आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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यदि चाकारकस्याप्यतत्प्रयोज ( गद्वार ) कस्यापि १ अवश्य-
मपेक्षा स्यात्, य एव कुलालकायवान् घटस्य कर्ता स एव करभ-
शरीरवानपि दण्डादीन् प्रयुञ्जीत। न खलु स्वकर्मोपात्ततामात्रेण
करभकुम्भकारशरीरयोः कश्चिद् विशेषः। कार्यविशेषे कायविशेषो-
ऽनुपयोगोऽप्यपेक्षणीय इति चेत्, तत्र कार्येऽनुपयुक्तश्चावश्यापेक्षणी-
यश्चेति व्याघातः। अव्याघाते वा कुम्भे कर्तव्ये करभशरीरमप्य-
वश्यमपेक्षणीयमविशेषादिति।
तस्मात् सन्देशवदयःपिण्डवत् २ कारकस्तत्प्रयोजकतयैव ३
शरीराधिष्ठाननियमो न तु शरीरत्वेनैव। न च शरीरस्य सर्वत्र
यदि कारक न होते हुएकी भी या कारकोंका प्रवर्तक न होते हुएकी भी
अवश्य अपेक्षा हो तो जो आत्मा कुलालशरीरधारी होकर घटका कर्त्ता
होता है, वही करभ (हस्तिशावक) शरीरधारी होकर भी दण्डचक्रादि-
का प्रयोजक होवे। क्योंकि स्वकर्मोपार्त्ततामात्रकी दृष्टिसे करभशरीर
और कुम्भकारशरीरमें कोई अन्तर नहीं है।
यदि कहो कि—कार्यविशेषमे शरीरविशेष अनुपयोगी होते हुए भी
अपेक्षणीय है—तो कार्यमे अनुपयुक्त भी है और अपेक्षणीय भी है,
यह कथन वदतोव्याघात है। यदि व्याघातदोष न हो तो घट निर्माण
करनेमे करभ शरीर भी अवश्य अपेक्षणीय होना चाहिये। क्योंकि
अनुपयुक्तताकी दृष्टिसे कुम्भकारशरीर और करभशरीरमे कोई अन्तर
नहीं है।
इसलिये सँडसीके समान या लोह पिण्डके समान कारकके रूपमे
या कारकव्यापारके आश्रयके रूपमे ही शरीरका अधिष्ठान आवश्यक है,
न कि शरीरके ही रूपमें। अर्थात् जिस कार्यमें जो शरीर कारक या
प्रयोजक होता है, उसी कार्यमे शरीर आत्माद्वारा अधिष्ठित होगा।
यही नियम है, न कि शरीर होनेमात्रसे आत्माद्वारा अधिष्ठित होना
१. कस्यापि देहस्येति २ पु० पा० २. अय पिण्डे इति १ पु० पा०
३ कारकप्रयोजकतयैव इति २ पु० पा०