रयोजक होवे ही।
यदि कहो कि—ऐसा होनेपर अलग अलग देहोंके अधिष्ठाताकी भी
सिद्धि नहीं हो सकेगी। क्योंकि अङ्कुरादि कारकोंके अधिष्ठाता (ईश्वर)
से घट आदिकी सिद्धि हो जायगी। अर्थात् कुम्भकार आदिकी क्या
आवश्यकता है? ईश्वरसे ही घटादिकार्यका निर्वाह हो जायगा—तो
ऐसा नहीं कह सकते हो। क्योंकि तब यह दूसरा विचार प्रस्तुत हो
गया। अर्थात् मेरा ईश्वर तो सिद्ध ही हो गया और उसे ही सिद्ध करने
के लिये मैं प्रवृत्त हूँ। अतः अभी कुम्भकारको कर्त्ता सिद्ध करनेकी
क्या आवश्यकता है?
फिर भी यदि कुलालको भी कर्त्ता सिद्ध करनेका विचार प्रस्तुत करो तो
भी कार्यमात्रसे या कारकोंके अधिष्ठानमात्रसे कुलालनामधारीका अनुमान
नहीं होता है। क्योंकि उससे तो कर्त्तामात्र सिद्ध होता है। किन्तु
हर्ष, भय, शोक, स्मित आदिके सूचक लिङ्गोंसे हर्षादिका अनुमानकर
पुनः उनके आधारके रूपमें पृथक् पृथक् कुलाल आदिके आत्माकी सिद्धि
होती है। अतः यह दूसरा प्रस्ताव भी कुछ नहीं है।
"विपक्षमें बाधकका होना ही व्याप्ति है" इस तृतीयपक्षमें भी
ईर्ष्यासे कलुषित दृष्टिको हटाकर न्यायका अनुमोदन सुनो। इस संसार-
में कोई भी यह कार्य नहीं है, जो कारकचक्रकी अवहेलना कर अपने

४०६ आत्मतत्त्वविवेके
नचामादयेदित्यविवादम् । तच्च सर्वं चेतनोपहितमर्यादम् ।
अन्यथा तल्लक्षणव्यवस्थानुपपत्तेः ।
तथाहि, आधेयकारकोपहितमर्यादमधिकरणस्य रूपम्,
आधारत्वात् । अपनेयापगन्तृकारकोपहितं च स्वरूपमपादानस्य,
तदवधित्वात् । करणीभूतकर्मोपहितं च रूपं सम्प्रदानस्य,
तदभिप्रेयत्वात् । करणोपहितं च रूपं कर्मणः, तद्व्याप्यत्वात् ।
कर्तृपहितं च रूपं करणस्य, साक्षात् तद्व्यापारविषयत्वात् ।
समस्तकारकोपहितं च रूपं कर्तुः, तत्प्रयोजकत्वात् ।
ज्ञानचिकीर्षाप्रयत्नाधारत्वव्यवस्थितेश्च न चक्रकेतरेतराश्रय-
स्वरूपको प्राप्त कर सके । यह निर्विवाद है । और उन सभी कार्योंकी
मर्यादा अर्थात् स्वरूपव्यवस्था साक्षात् या परम्परया चेतनसे उपहित है ।
अन्यथा उनके लक्षणकी व्यवस्था ही नहीं हो सकेगी । जैसे—कर्ता
और कर्मरूप आधेयभूत-कारकोंसे उपहित है मर्यादा जिसकी, उसे
अधिकरणकारक कहते हैं । क्योंकि यह आधारभूत है । अर्थात्
"कर्तृकर्मव्यवहितामसाक्षाद् धारयन् क्रियाम् । उपकुर्वन् क्रियासिद्धौ
शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम् ।" इस वचनके अनुसार कर्ता और कर्मके द्वारा
वह क्रियाका आश्रय है । अपनेय ( त्याज्य ) भूत वृक्षादि एव अपगन्तृ-
भूत ( छोड़नेवाले ) सार्थादिकारकोंसे उपहित अपादानकारकका स्वरूप
है । क्योंकि त्यागघटकीभूत विभागका यह अवधि है । अर्थात् यहाँ
