आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 452, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुपलम्भवादः ४०३
न विरोधः । देहस्य क्वचित् कार्यकारकतयाऽधिष्ठाननिय-
मात् । यत्र तु न तत् कारकं तत्रापि तदधिष्ठेयमिति कश्चेत-
नोऽभिदध्यात् ?
द्वितीयेऽपि यः साक्षादधिष्ठातुमशक्तः स साक्षादधिष्ठेयमु-
पादाय तत् प्रयुञ्जीत, न त्वेकस्य साक्षादधिष्ठानायोग्यमन्य-
स्यापि तथेति नियमः, देह एव व्यभिचारात् । तृतीये त्वजागल-
स्तनकल्पः कायो नोपयुक्तांशविवेचने स्वं निवेशयति, यथा
धूममात्रं प्रति तार्णदहनान्वयव्यतिरेकयोरालोकवत्तेति ।
उसके कारक होनेके नाते करता है ? या उससे अन्यकारकोंको प्रयुक्त
करनेके लिये देह-धारण आवश्यक है ? अथवा निजकर्माधीन प्राप्त होने-
मात्रसे कर्ताकेलिये शरीर धारण आवश्यक है ? इनमें प्रथमपक्षमें
मुझे कोई विरोध नहीं है । क्योंकि कहीं कार्यके प्रति देह भी कारक
होता है, अतः वहाँ उसका कर्ताद्वारा अधिष्ठित होना अपेक्षित है ।
जहाँ तो वह (देह) कारक नहीं होता, वहाँ भी वह कर्ताद्वारा अधिष्ठेय
होगा, इसे कौन चेतन व्यक्ति कह सकता है ।
द्वितीयपक्षमे भी जो (मनुष्यादि) साक्षात् (सीधे) कारकोंको
अधिष्ठित करनेमे असमर्थ है, वह सीधे अधिष्ठित किये जाने योग्य देहको
लेकर उन कारकोंको फलोत्पादनके लिये प्रयुक्त करेगा । ऐसा नियम
नहीं है कि जो (कारकसमूह) एक (मनुष्य) के द्वारा साक्षात्
अधिष्ठानके योग्य नहीं है, वह दूसरे (सर्वशक्तिमान् ईश्वर) के द्वारा
भी अधिष्ठेय नहीं है । क्योंकि देहमें ही व्यभिचार हो जाता है।
जैसे चैत्रदेह मैत्रके द्वारा अधिष्ठेय नहीं है, फिर भी वह चैत्रके द्वारा
अधिष्ठेय होता है ।
तृतीयपक्षमें तो बकरीके गलेमें लटकते हुए स्तनके समान देह भी
अपनेको उपयोगिताकोटिके विचारमें नहीं रख सकता है । अर्थात्
कारकोंका व्यापार वैसे ही देहके बिना निरुपयोगी होता है, जैसे
धूममात्रके प्रति तृणजन्य अग्निके अन्वय-व्यतिरेकमें आलोककी सत्ता
उपयोगिताके विचारमें अनपेक्षित है । अर्थात् कारक व्यापारमात्रके
प्रति देह और धूममात्रके प्रति आलोक समानरूपसे अन्यथासिद्ध है ।