आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलम्भवादः ३९७
देहस्यानुपाधित्वे तस्याप्यनुपाधित्वात्, तयोस्तुल्ययोगक्षेम-
स्यात् । अतथाभावे वा सहवृत्तित्वनियमानुपपत्तेः ।
शरीरस्य च नोपाधित्वम्, कत्र्तृव्यापकत्वात् । तत्कार्य्य-
त्वस्योपाधेर्विद्यमानत्वात् । नाप्यायतनतया तथाभावो,
भोगोपाधित्वात् । नाप्युपकरणप्रापकतया, साक्षात् प्रयत्ना-
नधिष्ठेयतोपाधित्वात् । अन्यथापि तत्प्राप्तेरिति ।
यदि यह उपाधि शरीरिकर्तृकत्वसे न्यूनवृत्ति न हो, किन्तु शरीरसह-
वृत्ति हो तो वह भी नहीं हो सकता है । क्योंकि देहके उपाधि नहीं
होनेके कारण उसका सहवृत्ति भी उपाधि नहीं हो सकेगा । कारण, देह
और यह उपाधि दोनों ही तुल्ययोगक्षेम हैं । यदि वे तुल्ययोगक्षेम न
हों तो उन दोनोंमे सहवृत्तिका नियम नहीं रह जायगा ।
उक्त आपत्तिके भयसे यदि कहो कि—शरीरघटित शरीरजन्यत्व ही
उपाधि होगा—तो वैसा नहीं हो सकता है । क्योकि शरीरजन्यत्व
सकर्तृकत्वरूप साध्यका व्यापक नहीं है । कारण सभी सकर्तृक शरीर-
जन्य ही नहीं होता, जैसे वृक्षादिक ही । यदि कहो कि—कुलाल आदि
कर्ता शरीरसापेक्ष ही घटादि-कार्य करता हुआ पाया जाता है, अतः
अवश्य ही सभी सकर्तृक शरीरजन्य होंगे—तो यह भी नहीं हो सकता ।
क्योंकि शरीरसापेक्षतामे भी शरीरकार्यत्वरूप उपाधि विद्यमान है ।
अर्थात् उसी कार्यके लिये कर्ताको शरीरकी अपेक्षा है, जो कार्य शरीरसे
उत्पन्न होता है । वृक्ष अंकुर आदि कार्य तो शरीरसे उत्पन्न होता नहीं,
अत उसके कर्ता (ईश्वर) को शरीरकी अपेक्षा नहीं है ।
एवं ईश्वर भोगायतनके रूपमे शरीरकी अपेक्षा नहीं करता, क्योंकि
वैसा करनेमे भोग उपाधि है । अर्थात् ईश्वरमें भोग ही नहीं होता है
कि भोगायतन (भोगका माध्यम) रूपमे वह शरीरकी अपेक्षा करेगा ।
उपकरणोंकी प्राप्ति करानेके लिये भी ईश्वरको शरीरकी अपेक्षा नहीं
है । क्योंकि वैसा वहीं होता है, जहाँका उपकरण साक्षात् कर्ताके
प्रयत्नका विषय नहीं होता । जैसे, कुलाल शरीरके बिना दण्डचक्रादिका
सञ्चालन नहीं कर सकता और घटकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है । किन्तु
ईश्वर तो शरीररूपमाध्यमके बिना ही सीधे ही अपने प्रयत्नसे पर-