भी मन कर्त्ता है और उसकी क्रियाका सम्बन्ध अवधिके रूपमें वर्तमान
वृक्षरूप अपादान कारकसे है । कारणरूपताका प्राप्त हुए कर्मसे उपहित
सम्प्रदानकारकका स्वरूप है । क्योंकि दाताका गौ आदि कर्मभूत द्रव्य-
द्रव्यके द्वारा ही साधु ब्राह्मणादि अभिप्रेत हैं । अर्थात् करणीभूत कर्मसे
उपहित सम्प्रदान होता है । कर्म करणसे उपहित होता है, क्योंकि वह
करणव्यापारका विषय होता है । तथा करणका स्वरूप साक्षात् कर्तासे
उपहित होता है । क्योंकि वह साक्षात् कर्ताके व्यापारका विषय होता
है । एव कर्त्ताका स्वरूप समस्त कारकोंसे उपहित ( निरूपणीय ) होता
है । क्योंकि सम्पूर्ण कारकोका प्रयोजक है ।

दोषः। एवं सति कर्तृव्यावृत्तेस्तदुपहितसीमसमस्तकारककार्यो-
त्पत्तिप्रसङ्ग इति स्थूलः प्रमादः।
भवेदेवं, यदि कर्त्रा कारकमात्रस्य व्याप्तिः स्यात्, सैव तु
कुत इति चेत्, कुतः पुनरव्याप्तिः ? न हि षड्भ्योऽन्यत् कर्तृनु-
पहितं कारकमस्ति, न चैषामेव कर्तृप्रधानशून्यं लक्षणमस्ति,
एकैकमपोद्य शेषतः कार्यसम्भावनायां सर्वोपोहसम्भावनाप्रसङ्गात् ।
यहाँ यह नहीं कह सकते कि—साक्षात् कर्तृव्यापारका विषय करण,
करणव्यापारका विषय कर्म, तथा कर्मका प्रयोजक वही कर्ता होता है,
अत चक्रकदोष आ जाता है। एव साक्षात् कर्तृव्यापारका विषय करण
होता है और उस करणका प्रयोजक वही कर्ता होता है, इस प्रकार
अन्योन्याश्रयदोष आ जाता है—क्योंकि उपादानविषयक ज्ञान, चिकीर्षा
और प्रयत्नका आधार होना ही कर्ताका स्वतन्त्र लक्षण होनेसे कर्तृलक्षण-
का निरूपण करणादिकोंके अधीन नहीं है। अतः चक्रक और अन्योन्या-
श्रयदोष नहीं होंगे।
ऐसी स्थितिमे यदि कर्ता न हो तो कर्तासे उपहित मर्यादावाले सम्पूर्ण-
कारकोंकी भी व्यावृत्ति हो जायगी और बिना कारकके ही कार्योंकी
उत्पत्तिका प्रसङ्ग होने लगेगा। यही सकर्तृकत्व और कार्यत्वमे व्याप्तिका
निश्चय करानेवाला विपक्ष बाधक तर्क है। अत कर्ताके बिना कार्यकी
उत्पत्ति माननेवाले पूर्वपक्षीका यह भारी प्रमाद है।
यदि कहो कि—उक्त प्रसङ्ग तब होता जब कि कर्ताके साथ कारक-
मात्रकी व्याप्ति होती, किन्तु वह व्याप्ति ही कैसे है ?—तो फिर अव्याप्ति
भी कैसे है ? क्योंकि कर्तासे उपहित स्वरूपवाले पूर्वोक्त छै कारकोंसे
भिन्न कर्तासे अनुपहित स्वरूपवाला कोई दूसरा कारक है नहीं कि वहीं
सकर्तृकत्व और कार्यत्वकी अव्याप्ति हो जायगी। यह भी नहीं
हो सकता कि—इन्हीं छै कारकोंके अन्तर्गत कुछ कारक कर्तृव्यापारके
अविषय होंगे और उन्हींसे क्षित्यङ्कुरादि कार्यकी उत्पत्ति उपपन्न हो
जायगी—क्योंकि एक एक कारकको छोड़कर भी यदि शेष कारकसे
