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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 530 में से

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पृष्ठ 458

अनुपलम्भवादः ४०९
उपादानेतरव्यवस्था तु कथञ्चिदिति चेत्, न, तथापि निरूपा-
दानत्वप्रसङ्गात् ।
जातिप्रतिनियतहेतुत्वेन तदवश्यमभ्युपेयम्, तस्य प्रमाण-
सिद्धतयाऽपह्नोतुमशक्यत्वादिति चेत्, न, उपादानमात्रस्य तद्धेतुत्वे
निमित्तवैचित्र्येऽप्येकजातीयत्वप्रसङ्गात् । निर्निमित्तं वा प्रसज्येत,
उपादानादेव तथाविधात्तदुपपत्तेः ।
उपादान कारणके भी कार्य होने लगेगा । अर्थात् कर्तृ विशेष और
कार्यविशेषमें अन्वयव्यतिरेकके द्वारा सामान्यतः कर्त्ता और कार्यमें
कार्यकारणभाव सिद्ध हो जाता है । यदि कर्त्ताके बिना भी कोई कार्य
हो तो उपादानकारणके बिना भी कार्य होने लगेगा ।
यदि कहो कि—पृथक् पृथक् जातिके कार्यके प्रति हेतुता नियत होने
के कारण अवश्य ही प्रत्येक कार्यका कोई उपादानकारण मानना होगा ।
क्योंकि प्रमाणद्वारा सिद्ध होनेके कारण उपादानकारणका अपलाप नहीं
किया जा सकता है । अर्थात् कार्य यदि बिना उपादानके होता तो
“पृथिवीजातिका कार्य पृथिवीजातिके समवायिकारण (उपादानकारण)
से ही उत्पन्न होता है” यह व्यवस्था नहीं होती । अतः इस व्यवस्थासे
ही सिद्ध होता है कि प्रत्येक कार्यका कोई उपादान अवश्य होता है—तो
ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि नियतजातिका कार्य उत्पन्न होनेमे
यदि उपादानमात्र प्रयोजक होता तो उपादान एक रहनेपर निमित्तकारण
के विचित्र होनेपर भी कार्यमें विचित्रता नहीं हो सकेगी, बल्कि
उसी जातिका कार्य उत्पन्न होने लगेगा । अर्थात् उपादानमात्रको कार्य-
का प्रयोजक माननेपर निमित्तकारण अकिञ्चित्कर हो जायगा और
दण्ड वेमा आदि निमित्तकी विचित्रता होनेपर भी घटपटादि कार्यों मे
विचित्रता नहीं हो सकेगी और उनमे एक जातीयत्वका प्रसङ्ग हो जायगा ।
यदि निमित्तगत विचित्रताके होनेपर भी उपादानगत विचित्रताको ही
कार्य वैचित्र्यका प्रयोजक मानो तो कार्यमात्र बिना निमित्तके ही
जायगा । क्योंकि उपादानगत वैजात्यसे ही विजातीय कार्यकी उपपत्ति
हो जायगी ।