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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 530 में से

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पृष्ठ 463

अनुपलम्भवादः ४१५
कर्तव्यो वा ? विपर्ययाविरोधबाधकाभ्याम् । किं बाधकम् ?
अन्वयव्यतिरेकभूयोदर्शनसहायकमाचरन्नुत्तरस्तर्कः ।
स चाऽऽत्माश्रयेतरेतराश्रयचक्रकानवस्थानिष्टप्रसङ्गभेदेन
पञ्चविधोऽपि क्वचिद् व्यभिचारं निराकुर्वाणः क्वचित् तन्नि-
बन्धनमुपाधिमवधुन्वन् सहायीभवतीति फलतो न कश्चिद् विशेषः ।
तदुदाहरणानि चात्रैव यथायथं परिचेयानीति ।
प्रश्न—उक्त लक्षणवाले उपाधिका ज्ञान कैसे होगा ? अथवा उसका
निराकरण ( अभावज्ञान ) कैसे होगा ?
उत्तर—विपर्यय ( विपक्ष ) में अविरोध ( बाधकाभाव ) होनेसे
उपाधिका ज्ञान होता है तथा विपक्षमें बाधक होनेसे अनौ-
पाधिकत्वका ज्ञान होता है ।
प्रश्न—विपक्षमे जिसके होनेसे हेतुमे अनौपाधिकत्वका ज्ञान होता
है, वह बाधक क्या है ?
उत्तर—अन्वयव्याप्ति और व्यतिरेकव्याप्तिमें उपयोगीभूत साध्य-
साधनके अन्वयसहचार और व्यतिरेकसहचारके भूयोदर्शन
(बार बारदर्शन) में सहायक होता हुआ ऐसा तर्क, जिसका
उत्तरवर्ती कोई प्रतिकूल तर्क न हो, वह तर्क ही विपक्षमें
बाधक होता है । वह तर्क आत्माश्रय, अन्योन्याश्रय, चक्रक,
अनवस्था और अनिष्टप्रसङ्गके भेदसे पाँच प्रकारका होता
हुआ कहींपर व्यभिचार शङ्काको हटाता हुआ तथा कहीं
व्यभिचारशङ्कामे हेतुभूत उपाधिका निराकरण करता हुआ
प्रकृत अनुमानमे सहायक होता है । इन सभी बाधकोंमें
अवान्तर विशेषता होनेपर भी व्यभिचार-निरासरूप इनके
फलमे कोई अन्तर नहीं है । यद्यपि आत्माश्रयादि चार
भी अनिष्टप्रसङ्गरूप ही हैं तथापि गोबलीवर्द न्याय-
से अलग-अलग उल्लेख किया जाता है। इन पाँचोंके
उदाहरण भी इसी ग्रन्थमें क्षणिकवाद, अपोहवाद तथा
विज्ञानवादादिमें यथास्थान देखने चाहिये ।