कार्यकी संभावना की जाय तो उस न्यायसे सभी कारकोंको छोड़ देनेकी
सम्भावना होने लगेगी। एव सम्पूर्ण कारकविशेषोंकी निवृत्ति हो जाने

न च समस्तविशेषापोहे सामान्यस्थितिः, यतः षट्कारकव्यावृत्ता-
वपि कारकमात्रतः कार्यप्रत्याशा स्यात् । एकप्रवृत्तौ तु सर्वप्रवृत्ति-
रप्रत्यूहेति शृङ्खलाबन्धेन व्यवस्थितेः ।
अथ मतं तवैवेयं प्रक्रिया, यस्माकं तु कार्येणानुविहितभावा-
भावं चेतनमचेतनं वा कारणमुच्यते । सहतौ तु सर्वं स्वप्रधानम् ।
पर सामान्यरूपसे भी कारककी स्थिति नहीं रह पायगी, जिसके आधार
पर प्रसिद्ध छः कारकोंकी व्यावृत्ति हो जानेपर भी सामान्यकारकसे कार्य
की आशा की जाय । यदि सामान्य कारककी स्थितिके लिये किसी
एक कारककी प्रवृत्तिका आश्रय लो तो सभी कारकोंकी प्रवृत्ति निर्विघ्न
हो जायगी । क्योंकि कारकत्वधर्म सभी कारकोंमें समान है । इस
प्रकार कारकोंकी परस्पर बँधी हुई शृङ्खलासे विपक्षबाधककी व्यवस्था हो
जाती है ।
यदि मानो कि—उक्त सारी प्रक्रिया तुम्हारे (नैयायिकके) यहाँ ही
है हमारे (बौद्धके) यहाँ तो कार्यके साथ जिसका अन्वय-व्यतिरेक
बँधा हुआ है ऐसा चेतन या अचेतन ही कारण कहा जाता है । जहाँ
तो चेतन-अचेतनका समुदाय कारण होता है वहाँ सबकी अपनी-अपनी
प्रधानता होती है । ऐसा नहीं कि कोई कारक प्रधान (कर्त्ता) होता है
और कोई अप्रधान (अकर्ता) । अर्थात् “स्वव्यापारे च कर्तृत्वं सर्वत्रैवा-
स्ति कारके' इस वचनके अनुसार सभी कारक अपने-अपने व्यापारमें
स्वतन्त्र (कर्ता) हैं । उपादान (समवायि) और इतर (असमवायि
तथा निमित्त) इन तीनोंकी अपेक्षा क्वचित् है अर्थात् नियत नहीं है ।
अभिप्राय यह है कि कार्यकी उत्पत्तिमें सभी कारकोंके समवधानका कोई
नियम नहीं है । जहाँ समवधानके बिना कार्य नहीं होता, वहीं कर्त्ता
आदि कारकोंके समवधानका नियम होता है । तथा वहाँ भी सभी
अपने-अपने व्यापारमें प्रधान होते हैं । कोई प्रधान और कोई
अप्रधान नहीं होता । तथा कर्मत्व, करणत्व आदिका लक्षण भी उक्त
प्रकारका नहीं है । किन्तु व्यापारवान् होते हुए असाधारण कारणको
करण कहते हैं और अत्यन्त क्रियासे उत्पन्न फलशालीको कर्म कहते
हैं इत्यादि—तो ऐसा नहीं हो सकता । क्योंकि वैसा होनेपर बिना

अनुपलम्भवादः ४०९
उपादानेतरव्यवस्था तु कथञ्चिदिति चेत्, न, तथापि निरूपा-
दानत्वप्रसङ्गात् ।
जातिप्रतिनियतहेतुत्वेन तदवश्यमभ्युपेयम्, तस्य प्रमाण-
सिद्धतयाऽपह्नोतुमशक्यत्वादिति चेत्, न, उपादानमात्रस्य तद्धेतुत्वे
निमित्तवैचित्र्येऽप्येकजातीयत्वप्रसङ्गात् । निर्निमित्तं वा प्रसज्येत,
