आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[header] अनुपलम्भवाद ४११
अपि च मृत्पिण्डदण्डादिषु स्वव्यापारे पारतन्त्र्यं तन्निय-
मेनोपलभ्यते । तदिदं दण्डादित्वमात्रानुबद्धं वा स्यात्,
अदृष्टविशेषोपग्रहानुबद्धं वा, अचैतन्यमात्रानुबन्धं वेति निपुणं
निरूपय।
तत्र न प्रथमः, वेमादीनां स्वातन्त्र्यप्रसङ्गात् । तेषां वेमादि-
त्वमात्रानुबद्धमिति चेत्, न, दण्डादीनां स्वातन्त्र्यप्रसङ्गात् । न
चैतत् कार्यविशेषनियतम्, गवाभ्याजनादौ दण्डादीना स्वातन्त्र्य-
प्रसङ्गात् ।
माननेपर इतर (अचेतन परमाणु आदि) की निवृत्तिका भी प्रसङ्ग
होने लगेगा।
परमाणु अदृष्ट आदिके अधिष्ठाताके रूपमें ईश्वरकी सिद्धि
एव, मट्टीका पिण्ड तथा दण्ड आदि कारण अपने व्यापारमें नियमतः
किसी अन्य (चेतन) के अधीन होते हैं, यह नियमपूर्वक देखा जाता है।
अर्थात् वे दूसरेसे अधिष्ठित होकर ही अपना व्यापार करते हैं। तो
क्या ऐसा दण्डत्वादि-जातिके कारण होता है ? अथवा भोक्ताके अदृष्ट-
विशेषसे उपगृहीत होनेके कारण दण्डादिका व्यापार पराधीन है ? या
उनकी अचेतनतामात्रके कारण ऐसा है ? इसे भी अच्छी तरह विचारो।
इनमें प्रथमपक्ष नहीं हो सकता है। क्योंकि दण्डत्वरूपसे यदि
पराधिष्ठेयता (पराधीनता) हो तो दण्डातिरिक्त वेमा आदिमें स्वातन्त्र्यका
प्रसङ्ग हो जायगा। अर्थात् वेमा आदिमें दण्डत्व जातिके नहीं रहनेसे
वेमा अपने व्यापारमें अधिष्ठाता चेतनकी अपेक्षा नहीं करेगा। यदि
उपकरणोंका व्यापार वेमत्वमात्रप्रयुक्त है, ऐसा मानो तो यह भी नहीं हो
सकता। क्योंकि तब वेमत्वधर्मसे रहित होनेके कारण दण्डादि अपने
व्यापारमें स्वतन्त्र होने लगेंगे। अर्थात् दण्डगत व्यापार चेतन
अधिष्ठाताके बिना अपने आप होने लगेगा। यह भी नहीं हो सकता
कि—दण्डादिकी परतन्त्रता घटादि कार्यविशेषसे ही नियत है। अर्थात्
घटादि बनानेमे ही दण्डादि अपने व्यापारमे पराधीन है—क्योंकि तब
गायके हाँकने आदिमें दण्ड स्वतन्त्र होने लगेगा।