आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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नापि तृतीयः, तुल्ययोगक्षेमयोरविशेषाद् व्यभिचार-
शङ्कानापादकत्वाच्च ।
चतुर्थस्तु स्यात् । सोऽपि न शरीरान्तर्भूतवृत्तिः, चेष्टमान-
शरीरहेतुकस्यापि कस्यचिदचेतनपूर्वकत्वप्रसङ्गात् । न चेद-
मिष्टम्, चेष्टाचेतनयोरविनाभावभङ्गप्रसङ्गात् । नापि सहवृत्तिः,
साधनसहवृत्तिरूप तृतीयपक्ष भी नहीं हो सकता । क्योंकि उपाधि
को साधनसमनियत माननेपर दोनोंके तुल्ययोगक्षेम होनेके कारण
साधन और उपाधिमे कोई विशेषता नहीं होगी । ऐसी स्थितिमें कार्यत्व-
हेतुसे सकर्तृकत्वका अनुमान किया जाय या तुम्हारेद्वारा उद्भावित
साधनसमनियत उपाधिसे सकर्तृकत्वका अनुमान किया जाय, इसमें
कोई अन्तर नहीं है। क्योंकि दोनों ही दशाओंमे क्षित्यादिके प्रति
कर्त्ता (ईश्वर) की सिद्धि हो जाती है । एव, इस प्रकारके साधन
समनियत उपाधिकेद्वारा व्यभिचार शङ्काकी उत्पत्ति नहीं होनेके कारण
वह उपाधि ही नहीं हो सकता। क्योकि जो साध्यका व्यापक और
साधनका अव्यापक होता है, वही व्यभिचारशङ्काका उत्पादक होनेके
कारण उपाधि कहाता है ।
साधनान्तर्वृत्ति (साधनव्याप्य) रूप चतुर्थपक्ष तो होगा, किन्तु वह
उपाधि भी शरीरिकर्तृकत्वकी अपेक्षा न्यूनवृत्ति कुलालकर्तृकत्व आदि
हो तो उस कुलालकर्तृकत्व उपाधिको चेतनकर्तृकत्वरूप साध्यका व्यापक
होना होगा । ऐसी स्थितिमे व्यापकका अभाव होनेसे व्याप्यका भी
अभाव हो जाता है, अतः जहाँ कुलालकर्तृकत्वरूप साध्यव्यापकका
अभाव होगा, जैसे पटादिकार्यमे, वहाँ चेतनकर्तृकत्वरूप साध्यका भी
अभाव होने लगेगा । यद्यपि वह पटादिकार्य कुलालकर्तृक न होते
हुए भी चेष्टायुक्त शरीरसे ही उत्पन्न होता है, अत वह वस्तुत चेतनकर्ता
से उत्पन्न होता ही है । यहाँ कुलालकर्तृकत्वका अभाव होनेके कारण
पटादिमे जो अचेतनकर्तृकत्वका (चेतनकर्तृकत्वाभावका) प्रसङ्ग
दिया गया है, उसमे इष्टापत्ति नहीं कह सकते । क्योंकि तब चेष्टा
और चेतनमें परस्पर जो अविनाभाव सम्बन्ध (व्याप्यव्यापकभाव) है,