उपादानादेव तथाविधात्तदुपपत्तेः ।
उपादान कारणके भी कार्य होने लगेगा । अर्थात् कर्तृ विशेष और
कार्यविशेषमें अन्वयव्यतिरेकके द्वारा सामान्यतः कर्त्ता और कार्यमें
कार्यकारणभाव सिद्ध हो जाता है । यदि कर्त्ताके बिना भी कोई कार्य
हो तो उपादानकारणके बिना भी कार्य होने लगेगा ।
यदि कहो कि—पृथक् पृथक् जातिके कार्यके प्रति हेतुता नियत होने
के कारण अवश्य ही प्रत्येक कार्यका कोई उपादानकारण मानना होगा ।
क्योंकि प्रमाणद्वारा सिद्ध होनेके कारण उपादानकारणका अपलाप नहीं
किया जा सकता है । अर्थात् कार्य यदि बिना उपादानके होता तो
“पृथिवीजातिका कार्य पृथिवीजातिके समवायिकारण (उपादानकारण)
से ही उत्पन्न होता है” यह व्यवस्था नहीं होती । अतः इस व्यवस्थासे
ही सिद्ध होता है कि प्रत्येक कार्यका कोई उपादान अवश्य होता है—तो
ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि नियतजातिका कार्य उत्पन्न होनेमे
यदि उपादानमात्र प्रयोजक होता तो उपादान एक रहनेपर निमित्तकारण
के विचित्र होनेपर भी कार्यमें विचित्रता नहीं हो सकेगी, बल्कि
उसी जातिका कार्य उत्पन्न होने लगेगा । अर्थात् उपादानमात्रको कार्य-
का प्रयोजक माननेपर निमित्तकारण अकिञ्चित्कर हो जायगा और
दण्ड वेमा आदि निमित्तकी विचित्रता होनेपर भी घटपटादि कार्यों मे
विचित्रता नहीं हो सकेगी और उनमे एक जातीयत्वका प्रसङ्ग हो जायगा ।
यदि निमित्तगत विचित्रताके होनेपर भी उपादानगत विचित्रताको ही
कार्य वैचित्र्यका प्रयोजक मानो तो कार्यमात्र बिना निमित्तके ही
जायगा । क्योंकि उपादानगत वैजात्यसे ही विजातीय कार्यकी उपपत्ति
हो जायगी ।

४१० आत्मतत्त्वविवेके
न किञ्चिदेकमेकस्मात्, सामग्र्याः सर्वसम्भव इति चेत्, कुत
एतत् ? निमित्तसहितस्यैवोपादानस्य प्रत्यक्षानुपलम्भाभ्यां कार-
णत्वावधारणादिति चेत्, न, दृश्यमात्रविषयत्वात्तयोः। दृश्यत्व
तस्य कथञ्चिन्निरस्तमिति चेत्, न, चेतनेऽपि तथा किं न स्या-
दिति। तस्मादुपादाननिमित्तयोर्यथा परस्परसहितयोरेव कार्य-
शक्तिस्तथा चेतनाचेतनयोरपीत्येकनिवृत्तावितरनिवृत्तिप्रसङ्गः।
यदि कहो कि—कोई भी कार्य किसी एक कारणसे नहीं होता किन्तु
सामग्रीसे ही सब कार्य होता है। तथा कारणसामग्रीमे निमित्त भी
समाविष्ट है। अत कार्यमें निनिमित्तत्वका प्रसङ्ग न होगा—तो ऐसा
क्यों है ? यदि कहो कि—ऐसा इसलिये है कि अन्वय व्यतिरेकके
द्वारा निमित्तसहित ही उपादानमें कारणत्वका निश्चय होता है—तो
ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि अन्वयव्यतिरेकका विषय केवल दृश्य
ही निमित्त होगा। अर्थात् अन्वय व्यतिरेकके बलसे दृश्यनिमित्तका
