आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलब्धवादः ४०१
सद्भावसिद्धौ साध्याभावप्रयुक्तसाधनाभावलक्षणस्य व्यतिरेक-
स्यापि सिद्धेः न तदर्थं पृथगपेक्षेति ।
द्वितीयेऽपि श्रवणसम्पुटमवधाय कलकलस्त्यज्यताम् ।
तथा हि दण्डादिषूदासीनेषु दृश्योऽदृश्यो वा (नाना) कारक-
व्यापाराविनिर्भागवृत्तिश्चेतनो निवृत्तो न वेति त्वमेव प्रष्टव्यः ।
न चेत्, कुतः कारणान्युदासते ? निवृत्तश्चेत्, कथमदृश्य-
व्यतिरेकसंशयः ?
तथापि यादृशस्यान्वयस्तादृशस्य व्यतिरेकोऽपि उपयुज्यत
एव जहाँ साध्यका विपक्ष ( निश्चितसाध्याभाववान् ) सम्भव है,
यहाँ, जैसे पक्षमे साधन ( हेतु ) के रहनेके कारण साध्यकी सत्ता सिद्ध
होती है, वैसे ही विपक्षमे साध्यका अभाव होनेसे साधनाभावरूप
व्यतिरेक भी स्वतः सिद्ध हो जाता है । उसकेलिये पृथक् यत्नकी अपेक्षा
नहीं होती है । अर्थात् आकाशादिमें सत्त्व