ही उपादानके साथ साहित्य गृहीत होगा, न कि अदृश्य निमित्तका।
अत अदृश्य निमित्तकी दृष्टिसे कार्यमे निर्निमित्तत्वका प्रसङ्ग रह ही
जाता है।
यदि कहो कि—दृश्यमात्रमें अन्वय व्यतिरेक गृहीत होनेपर भी उसके
द्वारा कारणत्वका निश्चय करनेम दृश्यत्व अविवक्षित रहता है। अर्थात्
दृश्यविषयक अ वय व्यतिरेकग्रहसे दृश्य अदृश्य सभी निमित्तोंमें कारण
ताका निश्चय हो जायगा—तो यह नहीं कह सकते। क्योंकि तब
चेतन कर्ताके विषयमे भी दृश्यत्वकी अविवक्षा क्यों न हो ? अर्थात्
सामान्यत चेतनकर्ता और कार्यमें ही कार्यकारणभाव गृहीत होगा। यह
अनिवार्य नहीं है कि कार्यका उत्पादक दृश्य ही कर्ता होगा। अत
क्षित्यङ्कुरादि कार्यका दृश्य कर्ता नहीं होनेसे अदृश्य (ईश्वर) स्वत
सिद्ध हो जाता है।
इसलिए जैसे परस्पर सहित होनेपर ही उपादान और निमित्तमें
कार्य उत्पन्न करनेकी क्षमता होती है, वैसे ही चेतन और अचेतनके
परस्पर सहित होनेपर ही कार्यकी उत्पत्ति हो सकती है, यह भी मानना
पड़ेगा। अत क्षित्यादिकार्यके प्रति एक (चेतनकर्ता) की निवृत्ति

[header] अनुपलम्भवाद ४११

अपि च मृत्पिण्डदण्डादिषु स्वव्यापारे पारतन्त्र्यं तन्निय-
मेनोपलभ्यते । तदिदं दण्डादित्वमात्रानुबद्धं वा स्यात्,
अदृष्टविशेषोपग्रहानुबद्धं वा, अचैतन्यमात्रानुबन्धं वेति निपुणं
निरूपय।
तत्र न प्रथमः, वेमादीनां स्वातन्त्र्यप्रसङ्गात् । तेषां वेमादि-
त्वमात्रानुबद्धमिति चेत्, न, दण्डादीनां स्वातन्त्र्यप्रसङ्गात् । न
चैतत् कार्यविशेषनियतम्, गवाभ्याजनादौ दण्डादीना स्वातन्त्र्य-
प्रसङ्गात् ।
माननेपर इतर (अचेतन परमाणु आदि) की निवृत्तिका भी प्रसङ्ग
होने लगेगा।
परमाणु अदृष्ट आदिके अधिष्ठाताके रूपमें ईश्वरकी सिद्धि
एव, मट्टीका पिण्ड तथा दण्ड आदि कारण अपने व्यापारमें नियमतः
किसी अन्य (चेतन) के अधीन होते हैं, यह नियमपूर्वक देखा जाता है।
अर्थात् वे दूसरेसे अधिष्ठित होकर ही अपना व्यापार करते हैं। तो
क्या ऐसा दण्डत्वादि-जातिके कारण होता है ? अथवा भोक्ताके अदृष्ट-
विशेषसे उपगृहीत होनेके कारण दण्डादिका व्यापार पराधीन है ? या
उनकी अचेतनतामात्रके कारण ऐसा है ? इसे भी अच्छी तरह विचारो।
इनमें प्रथमपक्ष नहीं हो सकता है। क्योंकि दण्डत्वरूपसे यदि
पराधिष्ठेयता (पराधीनता) हो तो दण्डातिरिक्त वेमा आदिमें स्वातन्त्र्यका
प्रसङ्ग हो जायगा। अर्थात् वेमा आदिमें दण्डत्व जातिके नहीं रहनेसे
वेमा अपने व्यापारमें अधिष्ठाता चेतनकी अपेक्षा नहीं करेगा। यदि
उपकरणोंका व्यापार वेमत्वमात्रप्रयुक्त है, ऐसा मानो तो यह भी नहीं हो
सकता। क्योंकि तब वेमत्वधर्मसे रहित होनेके कारण दण्डादि अपने
व्यापारमें स्वतन्त्र होने लगेंगे। अर्थात् दण्डगत व्यापार चेतन
अधिष्ठाताके बिना अपने आप होने लगेगा। यह भी नहीं हो सकता
कि—दण्डादिकी परतन्त्रता घटादि कार्यविशेषसे ही नियत है। अर्थात्
घटादि बनानेमे ही दण्डादि अपने व्यापारमे पराधीन है—क्योंकि तब
गायके हाँकने आदिमें दण्ड स्वतन्त्र होने लगेगा।

४१२ आत्मतत्त्वविवेके

न द्वितीयः, तस्य जातिविशेषनियतत्वे घटार्थमपि तेषां कदा-
चित् स्वातन्त्र्यप्रसङ्गात् । तन्नियतत्वे स एवोच्यताम् । न च
घटपटशकटकटाहादिगतं दण्डवेमवासीसन्दंशादिगतं वा सामान्य-
विशेषमुपलभामहे । अस्त्यसौ यतः शरीरिकर्तृकत्वानुमानमिति
चेत्, न, घटत्वादेरेव तथाभावात् ।
अस्तु वा संस्थानविशेषः, न च स एवात्र निबन्धनम्,

दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता । अर्थात् यह कहना कि—दण्डादिमें
अदृष्टविशेषका सम्बन्ध होनेके कारण घटादि उत्पन्न करनेमें दण्डादिक
ही किसी चेतनसे अधिष्ठित होते हैं । क्षिति-जलादि उत्पन्न करनेमें
तो उनके कारण परमाणु आदि स्वतन्त्र ही हैं । क्योंकि उनमें उस
अदृष्टविशेषका सम्बन्ध नहीं रहता—ठीक नहीं है । क्योंकि वह
अदृष्टविशेषका उपग्रह यदि जातिविशेषसे नियत न हो तो पृथिवी
आदिके समान ही घटादिके लिये भी कभी दण्डादि स्वतन्त्र हो जायगा ।
अर्थात् वही कारण उसी कार्यमें कभी स्वतन्त्र रहेगा और कभी चेतना-
धिष्ठित होगा । यदि अदृष्टविशेषोपग्रह जातिविशेषसे नियत हो तो
उस जातिविशेषको ही बताओ । अर्थात् ऐसी कोई जाति नहीं है ।
क्योंकि दण्ड आदि एक-एकमें रहनेवाली जाति व्यभिचरित है तथा
घट, पट, शकट ( गाड़ी ), कटाह ( कड़ाही ) आदि कार्योंमें एव दण्ड,
वेमा, वासी (बँसुला), सन्दश (सँड़सी) आदि कारणोंमें समान रूपसे
रहनेवाली किसी विशेषजातिकी उपलब्धि नहीं होती है ।
यदि कहो कि—यह विशेष जाति वही है, जिससे शरीरिकर्तृकत्व
का अनुमान होता है । अर्थात् शरीरिकर्तृकत्वका व्याप्यभूत जाति
अवश्य है—तो यह भी नहीं कह सकते । क्योंकि घटत्वादिक ही
शरीरिकर्तृकत्वका अनुमापक (व्याप्य) जाति है । अभिप्राय यह है
कि सम्पूर्ण कार्योंमें ऐसी कोई जाति नहीं है, जिससे सभी कार्य
शरीरिकर्तृक सिद्ध हो सकें । अत घटत्व पटत्व आदि जातियोंके
आधारपर घट-पटादिकार्य ही शरीरिकर्तृक होंगे और पृथिवी-जलादि
कार्य तो अशरीरिकर्तृक ही होंगे ।
अथवा, अवयवोंका सन्निवेशविशेष ही यह अनुगमक धर्म रहे, जो

अनुपलम्भवादः ४१३
तस्याभावेऽपि जलानलादीनां चेतनप्रेर्यत्वदर्शनात् । न च शरीर-
प्रयोज्यं यत् तदेव चेतनप्रेर्यमिति नियमः, शरीरस्यैव स्वातन्त्र्य-
प्रसङ्गादित्युकम् ।
तस्मादचेतनत्वमात्रनिबन्धनमेतद् दण्डादिषु, तथा च पर-
माण्वदृष्टादिष्वपि तस्य भावात् तथाभावो दुर्वारः । तदेतत् कार्यं
कारणवत्तया व्याप्तम्, सा च विपक्षेऽसंभवन्ती स्वव्याप्यमुपोदाय
अङ्कुरादिकोसे व्यावृत्त तथा केवल घटपटादिमे ही रहने वाला हा और
यही शरीरिकर्तृकत्वका अनुमापक हेतु होगा। किन्तु यह नहीं हो
सकता कि—उक्त अवयव सन्निवेशविशेष ही चेतन कर्तृकत्वका भी प्रयो
जक हो—क्योंकि जल अग्नि आदिमे घटपटादिके समान अवयव
संघटन के नहीं रहने पर भी जलादिका चेतनद्वारा सञ्चालित होना
देखा जाता है। अतः उस दृष्टान्तसे घटपटादिके तुल्य अवयवसन्निवेश
नहीं होनेपर भी क्षिति अङ्कुरादिके चेतन (ईश्वर) द्वारा उत्पादित होनेमे
कोई बाधा नहीं है।
यह भी नियम नहीं है कि—जिस वस्तुका प्रयोजक शरीर है वही
चेतनद्वारा सञ्चालित होती है—क्योंकि शरीरका भी प्रयोजक कोई
दूसरा शरीर नहीं होता, इसलिये तब शरीर भी चेतनद्वारा सञ्चालित
नहीं होगा और शरीरके सञ्चालनमे स्वयं शरीर ही स्वतन्त्र हो जायगा।
ऐसी स्थितिमे मृतशरीर भी चेतनकी अपेक्षा नहीं रहनेसे अपने आप
सञ्चालित होने लगेगा। यह बात पूर्वमे कही ही जा चुकी है।
इसलिये दण्डादिमें जो अपना व्यापार करनेमे पराधीनता है, वह
केवल उसकी अचेतनताके कारण है, यह तृतीयपक्ष ही सुसङ्गत है।
इसप्रकार परमाणु अदृष्ट आदिमे भी अचेतनता धर्मके होनेसे उनका
भी व्यापार चेतनपरतन्त्र ही होगा, यह अनिवार्य है। अर्थात् पर-
माणुओंका प्रेरक चेतन ईश्वर ही है, क्योंकि जीवोंम वह सामर्थ्य
नहीं है।
अतः यह सभी कार्य कारणवत्तासे व्याप्त है। अर्थात् जो जो कार्य
है, वह कारणवाला है। तथा वह कारणवत्ता विपक्षभूत अकर्तृक
( —हीन ) वस्तुमें असंभव होती हुई अपने व्याप्यभूत कार्यत्वके साथ

अनुपलम्भवादः ४१५
कर्तव्यो वा ? विपर्ययाविरोधबाधकाभ्याम् । किं बाधकम् ?
अन्वयव्यतिरेकभूयोदर्शनसहायकमाचरन्नुत्तरस्तर्कः ।
स चाऽऽत्माश्रयेतरेतराश्रयचक्रकानवस्थानिष्टप्रसङ्गभेदेन
पञ्चविधोऽपि क्वचिद् व्यभिचारं निराकुर्वाणः क्वचित् तन्नि-
बन्धनमुपाधिमवधुन्वन् सहायीभवतीति फलतो न कश्चिद् विशेषः ।
तदुदाहरणानि चात्रैव यथायथं परिचेयानीति ।
प्रश्न—उक्त लक्षणवाले उपाधिका ज्ञान कैसे होगा ? अथवा उसका
निराकरण ( अभावज्ञान ) कैसे होगा ?
उत्तर—विपर्यय ( विपक्ष ) में अविरोध ( बाधकाभाव ) होनेसे
उपाधिका ज्ञान होता है तथा विपक्षमें बाधक होनेसे अनौ-
पाधिकत्वका ज्ञान होता है ।
प्रश्न—विपक्षमे जिसके होनेसे हेतुमे अनौपाधिकत्वका ज्ञान होता
है, वह बाधक क्या है ?
उत्तर—अन्वयव्याप्ति और व्यतिरेकव्याप्तिमें उपयोगीभूत साध्य-
साधनके अन्वयसहचार और व्यतिरेकसहचारके भूयोदर्शन
(बार बारदर्शन) में सहायक होता हुआ ऐसा तर्क, जिसका
उत्तरवर्ती कोई प्रतिकूल तर्क न हो, वह तर्क ही विपक्षमें
बाधक होता है । वह तर्क आत्माश्रय, अन्योन्याश्रय, चक्रक,
अनवस्था और अनिष्टप्रसङ्गके भेदसे पाँच प्रकारका होता
हुआ कहींपर व्यभिचार शङ्काको हटाता हुआ तथा कहीं
व्यभिचारशङ्कामे हेतुभूत उपाधिका निराकरण करता हुआ
प्रकृत अनुमानमे सहायक होता है । इन सभी बाधकोंमें
अवान्तर विशेषता होनेपर भी व्यभिचार-निरासरूप इनके
फलमे कोई अन्तर नहीं है । यद्यपि आत्माश्रयादि चार
भी अनिष्टप्रसङ्गरूप ही हैं तथापि गोबलीवर्द न्याय-
से अलग-अलग उल्लेख किया जाता है। इन पाँचोंके
उदाहरण भी इसी ग्रन्थमें क्षणिकवाद, अपोहवाद तथा
विज्ञानवादादिमें यथास्थान देखने चाहिये ।

४१४ आत्मतत्त्वविवेके

व्यावर्त्तमाना सपक्षे विश्राम्यतीत्युभयमुखी प्रतिबन्धसिद्धिः ।
व्याप्तिस्वरूपनिरूपण
कः पुनरयं प्रतिबन्धः ? स्वाभाविकः सम्बन्धः । कः स्वा-
भाविकार्थः ? निरुपाधित्वम् । कः पुनरुपाधिः ? साध्यप्रयोजकं
निमित्तान्तरम् । किमस्य लक्षणम् ? साधनाव्यापकत्वे सति
साध्यव्यापकत्वम् । कथं पुनरेवंलक्षणकोऽर्थः प्रत्येतव्यो निरा-
ही उस विपक्षसे व्यावृत्त होती है । अर्थात् वह कर्तृविहीन वस्तु कार्य
नहीं होती किन्तु नित्य होती है, जिसका कोई कारण ही नहीं होता ।
इसलिये वह कारणवत्ता कर्तृविहीन नित्य वस्तुरूप विपक्षसे व्यावृत्त
होती हुई सकर्तृक वस्तुमे विश्रान्त हो जाती है । इस प्रकार उभयमुखी
(अन्वयमुखी और व्यतिरेकमुखी) व्याप्तिकी सिद्धि हो जाती है ।
अर्थात् जो जो कार्य होता है, वह वह सकर्तृक होता है तथा जो
सकर्तृक नहीं होता वह कार्य भी नहीं होता, जैसे नित्य आकाशादि ।
इस तरह अन्वयव्याप्ति और व्यतिरेकव्याप्तिकी सिद्धि हो जाती है ।
प्रश्न—ईश्वरकी सिद्धिमे व्याप्ति ही मूल है, अत वह व्याप्ति
क्या है ?
उत्तर—हेतुमें साध्यका स्वाभाविक सम्बन्ध व्याप्ति है ।
प्रश्न—स्वाभाविकका क्या अर्थ है ?
उत्तर—निरुपाधिक अर्थात् उपाधि रहित होना ।
प्रश्न—उपाधि क्या वस्तु है ?
उत्तर—साध्यका प्रयोजक कोई दूसरा निमित्त, जो साध्यका
समव्याप्य हो, वही उपाधि है । जैसे, "धूमवान् वह्नेः"
इस अनुमानमे आर्द्वेन्धनसंयोग उपाधि है ।
प्रश्न—उपाधिका लक्षण क्या है ?
उत्तर—साधनका अव्यापक होते हुए साध्यका व्यापक होना उपाधि
का लक्षण है । जैसे, आर्द्वेन्धनसंयोग वह्निरूप साधनका
अव्यापक होते हुए धूमात्मक साध्यका व्यापक होनेसे उपाधि
कहाता है ।